Saturday, October 25, 2025

डर क्यूँ

 



मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूँ
जिंदगी आ, तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ
जिसमें माँ और बाप की सेवा का शुभ संकल्प हो
चाहता हूँ मैं भी काँधे पर वही काँवर रखूँ
हाँ, मुझे उड़ना है लेकिन इसका मतलब यह नहीं
अपने सच्चे बाजुओं में इसके-उसके पर रखूँ
आज कैसे इम्तहाँ में उसने डाला है है मुझे
हुक्म यह देकर कि अपना धड़ रखूँ या सर रखूँ
कौन जाने कब बुलावा आए और जाना पड़े
सोचता हूँ हर घड़ी तैयार अब बिस्तर रखूँ
ऐसा कहना हो गया है मेरी आदत में शुमार
काम वो तो कर लिया है काम ये भी कर रख रखूँ
खेल भी चलता रहे और बात भी होती रहे
तुम सवालों को रखो मैं सामने उत्तर रखूँ

कुँअर बेचैन

7 comments:

  1. खेल भी चलता रहे
    और
    बात भी होती रहे
    शानदार
    सादर

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  2. आपकी पूरी रचना में एक जज़्बा है, जहाँ मौत का डर नहीं, बल्कि ज़िंदगी को सच्चाई से जीने की ललक है। आख़िरी शेर में जो सहज संवाद की बात है, वो ग़ज़ल को और भी खूबसूरत बना देता है। शब्द इतने सधे हुए हैं कि हर मिसरा सोचने पर मजबूर करता है।

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  3. खेल भी चलता रहे और बात भी होती रहे
    तुम सवालों को रखो मैं सामने उत्तर रखूँ
    सभी शेर गजब के हैं !

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