Sunday, January 10, 2021

सुबह फिर मिलेंगें ......प्रीती श्री वास्तव


 
122. 122. 122. 12

गजब की गजल तूने तैयार की।
गुंजाइश नही इसमे इंकार की।।
तभी तो फिदा हो गया मन मेरा।
ये दावत अभी मैने स्वीकार की।।
सदियों तलक ये कही जायेगी।
लिखी है गजल तूने जो प्यार की।।
न हो काफिया है जरूरत नही।
मुहब्बत है काफी मेरे यार की।।
बड़ा दर्द था उस गजल में तेरी।
जो लिखी सनम तूने मनुहार की।।
जमाना पढ़ा साथ मेरे उसे।
मुहब्बत मेरी सबने अखबार की।।
देखो बैठे हैं आज मिलकर सनम।
नही करो तुम बातें संसार की।।
होने है लगी शब हमें जाने दो।
होंगी बातें कल इश्के इजहार की।।
सुबह फिर मिलेंगें ये वादा रहा।
जमेंगी ये महफिल करतार की।।
-प्रीती श्री वास्तव।।

6 comments:

  1. वाह!!!
    गजब की गजल तूने तैयार की।
    गुंजाइश नही इसमे इंकार की।।
    तभी तो फिदा हो गया मन मेरा।
    ये दावत अभी मैने स्वीकार की।।
    बहुत ही सुन्दर..

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 10 जनवरी 2021 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. वाह बेहतरीन 👌

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