Thursday, April 11, 2019

मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है......गोपालदास "नीरज"

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,
उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।

जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे,
उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का,
लाजिम लहर के साथ है तब खेलना,
जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान का
जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो
उस वायु में दीपक जलाना धर्म है।

हो नहीं मंजिल कहीं जिस राह की
उस राह चलना चाहिए इंसान को
जिस दर्द से सारी उम्र रोते कटे
वह दर्द पाना है जरूरी प्यार को
जिस चाह का हस्ती मिटाना नाम है
उस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है।

आदत पड़ी हो भूल जाने की जिसे
हर दम उसी का नाम हो हर सांस पर
उसकी खबर में ही सफ़र सारा कटे
जो हर नजर से हर तरह हो बेखबर
जिस आँख का आखें चुराना काम हो
उस आँख से आखें मिलाना धर्म है।

जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तब मांग लो ताकत स्वयम जंजीर से
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी
उस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर से
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।
-गोपालदास "नीरज"

Wednesday, April 10, 2019

धर्म कर्म पहले रहे...मुंशी रहमान खान

कवि कोविद के कर्म यहि देवहिं भुले न ज्ञान।
पाय सीख शुभ छोड़दें सब कुपंथ की बान।। 1

आज कल जौ ह्वै रहा अरु देखत सब लोग।
करें चलें सब धर्म तज जो नहिं उनके योग।। 2

कहिहों मति अनुसार मैं नहिं करिहों पछिपाति।
पढ़हिं पद्य चेतहिं धरम हिंदू मुस्लिम जाति।। 3

अनखैहैं दुर्जन लेख पढ़ सुजन पढ़हिं हर्षाय।
हंस चुगें मोती सदा बायस बिष्‍टा खाय।। 4

तिनकर भय नहि मोहिं कछु ईश्‍वर मोर सहाय।
सत्‍य अटल रहिहै जगत झूठ नर दहा जाय।। 5

धर्म धर्म सब कहि रहे कहिं नहिं देखहु कर्म।
धर्म कर्म छोड़े फिरें कहत न आवै शर्म।। 6

धर्म कर्म पहले रहे धर्म प्राण के साथ।
अब बालक कलि काल के ऐना ककही हाथ।। 7

जो सिंगार तिरिया करें पहले युग में भाय।
सोइय रीति पुरुषन गही अपने मुँह मसिलाय।। 8

सकल चिह्न निज धरम के दीन्‍हे सबै मुड़ाय।
हिंदू मुस्लिम और जन केहि विधि चीन्‍हे जाँय।। 9

सत्‍युग त्रेता अरु द्वापर में नहिं मेटै नर चीन्‍ह।
धन्‍यवाद कलिकाल को नारि रूप कर दीन्‍ह।। 10

नई नई रीतें धर्म तज चल गईं कलयुग बीच।
एक प्रथा ऐसी चली नहिं ऊँचा कोइ नीच।। 11

धर्म ग्रंथ में जो लिख्‍यो सो नहिं झूठे होंय।
महा प्रलय के चिन्‍ह सब दिन दिन दूने होंय।। 12

यूरुप का व्‍यवहार लख दीन्‍हीं पद्धति खोय।
हंस वंश वायस भजे धर्म बृद्धि किमि होय।। 13

अब कलिकाल के वश परी भारत केरि समाज।
हे जगदीश सहाय कर बूड़यो धरम जहाज।। 14

नीच कर्म अब तजहु सब धरहु धर्म पर ध्‍यान।
नेम धर्म आचार से जपहु हृदय भगवान।। 15

चेतहु भारति वीरगण तुम तौ चतुर सुजान।
देवहु बंधु सीख शुभ यही कहत रहमान।। 16
-मुंशी रहमान खान

Tuesday, April 9, 2019

अनछुआ एहसास....श्वेता सिन्हा

मुद्दतों बाद रू-ब-रू हुए आईने से
ख़ुद को न पहचान सके
जाने किन ख़्यालों में गुम थे
ज़िंदगी तेरी सूरत भूल गये

ख़्वाब इतने भर लिये आँखों में
क़िस्से हक़ीक़त के सारे बेमानी लगे
चमकती रेत को पानी समझा
न प्यास बुझी तड़पा ही किये

एक टुकड़ा आसमान की ख़्वाहिश में
ज़मीं से अपनी रूठ गये
अपनों के बीच ख़ुद को अजनबी पाया
जब भरम सारे टूट गये

सफ़र तो चलेगा समेटकर मुट्ठीभर यादें
कुछ तो सौग़ात मिली तुमसे
ऐ ज़िंदगी! चंद अनछुए एहसासात के लिये
दिल से शुक्रिया है तुम्हारा।

  -श्वेता सिन्हा



Sunday, April 7, 2019

कृत–कृत नहीं जो हो पाए......नागार्जुन

जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
उनको प्रणाम !

जो छोटी–सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि–पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार !
उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह–रह नव–नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम–समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू–परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति–पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
उनको प्रणाम !

कृत–कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल !
उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ;
या जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ !
उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति–मंत ?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत !
उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !

- बाबा नागार्जुन

Saturday, April 6, 2019

उघड़ी चितवन.... द्विजेन्द्र 'द्विज'

उघड़ी चितवन
खोल गई मन

उजले हैं तन
पर मैले मन

उलझेंगे मन
बिखरेंगे जन

अंदर सीलन
बाहर फिसलन

हो परिवर्तन
बदलें आसन

बेशक बन—ठन
जाने जन—जन

भरता मेला
जेबें ठन—ठन

जर्जर चोली
उधड़ी सावन

टूटा छप्पर
सर पर सावन

मन ख़ाली हैं
लब ’जन—गण—मन’

तन है दल—दल
मन है दर्पन

मृत्यु पोखर
झरना जीवन

निर्वासित है
क्यूँ ‘जन—गण—मन’

खलनायक का
क्यूँ अभिनंदन

-द्विजेन्द्र 'द्विज'

Friday, April 5, 2019

चितवन .....सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

क्या दिया था तुम्हारी एक चितवन ने उस एक रात
जो फिर इतनी रातों ने मुझे सही-सही समझाया नहीं?

क्या कह गयी थी बहकी अलक की ओट, 
तुम्हारी मुस्कान एक बात
जिस का अर्थ फिर किसी प्रात की 
किसी भी खुली हँसी ने बताया नहीं?

इधर मैं निःस्व हुआ, पर अभी चुभन यह सालती है
कि मैं ने तुम्हें कुछ दिया नहीं,
बार-बार हम मिले, हँसे, हम ने बातें कीं,
फिर भी यह सच है कि हम ने कुछ किया नहीं।

उधर तुम से अजस्र जो मिला, सब बटोरता रहा,
पर इसी लुब्ध भाव से कि मैं ने कुछ पाया नहीं!

दुहरा दो, दुहरा दो, तुम्हीं बता दो
उस चितवन ने क्या कहा था
जिस में तुम ही तुम थे, संसार भी डूब गया था
और मैं भी नहीं रहा था...
-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

Thursday, April 4, 2019

अनुभूति .... श्वेता सिन्हा

माँ का ध्यान हृदय सदा
शान्ति सुधा बरसाती
मलयानिल श्वासों में घुल
हिया सुरभित कर जाती

मौन मगन दैदीप्त पुंज 
मन भाव विह्वल खो जाता
प्लावित भावुक धारा का
अस्तित्व विलय हो जाता

आतपत्र आशीष वलय
रक्षित जीवन शूल,प्रलय
वरद-हस्त आशंकाओं से
शुद्ध आत्मा मुक्त निलय

आँचल छाँह वात्सल्यमयी 
भय-दुःख, मद-मोह, मुक्त
अनुभूति,निर्मल निष्काम
शुभ्र पलछिन रसयुक्त

चक्षु दिव्य तुम ज्ञान गूढ़ का
जीवन पथ माँ भूल-भूलैय्या
लहर-लहर में भँवर जाल
भव सागर पार करा दे नैय्या

यश दिगंत न विश्वविजय
माँँ गोद मात्र वात्सल्य अटूट
जग बंधन से करो मुक्त अब
पी अकुलाये जी कालकूट