Thursday, October 10, 2013

अन्दाज़ा नहीं था...........उर्मिला निमजे


समय खुद को 
इतनी जल्दी दोहराएगा  
अन्दाजा नहीं था

अभी कुछ दशक
पहले ही तो
छोड़कर गया था
 अपने पिता को

आज मुझे 
मेरा पुत्र छोड़ कर 
गया है 

उस समय भी
पिता की
आँखे भर आई होंगी

निश्चित ही
मैंने देखा नहीं था
पलटकर

मैंनें जो फैसला लिया था
वह परम्परा बन जाएगी
अन्दाज़ा ही नहीं था

-उर्मिला निमजे

सौजन्यः मधुरिमा, बुधवार, 9 अक्टूबर, 2013


Wednesday, October 9, 2013

दूर की रौशनी नज़दीक आने से रही............निदा फ़ाज़ली


दिन सलीके से उगा रात ठिकाने से रही
दोस्ती अपनी भी कुछ दिन ज़माने से रही

चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसाविर आँखें
ज़िन्दगी रोज तस्वीर बनाने से रही

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शमा जलाने से रही

फासला चाँद बना देता है पत्थर को
दूर की रौशनी नज़दीक आने से रही

शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की फुर्सत
अपनी इज्ज़त भी यहाँ हंसने-हंसाने से रही..

-निदा फ़ाज़ली
मशहूर श़ाय़र और नग़मा निगार
जन्मः 12 अक्टूबर, 1938
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
 

Tuesday, October 8, 2013



चांद तारों को भी तस्खीर तो करते रहिये
बन्दगी की है ये मेराज कि नीचे रहिये

आगे बढ़ने की ये जिद, जान भी ले सकती है
शाह्जादे यही बेहतर है कि पीछे रहिये

जो भी होना है वही ज़िल्ले-इलाही होगा
आप क्यूं फिक्र करें, आप तो पीते रहिये

है बगावत यहाँ कद अपना बढ़ाने का ख्याल
सिर्फ साये में बड़े लोगों के जीते रहिये

एक से हाथ मिलाया तो मिलाएंगे सभी
भीड़ में हाथ को अपने अभी खींचे रहिये

रास्तो! क्या हे वोह लोग जो आते जाते
मेरे आदाब पे कहते थे कि जीते रहिये

अज्मत-ए-बखियागिरी इस में है 'अजहर साहब'
दूसरे चाक गिरेबान भी सीते रहिये

अजहर इनायती

Monday, October 7, 2013

एक यायावर मेघपुंज हूं....................हर नारायण शुक्ला


नभ में उड़ा जा रहा हूं
एक यायावर मेघपुंज हूं।

नीचे धरती का विस्तार,
ऊपर नीला गगन विशाल,
सृष्टि की रचना से विस्मित,
प्रभु का देखूं रूप विराट।

मैं हूं श्यामल जलागार,
बरसाऊं शीतल फुहार,
विद्युत मेरा अलंकार,
ध्वनि से कर दूं चमत्कार,
कभी वर्षा करूं कभी हिमपात,
कभी करूं मैं वज्रपात।

विरही का मैं मेघदूत,
चातक की मैं आशा,
मुझे देख नाचे मयूर,
सबकी बुझे पिपासा।

नभ में उड़ा जा रहा हूं,
एक यायावर मेघपुंज हूं।

- हर नारायण शुक्ला

Friday, October 4, 2013

मैं अपनी सलीब आप उठा लूँ.................अहमद नदीम क़ासमी


फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ
आंखो को बुझा लूँ कि हक़ीक़त को बदल दूं

हक़ की बात कहूंगा मगर ऐ जुर्रत-ऐ- इज़हार
जो बात न कहनी हो वही बात न कह दूं

हर सोच पे खंजर-सा गुज़र जाता है दिल से
हैरां हूं कि सोचूं तो किस अंदाज़ में सोचूं

आंखे तो दिखाती हैं फ़क़त बर्फ़-से पैकर
जल जाती हैं पोरें जो किसी जिस्म को छू लूं

चेहरे हैं कि मरमर से तराशी हुई लौहें
बाज़ार में या शहरे-ख़ामोशां में खड़ा हूं

सन्नाटे उड़ा देते हैं आवाजों के पुर्ज़े
यारों को अगर दस्त-ए-मुसीबत में पुकारूँ

मिलती नहीं जब मौत भी मांगे से, तो या रब
हो इज़्न तो मैं अपनी सलीब आप उठा लूँ

-अहमद नदीम क़ासमी

हक़ः सच, जुर्रत-ए- इज़हारः अभिव्यक्ति का साहस, बर्फ़-से पैकरः आकृति, 
लौहें: पत्थर के टुकड़े सलीब लिखकर क़ब्र में लगाते हैं,
शहरे-ख़ामोशां: क़ब्रिस्तान, दस्त-ए-मुसीबतः मुसीबत का जंगल, 
इज़्नः इज़ाज़त

यह रचना मुझे दैनिक भास्कर के रसरंग पृष्ट से प्राप्त हुई

Thursday, October 3, 2013

शुभ है केवल साथ तेरा.............विजय कुमार सिंह


अब न नभ तक कोई तारक
और ओझल चंद्रमा है
है तो नीरवता ही केवल
कालिमा ही कालिमा है

नींद में हैं सब अभी भी
वृक्षों पर खग कुल बसेरा
यह निशा का घन अंधेरा
शुभ है केवल साथ तेरा

तेरी सांसों की मैं खुशबू
अपनी सांसों आज ले लूं
खोल दो ‍तुम केश अपने
प्यार से जी भर के खेलूं

ले के पलभर को टिका लो
अपने कांधे सर ये मेरा
यह निशा का घन अंधेरा
शुभ है केवल साथ तेरा

आ मिला दो धड़कनों को
आज मेरी धड़कनों से
मुक्त होने दो मुझे फिर
काल के इन बंधनों से

बांध लो कसकर मुझे तुम
डालकर बांहों का घेरा
यह निशा का घन अंधेरा
शुभ है केवल साथ तेरा

आओ मेरे पास आओ
मुंह हथेली आज भर लूं
चूम लूं अधरों को तेरे
होठों को होठों में ले लूं

झांक कर तेरे नयन फिर
खोज लूं एक नव सवेरा
यह निशा का घन अंधेरा
शुभ है केवल साथ तेरा।

- विजय कुमार सिंह

Wednesday, October 2, 2013

वो मिल जाता है अपने अशआर में................डॉ मुहम्मद आज़म



सम्हालो मुझे अब भी घर-बार में
कहीं दिल न लग जाय बाज़ार में

जब अपने मुक़ाबिल हूं तकरार में
ख़ुशी जीत में है न ग़म हार में

अरे मोजिज़ा हो गया आज तो
छपी है ख़बर सच्ची अख़बार में

सज़ा से ख़ता पूछती है ये क्या
बुराई थी इतनी गुनहगार में

गिरेबानो-दामन न हो जांय चाक
उलझ कर न रह जाना दस्तार में

क़लम के सिपाही का डर था कभी
क़लम की भी गिनती थी हथियार में

फ़रिश्ता नहीं एक इंसान हूं
कई खोट हैं मेरे किरदार में

ख़मोशी बग़ावत की तम्हीद है
छुपा खौफ़ होता है यलग़ार में

भला इस क़दर तेज़ चलना भी क्या
कि मंज़िल निकल जाय रफ़्तार में

मुलाक़ात ‘आज़म’ से मुश्किल नहीं
वो मिल जाता है अपने अशआर में

डॉ मुहम्मद आज़म 09827531331
http://wp.me/p2hxFs-1nN