Wednesday, September 7, 2016

ये दुनिया किसी के बगैर अधूरी नहीं होती...डॉ. विजय कुमार सुखवानी



इन्सान की हर ख्वाहिश पूरी नहीं होती
हर अर्ज़ी की किस्मत में मंजूरी नहीं होती

कौन कहता है फ़ासले दूरी से होते हैं
फ़ासले वहीं होते हैं जहाँ दूरी नहीं होती

दुनियादारी के फैसले तो ज़ेहन से होते हैं
इनमें दिल की रजामंदी ज़रूरी नहीं होती

बेवफ़ाई कुछ लोगों की फितरत होती है
हर बेवफ़ाई के पीछे मजबूरी नहीं होती

वो लोग नाकाम रहते हैं दुनिया में अक्सर
जिनसे मेहनत तो होती है जीहजूरी नहीं होती

ये भरम है कि हमीं से मुकम्मल है दुनिया
ये दुनिया किसी के बगैर अधूरी नहीं होती
-डॉ. विजय कुमार सुखवानी

Tuesday, September 6, 2016

मैं मुक्त हूँ !!!..सीमा सदा सिंघल

मैं मुक्त हूँ !!!
+++++++++

मैं धरोहर हूँ तुम्हारी
निःसंकोच हो तुम 
करो मेरी बात
मुक्ति की अभिलाषा
ना कल मुझमें थी
ना आज है ना आगे होगी
मैं ठहरता नहीं
ये और बात है
गत..विगत..आगत के
हर एक क्षण में
समाहित मैं
एक उत्सव की तरह
जो अपना ले सो अपना ले
मिथ्या अभिमान से 
परे मैं बस जीता हूँ
क्षण-प्रति-क्षण में !!!

....

मैं मुक्त हूँ 
सर्वबंधनों से
चाहो तो परख लो
बांधकर मुझे
या फ़िर अपना लो 
जिस रूप मैं मिलूँ 
मैं तुम्हारा हो जाऊँगा !!!

-सीमा 'सदा' सिंघल

Monday, September 5, 2016

इसलिए मै टूट गया …..फेसबुक


एक राजमहल में कामवाली और उसका बेटा काम करते थे!
एक दिन राजमहल में कामवाली के बेटे को हीरा मिलता है।
वो माँ को बताता है….
कामवाली होशियारी से वो हीरा बाहर फेककर कहती है ये कांच है हीरा नहीं…..
कामवाली घर जाते वक्त चुपके से वो हीरा उठाके ले जाती है।
वह सुनार के पास जाती है…
सुनार समझ जाता है इसको कही मिला होगा,
ये असली या नकली पता नही इसलिए पूछने आ गई.
सुनार भी होशियारी से वो हीरा बाहर फेंक कर कहता है!! 
ये कांच है हीरा नहीं।
कामवाली लौट जाती है। सुनार वो हीरा चुपके सेे उठाकर जौहरी के पास ले जाता है,
जौहरी हीरा पहचान लेता है।
अनमोल हीरा देखकर उसकी नियत बदल जाती है।
वो भी हीरा बाहर फेंक कर कहता है ये कांच है हीरा नहीं।
जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फेंकता है…उसके टुकडे टुकडे हो जाते है…
यह सब एक राहगीर निहार रहा था…वह हीरे के पास जाकर पूछता है…
कामवाली और सुनार ने दो बार तुम्हे फेंका…तब तो तूम नही टूटे…
फिर अब कैसे टूटे? हीरा बोला….
कामवाली और सुनार ने दो बार मुझे फेंका
क्योंकि…वो मेरी असलियत से अनजान थे।
लेकिन….जौहरी तो मेरी असलियत जानता था…
तब भी उसने मुझे बाहर फेंक दिया…यह दुःख मै सहन न कर सका…
इसलिए मै टूट गया …..

ऐसा ही…
हम मनुष्यों के साथ भी होता है !!!
जो लोग आपको जानते है,
उसके बावजूद भी आपका दिल दुःखाते है
तब यह बात आप सहन नही कर पाते….!
इसलिए….
कभी भी अपने स्वार्थ के लिए करीबियों का दिल ना तोड़ें…!!
हमारे आसपास भी… बहुत से लोग… हीरे जैसे होते है !
उनकी दिल और भावनाओं को .. कभी भी न दुखाएं…
और ना ही… उनके अच्छे गुणों के टुकड़े करिये…!!

फेसबुक, हंसमुख जी के वाल से

Sunday, September 4, 2016

राजेन्द्र नाथ रहबर पड़ी रहेगी अगर ग़म की धूल शाख़ों पर...........राजेन्द्र नाथ 'रहबर'


पड़ी रहेगी अगर ग़म की धूल शाख़ों पर
उदास फूल खिलेंगे मलूल शाखों पर।

अभी न गुलशन-ए-उर्दू को बे-चराग कहो
खिले हुए हैं अभी चंद फूल शाख़ों पर

निकल पड़े हैं ह़िफ़ाज़त को चंद कांटे भी
हुआ है जब भी गुलों का नुज़ूल शाख़ों पर

हवा के सामने उलकी बिसात ही क्या थी
दिखा रहे थे बहारें जो फूल शाख़ों पर ।

निगार-ए-गुल हो मिला है ये इज़्न बुलबुल को
हुआ है हुक्म गुल-ए-तर को झूल शाख़ों पर ।

वो फूल पहुंच न जाने कहां-कहां 'रहबर'
नहीं था जिनको ठरहना कुबूल शाख़ों पर ।

-राजेन्द्र नाथ  'रहबर'

..रसरंग से

Saturday, September 3, 2016

जिसकी है नमकीन ज़िन्दगी............श्यामल सुमन



जो दिखती रंगीन ज़िन्दगी
वो सच में है दीन ज़िन्दगी

बचपन, यौवन और बुढ़ापा
होती सबकी तीन ज़िन्दगी

यौवन मीठा बोल सके तो
नहीं बुढ़ापा हीन ज़िन्दगी

जीते जो उलझन से लड़ के
उसकी है तल्लीन ज़िन्दगी

वही छिड़कते नमक जले पर
जिसकी है नमकीन ज़िन्दगी

दिल से हाथ मिले आपस में
होगी क्यों ग़मगीन ज़िन्दगी

जो करता है प्यार सुमन से
वो जीता शौकीन ज़िन्दगी

-श्यामल सुमन
shyamalsuman@yahoo.co.in

Friday, September 2, 2016

मंजिल मिले न मिले...विजय कुमार सुखवानी



न मिली छांव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले
वीरान ही मिले सफ़र में जो भी शहर मिले

मंजिल मिले न मिले, मुझे काई परवाह नहीं
मुझे तलाश है मंज़िल की, मंज़िल को ख़बर मिले

हर गुनाह इंसान के चेहरे पर दर्ज रहता है
देखना अगर किसी रोज़ आईने से नज़र मिले

छोटी - सी बात का लोग फ़साना बना देते हैं
अब कैसे यहां लोग किसी से कोई खुलकर मिले

सबको मिला कुछ न कुछ ख़ास क़ुदरत से
फूलों को मिली ख़ुशबू परिन्दो को पर मिले

बहुत मुश्किल से मिलता है कोई चाहने वाला
खोना मत तुम्हें कोई शख़्स ऐसा अगर मिले

कहां हूँ किस हाल में हूँ कोई बताए मुझे
एक मुद्दत हुई मुझे अपनी ही खबर मिले

-विजय कुमार सुखवानी
v_sukhwani@rediffmail.com

Thursday, September 1, 2016

आदाब अर्ज़ है....दैनिक भास्कर की पुरानी कतरन..2011

दैनिक भास्कर की पुरानी कतरन..2011


बैठे-बैठे गम में गिरफ्तार हो गए
किसी के प्यार में आबाद हो गए।
दो गज जमीन मिल ही गई मुझ गरीब को
मरने के बाद हम भी जमींदार हो गए।
-निकुंज आशर, सिवनी (मप्र)

कहने को आपका शहर मेरा भी शहर है,
इस शहर के भीतर का बियाबान देखिए।
मिल जाए गर फुर्सत किसी को कुछ पलों की
इस भीड़ में तन्हा-सा इक भगवान देखिए।
-पंकज सारस्वत, हनुमानगढ़ (राज)

ये काली घटाएं छट जाएंगी
और मोहक बदलियां बरस जाएंगी
गर प्रिय से मिलन जो हो न सका
ये बहारें सावन की लुट जाएंगी।
-सुगनचंद्र ‘नलिन’, गुना (मप्र)


मीठा सा दर्द होता है, कभी ज्यादा कभी कम
तेरे प्यार का है असर, या है कोई दर्द-ए-ग़म
बरसात तो नहीं मगर, बदला-सा है मौसम
दिल की ज़मीं पे बरसी है प्यार की शबनम
-शैलेश, जयपुर (राजस्थान)

ख़ामोश गुज़र जाते हैं वो क़रीब से
सवाल उठते हैं दिल में अजीब से
वो ख़फ़ा हैं या ये उनकी है अदा
शिकायत क्या करें अपने नसीब से
-विशाल जैन, छतरपुर (छत्तीसगढ़)

कौन कहता है, उसके बिना मैं मर जाऊंगा
मैं तो दरिया हूं, सागर में उतर जाऊंगा
वो तरस जाएंगे प्यार की इक बूंद के लिए
मैं बादल की तरह किसी पर भी बरस जाऊंगा
-निकुंज आशर, सिवनी (मध्यप्रदेश)

खामोश रहकर क्यूं हमें जलाते हैं वो
अपनी यादों से हमें क्यूं रुलाते हैं वो।
तस्वीर भी नहीं है मेरे पास उनकी
तो क्यूं बंद आंखों में नजर आते हैं वो।
-ज्ञानेश्वर गेण्डरे, सिमगा, रायपुर (छग)

यूं पड़ रही है चांदनी उनके शबाब पर
जैसे शराब खुद ही फिदा हो शराब पर।
उसके बरक-बरक को उड़ा ले गई हवा
मैंने तुम्हारा नाम लिखा जिस किताब पर।
-उमाश्री, होशंगाबाद (मप्र)

हथेलियों पर उनका नाम जब लिखती हैं उंगलियां
जमाने की चारों तरफ उठती हैं उंगलियां।
बड़े मुद्दतों के बाद आया उनका हाथ मेरे हाथों में
आज भी उन हसीन लम्हों को याद करती हैं उंगलियां।
-उमेश गोस्वामी, सिमगा (छग)

लबों से छूके वो ताजा गुलाब देता है
कि जैसे फूल में भरकर शराब देता है
चलो वो कहता है तुम साथ मेरे खजुराहो
मैं चुप रहूं तो दुपट्टा जवाब देता है।
-उमाश्री, होशंगाबाद (मप्र)

उसकी याद में हम बरसों रोते रहे
बेवफा वो निकले बदनाम हम होते रहे
प्यार में मदहोशी का आलम तो देखिए
धूल चेहरे पे थी हम आईना धोते रहे।
-सुरेश कुमार मेघवाल, कोछोर, सीकर (राज)

रिश्तों में वो पहले वाली बात नहीं रही
दिल में संजो लें ऐसी सौगात नहीं रही
मोहब्बत विज्ञापन या प्रोडक्ट बन गई है
दीवाना कर दे ऐसी मुलाकात नहीं रही।
-सुधा गुप्ता अमृता, कटनी (मप्र)

पास आपके दुनिया का हर सितारा हो
दूर आपसे गम का किनारा हो
जब भी आपकी पलकें खुलें सामने वही हो
जो आपको दुनिया में सबसे प्यारा हो।
-कु. रागिनी तायवाड़े, राजनांदगांव (छग)

तमाम ख्वाब देखे एक और देखना है
कभी रूबरू जब होंगे जी भरके देखना है
हम तो हंसते मुस्कराते हुए जी रहे हैं
बस इसी दीवानगी का असर देखना है।
-उर्मिला यादव, भोपाल (मप्र)

सपना किसी भी आंख के अंदर नहीं मिलता
शोले धधक रहे हैं समंदर नहीं मिलता
मुट्ठी में रख सके जो मुकद्दर को बांध के
इस दौर में ढूंढे तो सिकंदर नहीं मिलता।
-अविनाश बागड़े, नागपुर (महाराष्ट्र)

सखियों से मेरी बातें किया करते हैं, 
जिंदगी से हमारी हमेशा खेला करते हैं। 
जमीन पर मेरा नाम लिखते और मिटाते हैं, 
उनका गुजरता वक्त है,हम मिट्टी में मिल जाते हैं।
-प्रदीप तम्बोली, प्रतापगढ़ (राज.)

नफ़रतों की नहीं कोई बयार है नारी, 
मां की ममता है, बहन का प्यार है नारी। 
ये नए रिश्तों को बखूबी निभा लेती, 
आन पे बन आए तो तलवार है नारी।
-अमर मलंग, कटनी (मप्र)

कुछ लोग जरा-सा सबर नहीं रखते 
इंसान पहचानने की नजर नहीं रखते 
चीर तो सकते हैं पहाड़ों का सीना 
हम सच बोलने का मगर जिगर नहीं रखते।
-नरेंद्र तायवाड़े, राजनंदगांव (छग)