Friday, December 30, 2011

चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक............कुंवर बेचैन


दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक

हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक

जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक

फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

-कुंवर बेचैन

स्वाति बूँद उपहार को पाकर प्रणित करो अनमोल सा मोती ... . . . . . .. मुकेश ठन्ना

..कभी नहीं तुम अपने मृगनयनो में मेरी छवि बसाना ,
.
रस गुलाब से अपने होठों पे ना मेरा नाम सजाना ,,
.
चाहे अपने बदन की खुशबु से ना मेरा घर महकाना ,,
.
नागिन जैसी चाल से अपनी मुझको तुम ना यूँ बहकाना ,,
.
चाहे मुझसे प्रेम ना करना मेरे सपनो में ना खोना ,,
.
दूर कभी तुम मुझसे जाके मेरी यादों में ना रोना

.....परन्तु अंतर्मन के एक कोने में मुझको रहने देना ,,

अपनी स्मृतियों से ओझल तुम कभी न मुझको होने देना ,,

क्योंकि तुम हो मनः प्रेरणा तुम हो मेरी शाश्वत शक्ति ,,

में हूँ सागर शांत स्निग्ध औ तुम हो अविरल सरिता बहती

धाराओं के संग बहना तो विरह व्यथा का एक बहाना ,,

आखिरकार तुम्हे तो आकर मेरे ही अन्दर है समाना ,,

मेरा अस्तित्व है स्वाति बूँद और तुम सलिल की हो एक सीपी ,,

स्वाति बूँद उपहार को पाकर प्रणित करो अनमोल सा मोती ..


. . . . . . .. मुकेश ठन्ना

Wednesday, December 28, 2011

मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ................कातिल सैफ़ी

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर

बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते-करते याद तुझको

अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा

रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ 

----------कातिल सैफ़ी

नयी तान और ताल जुड़ेगी.......................मुकेश ठन्ना

मीठे से एक गीत का टुकड़ा आया मन के द्वारे

विस्मय से अपलक वो मन को देखे और पुकारे,,

में दिखता हु चाँद का टुकड़ा ,,

एक अधूरे गीत का मुखड़ा ,

एक विश्वास लिए आया हूँ ,,

अंतिम आस लिए आया हूँ ,

बस तुम अपनी कलम चलाओ ,

अद्भुत से कुछ शब्द बनाओ ,,

जोड़ दो मुझमे एक अन्तरा,

नव निर्माण का नया मन्तरा,

तब बन जाउगा में गीत ,,

और बुन जायेगा संगीत,,

नयी तान और ताल जुड़ेगी ,

अद्भुत एक संसार रचेगी , , , ,. .


. . .. . .मुकेश ठन्ना

‘मीरो-ग़ालिब’ की शाइरी रखना........................चाँद शेरी

अपने जीवन में सादगी रखना
आदमियत की शान भी रखना

डस न ले आस्तीं के सांप कहीं
इन से महफ़ूज़ ज़िंदगी रखना

हों खुले दिल तो कुछ नहीं मुश्किल
दुश्मनों से भी दोस्ती रखना

मुस्तक़िल रखना मंज़िले-मक़सूद
अपनी मंज़िल न आरज़ी रखना

ए सुख़नवर नए ख्यालों की
अपने शेरों में ताज़गी रखना

अपनी नज़रों के सामने ‘शेरी’
‘मीरो-ग़ालिब’ की शाइरी रखना

---------चाँद शेरी

Friday, December 23, 2011

हुस्न ओ शबाब धोका है ........................आदिल रशीद तिलहरी

ये चन्द रोज़ का हुस्न ओ शबाब धोका है
सदाबहार हैं कांटे गुलाब धोका है

मिटी न याद तेरी बल्कि और बढती गई
शराब पी के ये जाना शराब धोका है

तुम अपने अश्क छुपाओ न यूँ दम ए रुखसत
उसूल ए इश्क में तो ये जनाब धोका है

ये बात कडवी है लेकिन यही तजुर्बा है
हो जिस का नाम वफ़ा वो किताब धोका है

तमाम उम्र का वादा मैं तुम से कैसे करूँ
ये ज़िन्दगी भी तो मिस्ल ए हुबाब धोका है

पड़े जो ग़म तो वही मयकदे में आये रशीद
जो कहते फिरते थे सब से "शराब" धोका है .... 




















----आदिल रशीद तिलहरी

Tuesday, December 20, 2011

कुछ न हासिल हुआ..............ग़ज़ल संग्रह "कुंवर कसुमेश"

एक पुस्तक की समीक्षा पढ़ रही थी.............
उसी समय मेरे मित्र भाई कुंवर कुसुमेश के ग़ज़ल संग्रह
के कुछ अंश पढ़े................अपने आप को नहीं रोक पाई
और मैंने यहां पर संजो लिया..............क्षमा भाई कुसुमेंश जी

जो बड़े प्यार से मिलता है लपककर तुझसे
आदमी दिल का भी अच्छा हो वो ऐसा न समझ

आज के बच्चों पे है पश्चिमी जादू का असर
अब तो दस साल के बच्चे को भी बच्चा न समझ

ये कहावत है पुरानी सी मगर सच्ची है
तू चमकती हुई हर चीज़ को सोना न समझ
-"कुंवर कसुमेश"

आज के अखबार की सुर्खी हमेशा की तरह
फिर वही दंगा, वही गोली हमेशा की तरह

धर्म के मसले पे संसद में छिड़ी लम्बी बहस
मज़हबों की आग फिर भड़की हमेशा की तरह

आप थाने में रपट किसकी करेंगे दोस्तों
चोर जब पहने मिले वर्दी हमेशा की तरह
"कुंवर कसुमेश"


सांप सड़कों पे नज़र आयेंगे
और बांबी में सपेरा होगा

वक्त दोहरा रहा है अपने को
फिर सलीबों पे मसीहा होगा

आदमियत से जिसको मतलब है
देख लेना वो अकेला होगा
"कुंवर कसुमेश"

बरी होने लगे गुंडे, लफंगे
अदालत क्या, यहाँ की मुंसिफी क्या

इसे इंसान कह दूं भी तो कैसे
न जाने हो गया है आदमी क्या

कभी लाएगी तब्दीली जहाँ में .
'कुंवर' मुफ़लिस की आँखों की नमी क्या
"कुंवर कसुमेश"
बुरा न देखते, सुनते, न बोलते जो कभी
कहाँ हैं तीन वो बन्दर तलाश करना है

कयाम दिल में किसी के करूँगा मैं लेकिन
अभी तो अपना मुझे घर तलाश करना है

सही है बात 'कुंवर' अटपटी भी है लेकिन
कि अपने मुल्क में रहबर तलाश करना है
"कुंवर कसुमेश"

सांस चलती भी नहीं है, टूटती भी है नहीं
अब पता चलने लगा, ये मुफलिसी भी खूब है

हो मुबारक आपको यारों दिखावे का चलन
आँख में आंसू लिए लब पर हंसी भी खूब है

हाथ में लाखों लकीरों का ज़खीरा है 'कुँवर'
आसमां वाले तेरी कारीगरी भी खूब है
"कुंवर कसुमेश"