Tuesday, May 7, 2019

हिंदी गौरव.....बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

(असबंधा छंद)
भाषा हिंदी गौरव बड़पन की दाता।
देवी-भाषा संस्कृत मृदु इसकी माता॥
हिंदी प्यारी पावन शतदल वृन्दा सी।
साजे हिंदी विश्व पटल पर चन्दा सी॥

हिंदी भावों की मधुरिम परिभाषा है।
ये जाये आगे बस यह अभिलाषा है॥
त्यागें अंग्रेजी यह समझ बिमारी है।
ओजस्वी भाषा खुद जब कि हमारी है॥

गोसाँई ने रामचरित इस में राची।
मीरा बाँधे घूँघर पग इस में नाची॥
सूरा ने गाये सब पद इस में प्यारे।
ऐसी थाती पा कर हम सब से न्यारे॥

शोभा पाता भारत जग मँह हिंदी से।
जैसे नारी भाल सजत इक बिंदी से॥
हिंदी माँ को मान जगत भर में देवें।
ये प्यारी भाषा हम सब मन से सेवें॥

-बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

Monday, May 6, 2019

बिखरकर टूटने का डर ....सुरेश अग्रवाल "अधीर"


कहूँ किसको बता यारा सुकूँ दिल को न आता है
करूँ मैं कोशिशें कितनी नहीं ये दिल भुलाता है

हज़ारों राह ढूँढी पर भुलाना है बहुत मुश्किल
बिना सोचे तुझे हमदम नहीं दिल चैन पाता है
जहां के वास्ते मुझको बहुत कुछ सोचना है अब
मगर दिल तो हमेशा ही तुम्हारी राह जाता है

नहीं इसको समझ आये बना अंजान है फिरता 
बहुत बेदर्द दिल मेरा मुझे हरदम रुलाता है

नज़ारे तो दिखाता हूँ मगर चुपचाप है बैठा
नहीं ये ख़्वाब कोई भी निग़ाहों में सजाता है

डगर तो ढूँढ ली मैंने मगर बेबस बहुत है दिल 
तेरे कूचे से बाहर की नहीं अब राह पाता है

हुआ पागल मेरा दिल तो नहीं है फ़िक्र कुछ इसको
बिखरकर टूटने का डर मगर मुझको सताता है
-सुरेश अग्रवाल "अधीर"

Sunday, May 5, 2019

जल ही जीवन है ................सदा

लौट आती देह में . . .
जल ही जीवन है,
नहीं इसके बिना कोई जीवन है,
एक बूंद से,
निश्‍वास होती सांस
लौट आती देह में,
जल ही जीवन है . . . ।
समझो तो सार इसका,
मीन से, जब तक,
जल में रही
सब कुछ इसका था जल,
सांस, आस, विश्‍वास,
न होती एक पल स्थिर,
न आती एक पल उदासी,
चंचलता हर पल रहती,
इसके साथ,
जल ही जीवन है . . . ।
हर ओर था जीवन,
सब ओर था उल्‍लास,
लेकिन जल में रहकर भी,
नहीं बुझी थी प्‍यास,
जीवन था उसका जल,
जल ही जीवन है . . . ।
नहीं रह पाता
कोई भी निर्जल
जल ही जीवन है . . . ।

Saturday, May 4, 2019

राम ध्यान हैं...निधि सक्सेना

राम ध्यान  है
शान्त स्थिर
मौन गंभीर
दिव्य आलोकित 
अंधकार में प्रकाश भरा स्मित ..

कृष्ण कीर्तन  हैं
नाचते गाते 
आनंद से छलछलाते 
उन्मुक्त
सुखद सरल ..

ध्यान करो चाहे कीर्तन
स्वयं से मिलन तय है 
कि राम और कृष्ण हमारे भीतर ही तो हैं...
-निधि सक्सेना

Friday, May 3, 2019

सरिता....अमरेश सिंह भदौरिया

शिखरों पर बर्फ पिघलती है 
तब सरिता नयी निकलती है 
1.
पथरीले घाटों से बहकर 
तपन मृगशिरा की सहकर 
चिन्तनरत देह बनी दुर्बल 
छलता निज अंग कहीं मरुथल 
होती न किन्तु कर्तव्यविमुख
जीवन सतपथ पर चलती है 
तब सरिता नयी निकलती है 
2.
आलिंगन बद्ध किनारों से 
कहती कुछ मधुर इशारों से 
धीरे से हवा छूकर तन को 
अहलादित करती है मन को 
क्षण-क्षण में धर कर नये रूप
जब उन्मुक्त लहर मचलती है
तब सरिता नयी निकलती है 
3.
अधरों पर मधुमास लिये 
मन में कुछ गहरी प्यास लिये 
महामिलन की आस लिये 
धड़कन ज्यों बोझिल साँस लिये 
द्रवीभूत होकर पीड़ा 
जब संतापों पर ढलती है 
तब सरिता नयी निकलती है 
4.
अविरलता में विश्राम कहाँ 
पथ में सिंदूरी शाम कहाँ 
श्रमशील मनन परहित चिंतन 
संकल्प साधनामय जीवन 
"अमरेश" अँधेरे से लड़कर
जब दीपशिखा ख़ुद जलती है 
तब सरिता नयी निकलती है
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-अमरेश सिंह भदौरिया

Thursday, May 2, 2019

छोटू .....श्वेता सिन्हा

कंधे पर फटकर झूलती
मटमैली धूसर कमीज
चीकट हो चुकी
धब्बेदार नीली हाफ पैंट पहने
जूठी प्यालियों को नन्ही
मुट्ठियों में कसकर पकड़े
इस मेज से उस मेज दौड़ता
साँवले चेहरे पर चमकती
पीली आँख मटकाता
भोर पाँच बजे ही से 
चाय-समोसे की दुकान पर
नन्हा दुबला मासूम सा 'छोटू'
किसी की झिड़की, किसी
का प्यार ,किसी की दया
निर्निमेष होकर सहता
पापा के साथ दुकान आये
नन्हें हम उमर बच्चों को
टुकुर;टुकुर हसरत से ताकता
मंगलवार की आधी छुट्टी में
बस्ती के बेफ्रिक्र बच्चों संग 
कंचे, गिट्टू, फुटबॉल खेलता
नदी में जमकर नहाता,
बेवजह खिलखिलाता,
ठुमकता फिल्मी गाने गाता
अपने स्वाभिमानी जीवन से
खुश है या अबोधमन
बचपना भुला 
वक्त की धूप सहना सीख गया
रोते-रोते गीला बचपन
सूख कर कठोर हो गया है।
सूरज के थक जाने के बाद
चंदा के संग बतियाता
बोझिल शरीर को लादकर
कालिख सनी डेगची और
खरकटे पतीलों में मुँह घुसाये
पतले सूखे हाथों से घिसता
थककर निढाल सुस्त होकर
बगल की फूस झोपड़ी में
अंधी माँ की बातें सुनता
हाथ-पैर छितराये सो जाता।

-श्वेता सिन्हा

Wednesday, May 1, 2019

खिलने लगे पलाश....श्वेता सिन्हा

पिघल रही सर्दियाँ
झर रहे वृक्षों के पात
निर्जन वन के दामन में
खिलने लगे पलाश

सुंदरता बिखरी फाग की
चटख रंग उतरे घर आँगन
लहराई चली नशीली बयार
लदे वृक्ष भरे फूल पलाश

सिंदूरी रंग साँझ की
मल गये नरम कपोल
तन सजे रेशमी चुनर-सी
केसरी फूल पलाश

आमों की डाली पे गाये
कोयलिया विरहा राग
अकुलाहट हिय पीर उठे
हृदय फूटे फूल पलाश

गंधहीन पुष्पों की बहारें
मृत अनुभूति के वन में
दावानल सा भ्रमित होता
मन छलने लगे पलाश