Sunday, September 23, 2018

क्या सोचती होगी धरती ........अनुराधा सिंह

मैंने कबूतरों से सब कुछ छीन लिया
उनका जंगल
उनके पेड़
उनके घोंसले
उनके वंशज
यह आसमान जहाँ खड़ी होकर
आँजती हूँ आँख
टाँकती हूँ आकाश कुसुम बालों में
तोलती हूँ अपने पंख
यह पंद्रहवाँ माला मेरा नहीं उनका था
फिर भी बालकनी में रखने नहीं देती उन्हें अंडे

मैंने बाघों से शौर्य छीना
छीना पुरुषार्थ
लूट ली वह नदी
जहाँ घात लगाते वे तृष्णा पर
तब पीते थे कलेजे तक पानी
उन्हें नरभक्षी कहा
और भूसा भर दिया उनकी खाल में
वे क्या कहते होंगे मुझे अपनी बाघभाषा में

धरती से सब छीन मैंने तुम्हें दे दिया
कबूतर के वात्सल्य से अधिक दुलराया
बाघ के अस्तित्व से अधिक संरक्षित किया
प्रेम के इस बेतरतीब जंगल को सींचने के लिए
एक नदी चुराई, बाँध रखी आँखों में
फिर भी नहीं बचा पाई कुछ कभी हमारे बीच
क्या सोचती होगी पृथ्वी
औरत के व्यर्थ गए अपराधों के बारे में।
-अनुराधा सिंह 

6 comments:

  1. वात्सल्य से अधिक दुलार, अस्तित्व से अधिक संरक्षण" भुत अच्छी यथार्थ बात कही है अनुराधा जी... "आवश्यकता से अधिक करना" ही तो है सबसे बड़ा अपराध... पर हम भूल जाते हैं अपने स्वार्थ के वशीभूत और उनका "पन्द्रहवां माला छीनकर" उन पर अत्याचार कर बैठते हैं... बहुत सुन्दर...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (24-09-2018) को "गजल हो गयी पास" (चर्चा अंक-3104) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  3. अति सर्वदा वर्जित रही
    देती हो सन्देश
    अनुराधा जी काव्य में
    भरा हुआ अति नेह !
    बेहतरीन पढ़ कर सोचने को विवश करता लेखन
    👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏

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  4. बहुत ही सुन्दर 👌👌👌

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