8 सितंबर 1933, -12 अप्रैल 2026
-दिग्विजय
8 सितंबर 1933, -12 अप्रैल 2026
-दिग्विजय
छठी के परव पावन
पत्नी का हाथ थामें टहलते हुए पार्क के गेट से बाहर निकल ही रहा था कि
वहीं खड़े रिक्शाचालक ने उससे पूछ लिया।
"भई रिक्शा तो मैं ले लेता! लेकिन मुझे चलाना नहीं आता।"
वह पत्नी की ओर देख उस हमउम्र रिक्शा चालक से मजाक कर गया।
उसकी बात सुन रिक्शा चालक को भी हंसी आई।
"नहीं साहब! मेरा मतलब था कि आपको कहीं जाना हो तो मैं छोड़ दूं।"
"जाना तो है लेकिन वापस छोड़ना यही होगा।" उसकी पहेली जैसी बातों को पत्नी समझ पाती उससे पहले ही सड़क के उस पार पार्किंग एरिया में गाड़ी संग इंतजार करते ड्राइवर को एक हाथ हिला थोड़ा और इंतजार करने का इशारा कर वह पत्नी का हाथ थामें रिक्शे की पिछली सीट पर जा बैठा।"
बताइए साहब! कहां जाना है?" रिक्शा चालक ने रिक्शा आगे बढ़ा दिया।
"स्टेशन वाले हनुमान जी के दर्शन करवा दो!" उसके इतना कहते ही रिक्शा थोड़ा आगे बढ़ स्टेशन जाने वाली मुख्य सड़क की ओर मुड़ गया।
पत्नी संग मुश्किल से रिक्शे की सीट में खुद को एडजस्ट करने की कोशिश करते हुए उसने रिक्शा चालक से यूंही बातचीत की शुरुआत कर दी।
"दिन भर में कितना कमा लेते हो इस रिक्शे से?"
"दिन भर में पेट भरने लायक कमाना भी अब मुश्किल होता है साहब! और अगर किसी दिन रिक्शे की मरम्मत करवानी पड़ी तो भूखे पेट सोने की नौबत आ जाती है।"
"लेकिन अब तो ई-रिक्शा खूब चल रहा है! उसे चलाने में मेहनत भी कम है और
कमाई ज्यादा, वह क्यों नहीं ले लेते?"
"कीमत भी तो ज्यादा है ना साहब! पेट काटकर मैंने भी कुछ पैसे जोड़े हैं
लेकिन ई-रिक्शा अभी सपना है।"
"तुम्हारे लायक एक काम है जिससे तुम्हारे इसी रिक्शे से ई-रिक्शा
वाला सपना सच होने में थोड़ी मदद हो जाएगी! करोगे?"
"करेंगे साहब! क्यों नहीं करेंगे?"
"तनख्वाह भी मिलेगी!"
"तनख्वाह!" किराए की जगह तनख्वाह सुन रिक्शाचालक को आश्चर्य हुआ।
"हां रुपए रोज नहीं मिलेंगे और ना ही तनख्वाह में रविवार या छुट्टी के कटेंगे!"
"लेकिन साहब करना क्या होगा?"
"तुम्हें रोज सुबह दस बजे अपने रिक्शे से मुझे मेरे घर से मेरे दफ्तर पहुंचाना होगा।" पति द्वारा उस रिक्शा चालक को मौखिक नियुक्ति पत्र मिलता देख उसकी पत्नी अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पाई बीच में ही बोल पड़ी।
"लेकिन ड्राइवर का क्या?"
"मोहतरमा! उसकी तनख्वाह भी दी जाएगी क्योंकि
गाड़ी और ड्राइवर हम आप के हवाले कर रहे हैं।"
"क्यों?"
"ताकि आप फिर से सुबह-सुबह गोल्फ कोर्स जाना शुरू कर सके और हम दोनों पहले की तरह रिक्शे की सीट में आराम से फिट हो सके।"
पचपन वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह चुस्त वह अपनी पत्नी को भी सेहत के प्रति सजग होने का संकेत दे गया और कई वर्ष पहले पीछे छूट चुके अपने पसंदीदा खेल का नाम सुन उसकी पत्नी के चेहरे पर भी एक ताजी मुस्कान छा गई।
पति-पत्नी के आपसी गुफ्तगू को अल्पविराम मिला देख रिक्शा चालक ने उसके संग अपने अधूरे समझौते पर उसकी पक्की मोहर लगवाना जरूरी समझा
"साहब! अपना घर दिखा दीजिए और दफ्तर बता दीजिए।"
"यह सामने चौराहे के बगल में जो पहला बंगला देख रहे हो ना! वही मेरा घर है और यहाँ से रोज मुझे मेरे दफ्तर यानी यहां के हाईकोर्ट पहुंचाना है।" उसने स्टेशन से पहले मोड वाले चौराहे के बगल में लाइन से खड़े बंगलों में से एक बंगले की ओर इशारा किया।
बंगले को एक नजर गौर से देख रिक्शा चालक ने चौराहे से रिक्शा स्टेशन वाले हनुमान मंदिर की ओर मोड़ लिया।
"हाईकोर्ट में आप क्या करते हैं साहब?" उसकी जमीन से जुड़ी सादगी देख रिक्शा चालक जिज्ञासावश उससे पूछ बैठा।
"बस! वकीलों और गवाहों को सुनता रहता हूं!"
"समझ गया साहब! मेहनत के बदले तनख्वाह का फैसला करने के बावजूद आपने किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया। जरूर आप जज होंगे। है ना साहब?" वह मुस्कुराता चुप रहा किंतु पत्नी उसकी ओर देख बोल पड़ी
"अदालत से बाहर भी आप अपनी आदत से बाज नहीं आते!"
- पुष्पा कुमारी "पुष्प"
वात्सल्य
ट्रेन का खचाखच भरा डिब्बा बेतहाशा गर्मी,
सामने वाली बर्थ पर एक माँ अपने बच्चे को चुप कराने में लगी। बच्चा रोता रहा,
माँ की डांट भी उसे चुप नहीं करा सकी, इस तरफ की बर्थ पर एक माँ अपने लाडले को
दूध की बोतल मुंह में दिए थी,
रोता बच्चा चुप होकर सो गया।
माँ ने सामने वाले माँ और जिद करते बच्चे को देखा,
भूख से वह भी रो रहा था, कोई डांट-फटकार उसे चुप नहीं करा पा रही थी,
भूखा है बच्चा तुम्हारा। कब से देख रही हूं, ...
बुरा न मानो तो ये बचा दूध उसे पिला दो,
दूसरी मां ने बिना ना-नुकुर किए बच्चे के मुख में बोतल दे दी।
बच्चे की क्या जात?
कम्पार्टमेन्ट में कुछ आवाजें. किसी ने कहा-और मां की भी कोई जाति होती है ?
पूरा डिब्बा वात्सल्य रस से सराबोर था।
दोनों माताएं अपने लाडले को देख आश्वस्त हुई जा रही थी।
सोच की गुलामी
डॉ. श्याम सखा श्याम
स्मृतियों की झालर
हथेलियों पर गुलाबी अक्षर
"अंधेरे में संवाद"
जन्मदिन का उपहार
सुभाष (मेरे पति) ने सुबह ही कहा -
"आज कुछ बनाना नहीं। लंच के लिए हम बाहर चलेंगे।
तुम्हारे जन्मदिन पर आज तुम्हें एक अनोखी ट्रीट मिलेगी।"
16 साल हो गए हमारी शादी को, मैं सुभाष को बहुत अच्छे से जानती हूँ।
दोनों बच्चे शाम 4 बजे स्कूल से लौटेंगे; यानी लंच पर
मैं और सुभाष ही जाएंगे और
बच्चों के आने से पहले लौट भी आएँगे।
एक नए बने मॉल की पार्किंग में हमारी गाड़ी पहुँची।
पाँचवीं मंजिल पर खाने पीने के ढेरों स्टॉल्स थे।
फाइनली एक बंद द्वार पर हम पहुँचे।
द्वार पर एक बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था:
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
"अंधेरे में संवाद" !
ये कैसा नाम है, रेस्टॉरेंट का ?
बड़ा विचित्र लग रहा था सब कुछ।
अगले मोड़ के बाद इतना अंधेरा हो गया कि,
मैंने सुभाष का हाथ पकड़ लिया और
फिर शायद हम एक हॉल में पहुँचे।
एक सूट बूट धारी आदमी ने किसी को आवाज लगाई - "संपत।"
“ये आज के हमारे स्पेशल गेस्ट हैं। आज मैडम का बर्थडे है। गिव देम स्पेशल ट्रीट।
(उन्हें विशेष सेवायें दीजिये) ऑर्डर मैंने ले लिया है,
तुम इन्हें इनकी टेबल पर लेकर जाओ।"
अब उस दूसरे आदमी संपत ने सुभाष के हाथ थामे और
मैं सुभाष के हाथ थामे रही।
उसने हमें टेबल पर पहुँचाया। हम बैठ गए।
मैंने सामने टेबल पर हाथ फिराया।
जब टेबल ही नहीं दिख रहा तो खाना कैसे दिखेगा ?
हम खाना कैसे खाएंगे ?
ये कैसा जन्मदिन का उपहार है ?
ऐसे न जाने कितने प्रश्न मेरे दिमाग में घुमड़ रहे थे, लेकिन मुझे सुभाष पर भरोसा था; फिर टेबल पर प्लेट्स आदि सजाए जाने की आवाजें आने लगीं। वेटर्स का आना जाना समझ में आ रहा था।
फिर वो प्लेट्स में खाना सर्व करने लगा।
"मैंने परोस दिया है। अब आप लोग शुरू कीजिए।
आपको कुछ दिखेगा नहीं;
लेकिन मुझे विश्वास है कि, स्पर्श और खुशबू से आपको खाने में एक अलग ही आनंद प्राप्त होगा।"
किसी वेटर ने कहा।
उस घनघोर अंधेरे में मैंने रोटी तोड़ी, प्लेट में रखी सब्जी को लपेटा
और पहला निवाला लिया।
उल्टे हाथ से मैंने प्लेट पकड़ी हुई थी; अतः प्रत्येक पदार्थ की जगह
सीधे हाथ के स्पर्श से मुझे ज्ञात हो रही थी।
और फिर, आहा... अंधेरे में भी खाने के पदार्थ तो अपने स्वाद का मजा दे ही रहे थे; लेकिन साथ ही मैं पूछ रही थी और ऐसे ही सुभाष मुझसे पूछता जा रहा, खुशबू, स्पर्श और आवाज बस यही काम कर रहे थे।
बीच बीच में संपत, सब्जियाँ या अन्य कुछ और परोस देता।
मेरा जन्मदिन, अंधेरे में लंच, एक अनोखा आनंद दे गया;
कैंडल लाइट डिनर से भी अधिक आनंददायक रहा।
"आप जब, बाहर जाना चाहें तो बताइएगा। मैं आपको बाहर छोड़ आऊँगा।" - संपत ने कहा।
तो सुभाष बोल पड़ा :
"हाँ... हाँ... अब चलो।
बिल भी तो बाहर ही पे करना है।
चलो संपत, ले चलो हमें।"
फिर संपत ने हम दोनों के हाथ थामे और हमें बाहर को ले चला।
अंधेरे हॉल से बाहर निकल हम
दो मोड़ों के बाद प्रकाश दिखने लगा और
हम संपत का हाथ छोड़ उसके पीछे चलते रहे।
उसका आभार मानने के लिए मैंने उसे आवाज लगाई तो
संपत पलटा और मेरी ओर देखने लगा।
तब कमरे के प्रकाश में मैंने संपत का चेहरा देखा और
मेरे मुँह से हल्की चीख निकल गई क्योंकि,
संपत की आँखों की जगह दो अंधेरे गड्ढे नजर आ रहे थे।
वो पूर्ण रूप से अंधा था।
संपत बोला - "यस मैडम ?"
मैं समझ नहीं पा रही थी कि, क्या कहूँ ? फिर मैंने कहा -
"संपत, अपनी ऐसी हालत में भी तुमने,
हमारी खूब सेवा, इतनी बढ़िया खातिरदारी की,
मैं ये बात सारी जिंदगी नहीं भूलूँगी।"
संपत - "मैडम, आपने जिस अंधेरे को आज अनुभव किया है
वो तो हमारा रोज का ही है।
लेकिन हमने उस पर विजय पा ली है,
We are not disabled, we are Differently Abled People...
We can lead our Life without any Problem with
all Joy and Happiness as you Enjoy...”
"हम विकलांग नहीं हैं, हम अलग तरह से सक्षम लोग हैं... हम अपना जीवन
बिना किसी समस्या के पूरे आनंद और खुशी के साथ जी सकते हैं..."
बिना किसी की सहानुभूति के मोहताज; एक सशक्त व्यक्ति से आज सुभाष ने मुझे मिलवाया,
ऐसा जन्मदिन मुझे कभी नहीं भूलेगा।
सुभाष बिल देकर मेरे पास आया। हमेशा सुभाष को उसकी फिजूलखर्ची के चिल्लाने वाली मैंने,
बिल को देखा तो मेरी नजर
बिल पर सबसे नीचे लिखे प्रिंटेड शब्दों पर ठहर गई…।
:लिखा था:
We do not accept tips, Please think of Donating your Eye's,
which will bring light to Somebody's ’s Life.
(हम टिप्स स्वीकार नहीं करते। कृपया अपने नेत्रदान के बारे में सोचें, जो किसी के जीवन में रोशनी ले आएगा।)
मैं निशब्द थी!
मोरल ऑफ द स्टोरी
कितनी आसानी से हम अपने जीवन की कमियों के लिए हर समय शिकायत करते रहते हैं, बिना यह विचार किये कि परमात्मा ने हमें जो कुछ दिया है, वह भी कम नहीं है। एक स्वास्थ्य शरीर के साथ हम ऐसे बहुत कुछ कर सकते हैं जो एक अपाहिज शायद नहीं कर सकते फिर भी वे हमसे अधिक सुखी और खुशहाल जीवन जीते हैं।
तो हमें किसी दूसरे के जीवन में खुशियां लाने के बारे सोचना चाहिए, बजाय इसके कि हम हमारे जीवन की कमियों के बारे में शिकायत करें।
हनुमान जन्मोत्सव पर अशेष शुभकामनाएं
हनुमान जी और अंगद जी दोनों ही समुद्र लाँघने में सक्षम थे, फिर पहले हनुमान जी लंका क्यों गए?
अंगद जी बुद्धि और बल में बाली के समान ही थे! समुद्र के उस पार जाना भी उनके लिए बिल्कुल सरल था। किन्तु वह कहते हैं कि लौटने में मुझे संसय है।
कौन सा संसय था लौटने में?
बालि के पुत्र अंगद जी और रावण का पुत्र अक्षय कुमार दोनों एक ही गुरु के यहाँ शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।
अंगद बहुत ही बलशाली थे और थोड़े से शैतान भी थे।
वो प्रायः अक्षय कुमार को थप्पड़ मार देते थे जिससे की वह मूर्छित हो जाता था।
अक्षय कुमार बार बार रोता हुआ गुरुजी के पास जाता और अंगद जी की शिकायत करता, एक दिन गुरुजी ने क्रोधित होकर अंगद को श्राप दे दिया कि अब यदि अक्षय कुमार पर तुमने हाथ उठाया तो तुम उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।
अगंद जी को यही संसय था कि कहीं लंका में उनका सामना अक्षय कुमार से हो गया तो श्राप के कारण गड़बड़ हो सकती है, इसलिए उन्होंने पहले हनुमान जी से जाने को कहा। और ये बात रावण भी जानता था, इसलिए जब राक्षसों ने रावण को बताया बड़ा भारी वानर आया है और अशोक वाटिका को उजाड़ रहा है तो रावण ने सबसे पहले अक्षय कुमार को ही भेजा वह जानता था वानरों में इतना बलशाली बाली और अंगद ही है जो सो योजन का समुंद्र लांघ कर लंका में प्रवेश कर सकते हैं, बाली का तो वध श्री राम के हाथों हो चुका है तो हो न हो अंगद ही होगा और अगर वह हुआ तो अक्षय कुमार उसका बड़ी सरलता से वध कर देगा।
किन्तु जब हनुमान जी ने अक्षय कुमार का राम नाम सत्य कर दिया और राक्षसों ने जाकर यह सूचना रावण को दी तो उसने सीधे मेघनाथ को भेजा और कहा उस वानर को मारना नहीं बंदी बनाकर लाना में देखना चाहता हूँ बाली और अंगद के सिवाय और कोनसा वानर इतना बलशाली है।
हनुमान जी ज्ञानिनामग्रगण्यम् है वह जानते थे जब तक अक्षय कुमार जीवित रहेगा अंगद जी लंका में प्रवेश नहीं कर पाएंगे, इसलिए हनुमान जी ने अक्षय कुमार का वध किया जिससे अंगद जी बिना संसय के लंका में प्रवेश कर सके और बाद में वह शांति दूत बन कर गए भी।
रामायण
ऐसा क्या है जो भारत से अच्छा पाकिस्तान में हो ?
वहां का कश्मीर ,भारत के कश्मीर से ज्यादा खूबसूरत है ,
वहां हिंगलाज मंदिर है। वो हिन्दुओ के 51 शक्तिपीठों में से एक है ।
जहाँ सती माता का सर काट के गिरा था।
वहीं पर वेदों की रचना हुई थी।
जिसे सप्तसैंधव प्रदेश कहते है। वहां सात नदियां थी।
1 सिंधु
2 सरस्वती
3 वितस्ता (झेलम)
4 अस्किनी (चिनाब)
5 पुरुष्णी (रावी/ इरावदी)
6 शतुद्रि (सतलज)
7 विपासा (व्यास)
वो सब पाकिस्तान में ही है।
ऋग्वेद में बहुत सी नदियों का उल्लेख है जिसमें से मुख्य नदियां ये भी हैं जो आजादी के बाद पाकिस्तान चली गयी।
कुरुम (कुरुम),
गोमती (गोमल),
कुभा (काबुल)
सुवास्तु (स्वात)
वितस्ता (झेलम)
आस्किनी (चेनाब)
परुष्णी (रावी),
शतुद्रि (सतलज),
विपासा (व्यास)
राजा रणजीत सिंह के टाइम में जो की अंग्रेजो के टाइम में थे तो भारत के अंडर पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान सब भारत के ही अंग थे -
बलूचिस्तान के काळात (कलात) में काली माता का वो प्राचीन मंदिर है जो मुस्लिम धर्म से भी पहले का है। काळात (कलात) को बहुत पवित्र माना जाता है। अहिरावण राम और लक्ष्मण जी को यहीं बलि देने के लिए लाया था। आप लोग हनुमान जी के बेटे को मकरध्वज बोलते हैं मगर उसका असली नाम मकरंद था। उसी के नाम पे मकरान एरिया का नाम पड़ा। जो एरिया ईरान और बलूचिस्तान को मिला कर बना है। वहां बहुत काम हिन्दू हैं जो अभी तक बलूची बोलते हैं। यानि बलूची मूल के हैं।
बाल्मीकि जी वहीँ के थे आज भी उन के ट्राइब के लोग वहां हिन्दू धर्म का पालन कर रहे हैं पर वो एक या दो प्रतिशत ही हैं । तक्षशिला यूनिवर्सिटी जिस में चाणक्य पढ़ाया करता था वो पाकिस्तान में ही है।चरक , पाणिनि और चाणक्य तीनो तक्षशिला से पढ़े है। हलाकि चाणक्य मगध से बिलोंग रखते थे। सेंधा नमक का पहाड़ पाकिस्तान में ही है।
वहां काफिर कलश लोग रहते है। जो हिन्दू धर्म और सिकंदर का मिक्स धर्म अपनाते है। ये लोग काफी खूबसूरत होते हैं।
वहां हिन्दू पख्तून यानि हिन्दू ओरिजिनल पठान लोग रहते है जो 10000 लोग अब बचे हैं। जो पश्तो भाषा बोलते है। हालांकि गुजरात में भी हिन्दू पठान की फैमिली है। लेकिन पठान और पख्तून लोग पहले हिन्दू थे पर अब जो पठान हिन्दू हैं वो लोग बहुत कम होते जा रहे हैं। उसी तरह जैसे बांग्लादेश में बंगाली हिन्दू लोग कम हो रहे है। पर ओरिजिनल जो पख्तून हिन्दू हैं वो अभी अपनी संस्कृति को बचा रखा है।
वहां कटास राज मंदिर है उस का पानी नहीं सूखता है। कहा जाता है की वो महादेव शंकर जी के आंसू से बना है। मुल्तान में सूर्य मंदिर है जिसके बड़े में कहा जाता है की कृष्णा भगवन का बेटा शाम्ब ने बनाया था। वहां का गिलगित बाल्टिस्तान बहुत खूबसूरत है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता पाकिस्तान में है। संग्रीला झील कलश घाटी सब बहुत खूबसूरत डेस्टिनेशन है।
पांच नदियों का देश पंजाब पूरा का पूरा वहां चला गया यहाँ तो छोटा सा भाग है। असली पंजाब जहां पर पांच नदी है वो पाकिस्तान में ही तो है।
कुछ वहां का चित्र डाल रहा हूँ।
ये ट्रांस हिमालय की श्रृंखला है जो पाकिस्तान में हैं
उप्पर कचूरा झील
नीलम घाटी
नीलम घाटी के गांव
बप्पा रावल के नाम पे रावल झील
पाक अधिकृत कश्मीर
पाक अधिकृत कश्मीर में चिट्टा-कथा झील
चेरी के पेड़ो के साथ हुंजा घाटी का दृश्य।
हुंजा घाटी में एप्रीकॉट यानि खुबानी के पेड़।
गिलगित बाल्टिस्तान का एक दृश्य।
काफिर कलश घाटी यहाँ काफिर कलश लोग रहते हैं
स्वाट घाटी
नंगा पर्वत
गिलगित बलिस्तान का रोड
गिलगित बलिस्तान
रावलकोट