Friday, January 31, 2020

सरहदें......मीनू बागीआ


होता  नहीं है छूना आसान सरहदें 
कर देतीं हैं जिस्म लहूलुहान सरहदें 


सूनी आँखें  हैं और खुश्क  हैं  होंठ 

तपते इंसानों सी रेगिस्तान सरहदें 


हैं इतनी बे -आबरू  क्यूँ  न  रोयें 

जज्बातों का होती  हैं तूफ़ान  सरहदें 


हवा भी रुक जाती है यहाँ दो घड़ी 

कर देंगी  इसे भी कुर्बान  सरहदें 


गर्म लहू बहते बहते जमने लगा है 

बर्फ की परतों सी बेईमान सरहदें


3 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना

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  2. सूनी आँखें हैं और खुश्क हैं होंठ

    तपते इंसानों सी रेगिस्तान सरहदें ... बहुत खूबसूरती से सरहदों को व्याख्याय‍ित कर द‍िया आपने मीनू जी

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