Friday, February 12, 2016

और फिर नारी ने कहा.....इन्द्रा












और फिर नारी ने कहा
हे नर !
मैं तो हमेशा से वहीँ हूँ 

जहाँ मुझे होना था 
न तुम्हारे आगे न पीछे 
न ऊपर न नीचे 
बस बराबरी में

मुझे तो कभी भी महान बनने की चाहत न थी 
तुम ही हमेशा  ऊंचा बनने की होड़ में लगे रहे 
महान बनने के रास्ते तो और भी थे
उन पर चल तुम ईश्वर बन सकते थे 
पर तुमने यह क्या किया ?   

मुझे नीचा  दिखाने की कोशिश में 
खुद से कमजोर जताने  की ख्वाहिश में 
खुद को महान दिखने  की चाहत में 
मुझ पर बलात्कार और जुर्म कर 
खुद को ही नीचा गिरा कर 
मुझ स्वतः ही  उपर  उठा दिया 

- इन्द्रा
मूल रचना


Tuesday, February 9, 2016

निदा फाजली नहीं रहे..

                                            
12 अक्टूबर, 1938 -  8 फरवरी, 2016
अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

                    भारत के मशहूर हिंदी – उर्दू कवि मुक्तिदा हसन ‘निदा फाजली’ नहीं रहे. 12 अक्टूबर, 1938 को जन्मे ये कविराज  8 फरवरी, 2016 को खुदा को प्यारे हो गये. वे 77 साल के थे. हमने उनकी अनेक गज़ल जगजीत सिंघ द्वारा सुनी है, आज जगजीत जी की जन्मतिथि अब निदा जी की पुण्यतिथि बन गई है.

                              कश्मीरी परिवार के निदा जी दिल्ली में जन्मे और ग्वालियर में आपने शिक्षा पाई थी. उनके पिता जी भी उर्दू के कवि थे. 1947 में देश के बटवारे के दौरान पिताजी पाकिस्तान गये थे, लेकिन निदा जी भारत में रहे थे. युवा निदा ने एक बार मंदिर के पास से गुजरते हुए सूरदास का राधा के बारे में लिखा पद सुना था, जिसमे श्री कृष्ण से जुदा होने का राधा जी के दुःख का वर्णन था, उससे प्रभावित हो कर वे कवि बने थे, ऐसा निदा फाजली कहते थे. मीरा और कबीर से प्रभावित निदा गाज्ली ने अपनी कविता का दायरा टी. एस. इलियट, गोगोल, एंटोन चेखोव और टाकासाकी तक विस्तुत किया था.

                      काम की खोज में निदा जी 1964 में बम्बई आये थे. शुरूआती दौर में उन्हों ने हिंदी साप्ताहिक धर्मयुग और ब्लिट्स में लिखा था. उनसे हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक-लेखक प्रभावित थे. उनको मुशायरा में बुलाया जाता था. उनकी गज़ल और अदायगी लोकप्रिय हुई. उसमे गज़ल, दोहा और नज़म का मिश्रण श्रोताओ को मिलता था. उन्हों ने कविता को सादगी बक्षी. उनकी प्रसिध्ध पंक्ति: ‘दुनिया जिसे कहते है, जादू का खिलौना है, मिल जाये तो मिटटी है, खो जाये तो सोना है’. आपको उनकी ‘आ अभी जा (सुर), तू इस तरहा से मेरी जिंदगी में सामिल है (आप तो ऐसे न थे) और होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है, इश्क कीजे और समजिये झिंदगी क्या चीज़ है (सरफ़रोश) याद होगी. उस गज़ल का एक बेहतरीन शेर है, ‘हम लबों से कह नहीं पाए, उनसे हाल-ए-दिल कभी; और वो समझे नहीं, ये ख़ामोशी क्या चीज़ है’.  ‘इस रात की सुबह नहीं,’ और ‘गुडिया’ में भी उनके गीत थे. कमाल अमरोही की ‘रज़िया सुलतान (1983) बनती थी और उनके गीतकार जाँ निसार अख्तर का निधन हुआ. तब निदा फाजली ने उस फिल्म के दो गाने लिखे थे.

                   निदा फाजली को भारत का बटवारा पसंद नहीं था. कोमी और राजकीय दंगो के सामने वे आवाज़ उठाते थे. उसका नतीजा ये था की 1992 के दंगो में उन्हें अपने आप को बचने किसी दोस्त के घर रहना पड़ा था. उनके ‘राष्ट्रिय एकता’ का पुरस्कार मिला था. उन्होंने उर्दू, हिंदी और गुजराती में 24 पुस्तकें लिखी थी. उनकी कुछ कविता बच्चे स्कूल में पढते हैं. उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘दीवारों के बिच’ के लिये मध्य प्रदेश सरकार ने निदा फाजली को ‘मीर तकी मीर’ एवॉर्ड दिया था. उनके प्रसिद्द लेखन कार्य है – मोर नाच, हम कदम और सफर में धूप तो होगी..

       निदा फाजली को साहित्य अकादमी का एवोर्ड 1998 में, श्रेष्ठ गीतकार का स्टार स्क्रीन एवोर्ड ‘सुर’ के लिये और 2013 में पद्मश्री का इल्काब मिला था.

             निदा जी को हमने सूरत के गाँधी स्मृति भवन में तीन-चार बार सुना है.. मेरा उनका लिखा प्रिय शेर है, ‘घर से मस्जिद हो बहुत दूर, तो चलो यूँ ही सही, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये.’ कवि अपनी कविताओं से अमर होते है, निदा फाजली भी अमर है.




संकलन


Monday, February 8, 2016

उड़ान....इन्द्रा
















हमें ही  जीने दो
मत थोपो अपने सपने
हमें  ही बुनने दो
अच्छे और बुरे का
बस फर्क तुम बता दो
कैसे गगन में उड़ना
इतना बस सिखा दो
लकीर के फ़क़ीर
बनना नहीं हमें
नए रस्ते अपने लिए
तलाशेंगे  खुद ही हम
तुम तो बस हमें
उड़ने को छोड़ दो
या साथ हो लो हमारे
नए नए सपने बुनो
सपने बनाने की
कोई उम्र होती नहीं
छोड रूढ़ीवाद  और
पुरानी परम्पराएँ
सब नया  नहीं है बुरा
विश्वास करके देखो
मेरा हाथ पकड़ कर
फिर से उड़ कर देखो
जब सब का साथ हो
कठनाई डर  के भागेगी
मंज़िल सच हमें
खुद ब खुद तलाशेगी
-इन्द्रा

मूल रचना

Friday, February 5, 2016

अजब हालात पैदा हो गए हैं दौरे-हाज़िर में...-कुँवर कुसुमेश


दिखाऊँगा किसी दिन मैं भी जा करके मदीने में। 
हज़ारों दर्द मैंने दफ़्न कर रक्खे हैं सीने में।

चलो देखें ज़रा चलकर सफ़ीने को हुआ क्या है,
किसी ने छेद कर रक्खा है क्या मेरे सफीने में।

मुझे बेकार लगता है हमेशा मैकदा जाना,
मज़ा तो यार आता है तेरी आँखों से पीने में।

गरीबों के लिए दो वक़्त की रोटी ही काफी है,
सुकूने-क़ल्ब दिखता है गरीबों के पसीने में।

तुम्हें देखेगा बेपर्दा कभी कोई तो कह देगा ,
बला का हुस्न है यारो क़सम से इस नगीने में।

अजब हालात पैदा हो गए हैं दौरे-हाज़िर में,
"कुँवर" अच्छा नहीं लगता है अब तो यार जीने में।

-कुँवर कुसुमेश 
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सुकूने-क़ल्ब = दिल का सुकून
दौरे-हाज़िर = वर्तमान परिस्थिति

Wednesday, February 3, 2016

नासमझ दिल.......इन्द्रा











कितने सपने देखें
और कितना मन को मारें
दिल को कौन बताये
लाख जतन करो सब कुछ पालूं
फिर भी कुछ छूट ही जाये
दिल को कौन बताये
आधा छोड़ पूरे भाग न मनवा
जो है वो भी छिन ना जाये
दिल को कौन बताये
अपनी सीमा खुद पहचानो
जितनी चादर पाओं पसारो
दिल को कौन बताये
सब की अपनी मजबूरी है
कब तक कोई साथ निभाए
जब तक का है साथ किसीका
हंस कर ले बतियाये
दिल को कौन बताये

-इन्द्रा

मूल रचना


Tuesday, February 2, 2016

बापू – यादों में नहीं सिर्फ जेबों में रह गए हैं....मंजू दीदी












बापू 
अच्छा ही हुआ 
जो आप नहीं हैं आज 
अगर होते तो 
रो रहे होते खून के आंसू 
गणतंत्र को गनतंत्र बना देने वाले 
क्या रत्ती भर भी समझ पाये हैं 
आपके स्वराज का अर्थ ...
नहीं वो तो बस नाम को 
चढ़ा देते हैं चार फूल 
राजघाट पर और 
कर लेते हैं फर्ज पूरा 
दुनिया को दिखाने को 
कि बापू आज भी हमारी यादों में हैं 
जबकि असलियत तो ये है कि 
आप उनकी यादों में नहीं 
सिर्फ जेबों में रह गए हैं 
नोटों पर छपी रंगीन तस्वीर बन कर  
-मंजू मिश्रा
( "गणतंत्र / गनतंत्र" शब्द मित्र कवि कमलेश शर्मा जी की पोस्ट पर पढ़ा था, इस अद्बभुत खयाल का श्रेय उनको ही जाता है, उनको धन्यवाद सहित उनकी पोस्ट  से साभार )

 http://wp.me/pMKBt-Bp



Monday, February 1, 2016

ठिठुरी कविता.....सविता अग्रवाल ’सवि’








सर्दी के मौसम में, ठिठुरी कविता
रज़ाई में दुबकी, सिकुड़ी कविता
मुँह बाहर निकालती है और
फिर दुबक जाती है
यही क्रम था चल रहा
महीना बीत गया ...

आज मैंने कविता को उठाया
माथा चूमा, सहलाया,
रज़ाई से निकाला
गर्म रखने का आश्वासन दे,
धीरे-धीरे उसके हाथों को सहलाया
मौजे, दस्ताने पहना कर
आराम दिलाया 
उसमें कुछ उर्जा जगाई
जिससे वह अपने को सँभाल पाई
उसे उठाया और धूप में बिठाया 
मूँगफली, रेवड़ी का आनंद दिलाया

कविता सिहराई,
मुझे देख कर मुस्कुराई
मैंने भी झट क़लम उठाई 
काग़ज़ पर रख उसको
उसकी अहमियत समझाई
कपड़ों में लदी, भावों से सजी
कविता ......
अपने से ही शरमाई और गुदगुदाई।

-सविता अग्रवाल ’सवि’
savita51@yahoo.com