Monday, March 6, 2017

दुख चाहे हो कितना भी नया.........जयप्रकाश मानस














पुराने हो जाते हैं 
एक दिन 
कागज, कलम, दवात, स्याही
पुराना हो जाता है कवि, 
एक दिन सारी पुस्तकें
सारे पाठक हो जाते हैं 
एक न एक दिन पुराने
हो जाते हैं एक दिन
मुद्रक, प्रकाशक, वितरक, 
आलोचक सबके सब पुराने
आख़िर एक दिन 
समय भी हो जाता पुराना
दुख चाहे हो कितना भी नया
कविता कभी होती नहीं पुरानी
-जयप्रकाश मानस


वर्तमान में आदरणीय जयप्रकाश जी मानस 
छत्तीसगढ़ शासन में वरिष्ठ अधिकारी हैं
srijangatha@gmail.com

वेबसाईट – www.srijangatha.com



Sunday, March 5, 2017

बचा हुआ है रास्ता.........कृष्ण सुकुमार










बचा हुआ हूँ शेष
जितना नम आँखों में विदा गीत !
बची हुई है जिजीविषा
जितनी किसी की प्रतीक्षा में
पदचापों की झूठी आहट !

बची हुई है मुस्कान
जितना मुर्झाने से पूर्व फूल !

बचा हुआ है सपना
जितना किसी मरणासन्न के मुँह में
डाला गंगाजल !

बचा हुआ है रास्ता
जितना अंतिम यात्रा में श्मशान !

और तुम ! बचे हुए हो
इन्हीं अटकलों के बीच कहीं !
गुनगुनायी जाती धुन की तरह...

-कृष्ण सुकुमार


Saturday, March 4, 2017

कद इरादों का.....सुरेश शर्मा











हम
करेंगे मुकाबला
बुरे दिनों का

ताकि,
अच्छे दिनों कि
छांव में मुस्करा सकें
बुरे दिनों की पराजय पर!

हम
चढ़ेंगे दुर्गम चढ़ाइयाँ
और तलाश ही लेंगे जगह
पताका के लिए

ताकि,
हो सके तय
कि राजा हो या पहाड़
कद इरादों का
सबसे बड़ा होता है!

हम
भयावह दिनों में
भरोसे की तरह उतरेंगे दिलों में
और तलाश ही लेंगे सुरंग रोशनी की

ताकि,
अच्छे दिनों की छाँव में
सुना सकें बच्चों को
बुरे दिनों की
पराजय की कहानी!!
-सुरेश शर्मा 

Friday, March 3, 2017

पता नहीं...........डॉ. अमरजीत कौंके
















पता नहीं
कितनी प्यास थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने समुद्रों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
पानी का एक छोटा-सा
क़तरा बन जाता

पता नहीं
कितनी अग्नि थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने सूरजों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
एक छोटा-सा
जुगनू बन जाता

पता नहीं
कितना प्यार था उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी बेपनाह मोहब्बत पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
मेरा सारा प्यार
एक तिनका-मात्र रह जाता

पता नहीं
कितनी साँस थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी लम्बी साँसों पर
बहुत गर्व था
उसके पास जाता
तो मेरी साँस टूट जाती

पता नहीं
कितने मरूस्थल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने जलस्रोतों पर
बहुत गर्व था
उसकी देह में
एक छोटे से झरने की भाँति
गिरता और सूख जाता

पता नहीं
कितने गहरे पाताल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे बहुत बड़ा तैराक होने का भ्रम था
उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।
- डॉ. अमरजीत कौंके

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

डॉ. अमरजीत कौंके 
कवि परिचयः
साहित्य अकादमी की दिल्ली और से पंजाबी के कवि , संपादक और अनुवादक डा. अमरजीत कौंके सहित 23 भाषाओँ के लेखकों को वर्ष 2016 के लिए अनुवाद पुरस्कार देने की घोषणा की गई है. अमरजीत कौंके को यह पुरस्कार पवन करन की पुस्तक ” स्त्री मेरे भीतर ” के पंजाबी अनुवाद ” औरत मेरे अंदर ” के लिए प्रदान किया जाएगा. अमरजीत कौंके पंजाबी और हिन्दी साहित्य में जाने पहचाने कवि हैं. उनके 7 काव्य संग्रह पंजाबी में और 4 काव्य संग्रह हिंदी में प्रकाशित हो चुके हैं.अनुवाद के क्षेत्र में अमरजीत कौंके ने डा. केदारनाथ सिंह, नरेश मेहता, अरुण कमल, कुंवर नारायण, हिमांशु जोशी, मिथिलेश्वर, बिपन चंद्रा सहित 14 पुस्तकों का हिंदी से पंजाबी तथा वंजारा बेदी, रविंदर रवि, डा.रविंदर , सुखविंदर कम्बोज, बीबा बलवंत, दर्शन बुलंदवी, सुरिंदर सोहल सहित 9 पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद किया है. 

Thursday, March 2, 2017

कितने कीमती लम्हे थे....सीमा 'सदा' सिघल


हर बार मेरे हिस्से
तुम्हारी दूरियाँ आईं
नजदीकियों ने हँसकर जब भी
विदा किया
एक कोना उदासी का लिपट कर
तुम्हारे काँधे से सिसका पल भर को
फिर एक थपकी हौसले की
मेरी पीठ पर तुम्हारी हथेलियों ने
रख दी चलते-चलते !
.....
मेरे कदम ठिठक गए पल भर
कितने कीमती लम्हे थे
उस थपकी में
जिनका भार मेरी पीठ पर
तुम्हारी हथेली ने रखा था
भूलकर जिंदगी कितना कुछ
हर बार मुस्कराती रही
उम्मीद को हँसने की वजह
नम आँखों से भी बताती रही
गले लगती जो कभी
सुबककर रात तो
उसे भोर में चिडि़यों का चहचहाना
सूरज की किरणें दिखलाती रही !!
....
कूकती कोयल ... अपनी मधुरता से
आकर्षित करती सबको
भूल जाते सब उसके काले रंग को
मीठा राग है जिंदगी भी
बस तुम्हें हर बार इसे
भूलकर मुश्किलों को
गुनगुनाना होगा पलकों पे
इक नया ख्वाब बुनकर
उसे लम्हा-लम्हा सजाना होगा !!!

-सीमा 'सदा' सिघल

Wednesday, March 1, 2017

गुरमेहर प्रकरण : दो मिनट का मौन............सुशोभित सक्तावत


भारत विचित्र देश है। तर्कसंगति यहां सर्वाधि‍क असंभव विचार है। तथ्य तो कल्पना है। महत्व केवल अमूर्त संवेगों और भावनात्मक अपील का है, जिसके आधार पर मनचाहे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।  

मौजूदा हाल में भी ऐसा ही नज़र आ रहा है। हद्द तो यह है कि किसी का बचाव भी अगर करना हो तो उसके पक्ष में बड़ी बेतुकी बातें कही जाती हैं, जिनमें "सबऑर्डिनेट सेंटेंस स्ट्रक्चर" के तहत दो वाक्यों की "युति" में उन दोनों वाक्यों की आपस में कोई संगति नहीं होती! पहला वाक्य अगर "अ" के संदर्भ में है तो दूसरा वाक्य "ब" के संदर्भ में हो सकता है और इन दोनों को मिलाकर "स" के पक्ष में निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।... "लॉजिकल कहरेंस" से हमारी शत्रुता है।

"स्थापना", "निष्कर्ष" और "कुतर्क" की इस त्रयी के माध्यम से इस विडंबना को इस तरह समझा जा सकता है :

स्थापना : वो केवल 22 साल की है।
निष्कर्ष : इसलिए वो सही है। 
कुतर्क : जो कमउम्र होता है वो सही होता है, जैसे बम्बई हमले के समय कसाब 21 का था, इसलिए वो सही था।

स्थापना : वो बेटी है। 
निष्कर्ष : इसलिए वो सही है।
कुतर्क : जो बेटी होती है, वो सही होती है। माया कोडनानी भी बेटी थी, इसलिए वो सही थी।

स्थापना : उसे धमकियां दी जा रही हैं।
निष्कर्ष : इसलिए वो सही है।
कुतर्क : जिसे धमकियां दी जाती हैं, वह सही होता है। अमरीका ने अलक़ायदा को धमकाया था, इसलिए अलक़ायदा सही है।

स्थापना : वह शांति चाहती है। 
निष्कर्ष : इसलिए वो सही है।
कुतर्क : शांति एक संपूर्ण अवधारणा है और वह हमेशा सही होती है। भगत सिंह शांति नहीं चाहते थे। इसलिए वे ग़लत थे। लेनिन संघर्ष कर रहे थे।  इसलिए ज़ारशाही सही थी। फ़लस्तीनी इज़रायल के साथ संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए इज़रायल सही है।  

स्थापना : वह युद्ध विरोधी है। 
निष्कर्ष : इसलिए वो सही है।
कुतर्क : ऐतिहासिक अन्याय जैसा कुछ नहीं होता। "एग्रेशन" और "प्रोवोकेशन" जैसा कुछ नहीं होता। संप्रभुता नहीं होती। राष्ट्र नहीं होता। भूगोल नहीं होता। केवल "युद्ध" होता है। 1948, 1965, 1971, 1999 में युद्ध "हुआ" था। किसी ने वह युद्ध "किया" नहीं था। या बेहतर हो अगर कहें कि युद्ध ने पाकिस्तान और भारत किया था। भारत और पाकिस्तान ने युद्ध नहीं किया था। और युद्ध की पहल युद्ध द्वारा की गई थी, युद्ध की पहल पाकिस्तान द्वारा नहीं की गई थी।  
इसलिए वो सही है!  

जिसे कि अंग्रेज़ी में कहते हैं : RIP, Logic!  

भारतवर्ष के बुद्ध‍िजीवियों को तर्कसंगति के इस दु:खद अवसान पर दो मिनट का मौन रखना चाहिए। 
सुशोभित सक्तावत        

देख तेरे सर पर ताज सजा है........निधि सक्सेना



















खामोश
सहमी
सर झुका कर खड़ी बेटी को देख
छलकते हृदय से पिता ने उसे अंक में भर लिया..
स्वर संयत कर
दृढ़ आवाज़ में बोले
राजकुमारी है तू मेरी
देख तेरे सर पर ताज सजा है
इसमें कुन्दन सा दमकता गुरुर है मेरा
अभिमान के मोती जड़े हैं
गुमान के हीरे लगे हैं
नेह के नीलम मढ़े हैं..
यूँ सर न झुका
कदम साध
नज़रें उठा
और अपना ताज संभाल..
कि जिंदगी के हर मोड़ 
हर परिस्थिति में
हर ठोकर और उलझन में
निराश के हर अँधियारे में
और आशा की उजली भोर में
तुझ संग तेरा पिता 
प्रत्यक्ष या परोक्ष
सम्बल सा खड़ा मिलेगा...
~निधि सक्सेना