Friday, July 7, 2017

अवलोकन.....








लिखी जाती है कविता
कवि की भावनाएँ रहती है
समाहित जिसमें
उस कविता को पाठक पढ़ता है तो
उसमें  प्रयास करता है...
ढूंढने का भाव, कवि का
पर नहीं आता है समझ
फिर देखता है
उतार-चढ़ाव
शब्द-विन्यास
प्रेम भाव....
और मर्म साथ में
धर्म भी..
असफल होने पर
फिर तलाशता है
अर्थ दूसरा ..
उस कविता में..
अंत में देखता है
कवि का नाम..
यदि कवि ख्याति प्राप्त है
तो प्रतिक्रिया देगा...

यदि कोई चलताऊ
कवि हो तो...
लिखेगा...लगे रहो

सादर...





Thursday, July 6, 2017

फल वाली....कुमार अवधेश सिंह


ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,

पत्नी ने कहा था 1 दर्ज़न केले लेते आना।

तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।

वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे,
पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?

उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए"

बुढ़िया बोली, बाबूजी 20 रूपये दर्जन,
शर्माजी बोले, माई 15 रूपये दूंगा।
बुढ़िया ने कहा, 18 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी।

शर्मा जी बोले, 15 रूपये लेने हैं तो बोल, बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" में गर्दन हिला दी।

शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर
केले का भाव पूछा तो वह बोला 28 रूपये दर्जन हैं

बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ? शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ।

तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें"

शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया।

सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,

"बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव 18 रूपये से कम नही लगाउंगी।
शर्माजी ने मुस्कराकर कहा, माई एक नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।

बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। केले देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है । फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था

तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी। सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।
आदमी की बीमारी में दुकान चली गयी,आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है
जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।
इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी, और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।

शर्माजी ने 50 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो
वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।

शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो, अब मैं तुमसे ही फल खरीदूंगा, और कल मै तुम्हें 500 रूपये दूंगा। धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना।

बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए। घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से
मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।

शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।

अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा, "माई लौटाने की चिंता मत करना। जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे। जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो
सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।
तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से
बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।
बुढ़िया अब बहुत खुश है। उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है ।
हर दिन शर्माजी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती।

शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!
जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों,
अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से
ज्यादा संतोष मिलेगा...!!

Wednesday, July 5, 2017

ऊँचाई....रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’


पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्‌ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?”

मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।

घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खान खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो” -कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फ़ुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”

उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग  से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”

मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा- “ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?”
“नहीं तो” - मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।


-रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’

Tuesday, July 4, 2017

.. #हिन्दी_ब्लॉगिंग भारत में भी सौन्दर्य है....




भारतीय सौन्दर्य 
दर्शनीय भारतीय जल प्रपात

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साभार
विशाल दास
मोवाईल नम्बर +91 9308388080

ई-मेल आई डी  vishal.das@inbox.com



__._,_.___

Monday, July 3, 2017

‘मुस्कान’.....डॉ० छेदी साह

















मुर्दे में भी डाल देगी जान
उषा की प्रथम किरणों सा
तुम्हारी लम्बी बाहें
संगमरमरी देह
बालों पर
छाई सावन की घटा
हिरणी सी आँखें
देखती हो जब तुम

और होती आँखें चार
तब तुम्हारी मीठी मुस्कान
मुझे लगती है
बड़ी ही कान्तिमान,
-डॉ० छेदी साह 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Sunday, July 2, 2017

बेटे भी होते हैं विदा........ निधि सक्सेना
















बेटियाँ ही नही
बेटे भी विदा हो जाते हैं 
कभी आगे पढ़ने
तो कभी आगे बढ़ने...
कोई सात सौ मील दूर
कोई सात हज़ार मील दूर
तो कोई सात समुन्दर पार..
माएँ निष्ठुर सी
देखती रहती हैं सब
जुटाती हैं सामान
भरती हैं सूटकेस में व्यवस्थाएं..
भीतर गूंजते रहते हैं
असहाय लाचार स्वर
जिन्हें वे कभी परिस्थितियों पर
कभी भाग्य पर
और कभी सुखद भविष्य की आशा पर औंधाती रहती हैं..
पिता कुछ चिंतित 
कुछ अपरिचित
छुपाते रहते हैं अपनी चिन्ताएं..
और बेटा भीतर है पिघला पिघला
थोड़ा विचलित
पर कोशिश कर रहा है
निश्चिन्त दिखने की..
आजकल माँ के इर्द गिर्द ही बना रहता है
पिता से अब किसी बात पर जिरह नही करता
भाई से अब कोई तकरार नही होती..
वहाँ सात समुन्दर पार
न माँ न पिता न भाई..
और आने की कोई मुद्दत नहीं
अब अकेले ही लड़नी होगी हर जंग
ये अच्छी तरह पता है उसे...
~निधि सक्सेना
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Saturday, July 1, 2017

केले के फूल....कृष्ण मोहन सिंह




केले के फूल खाने के फायदे

केले का पेड़ एक ऐसा पेड़ है। जिसके हर हिस्से को किसी न किसी काम में लाया जा सकता है। फूल, फल और तने को खा सकते हैं, पत्तियों का इस्तेमाल प्लेट की तरह कर सकते हैं और छाल का इस्तेमाल कागज बनाने के लिए किया जा सकता है। केले के दिल के तौर पर जाने, जाने वाले केले के फूल में ढेर सारा फाइबर, प्रोटीन, पोटैशियम, कैल्शियम, कॉपर, फॉस्फोरस, आयरन, मैग्नीशियम और विटामिन ई होता है। इस फूल को खाने से होते हैं कौन-कौन से फायदे.....

1. शुगर के मरीजों के लिए अच्छे होते हैं।
एक शोध में पाया गया कि डायबिटीज के मरीजों के इन्सुलिन लेवल केले के फूल खाने से घट गए, हालांकि, इस शोध को अभी क्लीनिकली प्रूव नहीं किया जा सका है।

2. ये नैचरल ऐंटी-डिप्रेसेंट हैं।
क्योंकि इन फूलों में ढेर सारा मैग्नीशियम होता है, ये आपका मूड सुधारकर स्ट्रेस को कम करने की शक्ति रखते हैं।

3. फ्री रैडिकल से लड़ने वाले ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स से लैस।
फ्री रैडिकल स्वस्थ सेलों पर हमला कर उन्हें खराब कर देते हैं, जिससे दिल की बीमारी, कैंसर और स्किन एजिंग जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। इन फूलों में ऐंटी-ऑक्सिडेंट होते हैं जो फ्री रैडिकल्स का मुकाबला कर उन्हें बॉडी डैमेज करने से बचाते हैं।

4. ये खाने में हल्के होते हैं और पाचन संबंधी दिक्कतें दूर करते हैं।
केले के फूल खाने में बहुत हल्के होते हैं और पाचन तंत्र को आराम देते हैं। अगर पेट में दर्द हो या ऐसिडिटी के कारण सूजन हो जाए, तो इनके सेवन से दूर हो जाती है।
5. इन्फेक्शन्स से बचाते हैं।
ये फूल पैथोजेनिक बैक्टीरिया की ग्रोथ को रोकते हैं जिससे इन्फेक्शन नहीं होते।

6. माहवारी की ब्लीडिंग कंट्रोल कर 
“पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम” को करते हैं ठीक।
आयुर्वेद के मुताबिक, एक कप केले के फूल को दही में पकाकर खाने से शरीर में प्रोजेस्ट्रोन लेवल बढ़ता है और माहवारी में ज्यादा खून नहीं बहता। माना जाता है कि केले के फूलों से पॉलिसिस्टिक ओवरियन सिंड्रोम (“पॉली सिस्टिक ओवरी सिंड्रोम”) से जूझ रही महिलाओं को मदद मिलती है।
7. खून की कमी से बचाते हैं।
अधिक आयरन होने से, केले के फूल शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाते हैं और एनीमिया को रोकते हैं।
8. स्तनपान कराने वाली माओं का दूध बढ़ाते हैं।
आयुर्वेद का सुझाव है कि स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को केले के फूल खाने चाहिए। इससे उन्हें दूध ज्यादा बनेगा।