Sunday, July 7, 2013
Saturday, July 6, 2013
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगो...........परवीन श़कीर
बाद मुद्दत उसे देखा, लोगो
वो ज़रा भी नहीं बदला, लोगो
खुश न था मुझसे बिछड़ कर वो भी
उसके चेहरे पे लिखा था लोगो
उसकी आँखें भी कहे देती थीं
रात भर वो भी न सोया, लोगो
अजनबी बन के जो गुजरा है अभी
था किसी वक़्त में अपना, लोगो
दोस्त तो खैर, कोई किस का है
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगो
रात वो दर्द मेरे दिल में उठा
सुबह तक चैन न आया, लोगो
वो ज़रा भी नहीं बदला, लोगो
खुश न था मुझसे बिछड़ कर वो भी
उसके चेहरे पे लिखा था लोगो
उसकी आँखें भी कहे देती थीं
रात भर वो भी न सोया, लोगो
अजनबी बन के जो गुजरा है अभी
था किसी वक़्त में अपना, लोगो
दोस्त तो खैर, कोई किस का है
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगो
रात वो दर्द मेरे दिल में उठा
सुबह तक चैन न आया, लोगो
-श़ाय़रा परवीन श़कीर
जन्म वर्षः1952
ज़न्नतनशीं वर्षः 1994
ज़न्नतनशीं वर्षः 1994
परवीन शकीर की शायरी आम जनता बीच में अच्छी तरह पढ़ी गई
सौजन्यः BESTGHAZALS
Friday, July 5, 2013
दर्द को दर्द कहिये न हमदर्द है....................अन्सार कम्बरी
चेहरा-चेहरा यहाँ आज क्यों ज़र्द है
जिस तरफ़ देखिये दर्द – ही - दर्द है
अपने चेहरे में कोई ख़राबी नहीं
आपके आईने पर बहुत गर्द है
इस क़दर हम जलाये गए आग में
अब तो सूरज भी अपने लिये सर्द है
साथ देता रहा आख़िरी साँस तक
दर्द को दर्द कहिये न हमदर्द है
बोझ है ज़िन्दगी, इसलिए ‘क़म्बरी’
जो उठा ले इसे बस वही मर्द है
----अन्सार कम्बरी
Thursday, July 4, 2013
तू करीब आ तुझे देख लूं, तू वही है या कोई और है............श़ायर जनाब सलीम कौसर
मैं ख़याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मेरा अक्स है, पास-ए-आईना कोई और है
अजब एतबार-ओ-बेएतबारी के दरमियाँ है ज़िन्दगी
मैं करीब हूँ किसी और के, मुझे जानता कोई और है
मेरी रोशनी तेरे खाद-ओ-ख़ाल से मुख्तलिफ तो नहीं मगर
तू करीब आ तुझे देख लूं, तू वही है या कोई और है
तुझे दुश्मनों की खबर न थी, मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक़ेआ कोई और है
वही मुन्सिफों की रवायतें, वही फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था, पर मेरी सज़ा कोई और है
कभी लौट आयें तो पूछना नहीं, देखना उन्हें गौर से
जिन्हें रास्ते में खबर होई की ये रास्ता कोई और है
-श़ायर जनाब सलीम कौसर
सर-ए-आईना मेरा अक्स है, पास-ए-आईना कोई और है
अजब एतबार-ओ-बेएतबारी के दरमियाँ है ज़िन्दगी
मैं करीब हूँ किसी और के, मुझे जानता कोई और है
मेरी रोशनी तेरे खाद-ओ-ख़ाल से मुख्तलिफ तो नहीं मगर
तू करीब आ तुझे देख लूं, तू वही है या कोई और है
तुझे दुश्मनों की खबर न थी, मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक़ेआ कोई और है
वही मुन्सिफों की रवायतें, वही फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था, पर मेरी सज़ा कोई और है
कभी लौट आयें तो पूछना नहीं, देखना उन्हें गौर से
जिन्हें रास्ते में खबर होई की ये रास्ता कोई और है
-श़ायर जनाब सलीम कौसर
श़ायर जनाब सलीम कौसर का जन्म पानीपत में सन 1947 में हुआ
विभाजन का पश्चात वे पाकिस्तान मे बस गए...
विभाजन का पश्चात वे पाकिस्तान मे बस गए...
ये उनकी बेहतरीन ग़ज़लों मे एक है
स्व. जगजीत सिंह ने इस ग़ज़ल को स्वरों में बांधा है
स्व. जगजीत सिंह ने इस ग़ज़ल को स्वरों में बांधा है
Wednesday, July 3, 2013
ज़माने में फकीरों का नहीं होता ठिकाना कुछ...........रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
(इस ब्लाग की दो सौ पचासवीं पोस्ट)
कटी है उम्र गीतों में, मगर लिखना नहीं आया।
तभी तो हाट में हमको, अभी बिकना नहीं आया।
ज़माने में फकीरों का नहीं होता ठिकाना कुछ,
उन्हें तो एक डाली पर कभी टिकना नहीं आया।
सम्भाला होश है जबसे, रहे हम मस्त फाकों में,
लगें किस पेड़ पर रोटी, हुनर इतना नहीं आया।
मिला ओहदा बहुत ऊँचा, मगर किरदार हैं गिरवीं,
तभी तो देश की ख़ातिर हमें मिटना नहीं आया।
नहीं पहचान पाये "रूप" को अब तक दरिन्दों के,
पहाड़ा देशभक्ति का हमें गिनना नहीं आया।
-रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
फेसबुक में पोस्ट की गई रचना
सभी के जवाब छोड़ गया.................सैयद सादिक अली
शरीफ चोर था कुछ तो जनाब छोड़ गया
कबाब खा गया लेकिन शराब छोड़ गया
जो रास्ते में बहुत मेहरबान था मुझ पर
सफर के अंत में सारा हिसाब छोड़ गया
पढ़ीं तो निकलीं कविताएं अर्थहीन सभी
वह अपनी याद में ऐसी किताब छोड़ गया
मुकदमे, कर्जे, रहन-जायदाद के झगड़े
मरा तो देखिए क्या-क्या नवाब छोड़ गया
सवाल जितने उठाए थे पत्रकारों ने
वह गोल-मोल सभी के जवाब छोड़ गया।
वह गोल-मोल सभी के जवाब छोड़ गया।
-सैयद सादिक अली
Monday, July 1, 2013
धूल मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा...............मुनव्वर राना
कम से कम बच्चों के होंठों की हँसी की ख़ातिर
ऐसे मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
ऐसे मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
जो भी दौलत थी वह बच्चों के हवाले कर दी
जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं
जिस्म पर मेरे बहुत शफ्फाफ़ कपड़े थे मगर
धूल मिट्टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा
भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो
शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा
अगर स्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिंदों के न होने से शजर अच्छा नहीं लगता
धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है
---मुनव्वर राणा
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