Wednesday, October 14, 2020

तुम मूकदर्शक,मैं कामिनी ..प्रगति मिश्रा 'सधु'


तुम मूकदर्शक,मैं कामिनी
हृदय  उद्वेलक, हूँ दामिनी
तुम उज्जवल छटा,मैं कांति
दिव्यर्शन से ही आती शांति
न हिय ने पाई यह भ्रान्ति ।
तुम प्रेम हो, मैं रागिनी
तेरे सुर की हूँ मैं वादिनी।
तुम शीश हो,मैं हृदयस्थल
हृदय तार कंपित
क्षण-क्षण, पल-पल।
जीवन में ऐसे आए हो 
मानो...सोमरस से, छाए हो।
तुम चलते हो यूँ डेंग-डेंग
पग-पग तो मेरे छोटे हैं
वह क्षण जीवन में आते
जो वृन्दावनवासी  खोते हैं।
तुम निद्रा हो,मैं स्वप्न निराली
है निज सुगन्ध खुद पे भारी
यूँ कल-कल करती आयी हूँ
जीवन में तेरे छाई हूँ.... ।।

।।सधु।।

 

8 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना।

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  2. मेरी कविता को यह अवसर प्राप्त होना
    मेरे लिए सौभाग्य की बात है ।
    सादर नमन 🙏

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 14 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15.10.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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