Tuesday, February 12, 2013

अपनी आदत के मुताबिक.....प्रमोद त्रिवेदी

कहते हैं सब- "पा सकता है कोई भी ।

चाहे तो इस टेव से मुक्ति।

असंभव नहीं कुछ भी"।

सोचता किन्तु मैं,

इस सोच से अलग

बचेगा ही क्या,

छूट गई यदि मुझसे

मेरी आदत,

क्या मतलब रह जाएगा तब

मेरे होने का।

फूल खिलते हैं आदतन।

जानते हैं,

तोड़ लिए जाएंगे खिलते ही

या बिखर जाएंगे

पंखुड़ी-पंखुड़ी खिलते ही

तब भी कहां छोड़ा खिलना।

छोड़ा नहीं नदी ने बहना

खारे होने के डर से।

सुना है अभी-अभी

आदत से मजबूर तो गिरे गड्‌ढे में।

मरे,

अपने जुनून में।

मैं हंसा फिर

अपनी आदत के मुताबिक।

--प्रमोद त्रिवेदी

Sunday, February 10, 2013

सुकूं बांकपन को तरसेगा...............................??????????



एक निवेदनः
कोई सामान घर में एक कागज में पेक करके लाया गया वह कागज मेरी नजर में आया, उसी कागज में ये ग़ज़ल छपी हुई थी, पर श़ाय़र का नाम नहीं था. आप सभी से ग़ुज़ारिश है यदि किसी को इस ग़ज़ल के श़ाय़र का नाम मालूम हो तो मुझे बताएं ताकि मैं श़ाय़र का नाम लिख सकूं...शुक्रिया...यशोदा



जबान सुकूं को, सुकूं बांकपन को तरसेगा,
सुकूंकदा मेरी तर्ज़-ऐ-सुकूं को तरसेगा.

नए प्याले सही तेरे दौर में साकी,
ये दौर मेरी शराब-ऐ-कोहन को तरसेगा.

मुझे तो खैर वतन छोड़ के अमन ना मिली
वतन भी मुझ से गरीब-उल-वतन को तरसेगा

उन्ही के दम से फरोज़ां पैं मिलातों के च़राग
ज़माना सोहबत-ए-अरबाव-ए फन को तरसेगा

बदल सको तो बदल दो ये बागबां वरना
ये बाग साया-ए-सर्द-ओ-समन को तरसेगा

हवा-ए-ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन
ज़मीं पानी को सूरज़ किरण को तरसेगा
ग़ज़ल कार....अज्ञात 
पुनः प्रकाशन...धरोहर से

Saturday, February 9, 2013

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम.........अधीर

यहॉ कब कौन किसका हुआ है ,
इंसान जरुरत से बंधा हुआ है ।

मेरे ख्वाबो मे ही आते है बस वो,

पाना उसको सपना बना हुआ है।

सुनो,पत्थर दिलो की बस्ती है ये,
तू क्यो मोम सा बना हुआ है ।

खुदगर्ज है लोग इस दुनिया मे,
कौन किसका सहारा हुआ है ।

कहने को तो बस अपना ही है वो,
दिलासा शब्दो का बना हुआ है ।

लोहा होता तो पिघलता शायद,
इंसान पत्थर का बना हुआ है।

जीत ने का ख्वाब देखा नही कभी,
हारने का बहाना एक बना हुआ है ।

नही होता अब यकीन किसी पर भी,
इंसान तो जैसे हवा बना हुआ है।

लगाके गले वो परायो को शायद,
अंजान अपनो से ही बना हुआ है।

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम,
ठोकर खाकर "अधीर" संभला हुआ है । 
----अधीर 
यह प्रस्तुति ब्लाग धरोहर से स्थानान्तरित की गई है

आज फिर याद आए तुम..........फाल्गुनी


आज जब हरे-हरे खेतों में
सरसरा उठी मेरी चुनरी
सरसों में लिपट गई
नटखट बावरी 
तब उसे छुड़ाते हुए
याद आए तुम और तुम्हारा हाथ
जिसने निभाया था कभी मेरा साथ 
 

यादों की कोमल रेशम डोर
उलझ गई बेतरह
आज सुलझाते हुए धानी चुनर

आज याद आए
तुम्हारे साथ बिताए
वो हसीन लम्हात

आज फिर देखा मैंने
किसी तितली के पँखों को
पँखों के रंगों को
रंगों से सजी आकृति को
आज फिर याद आए
तुम, तुम्हारी तुलिका, तुम्हारे रंग।

आज फिर बरसी
जमकर बदली
आज फिर याद आई
तुम्हारी देह संदली।



उस नीले बाल-मयूर की कसम
जिसे तुमने मेरे लिए
शाख से उतारा था हौले से
खुब याद आया
तुम्हारा दिल नरम-नरम

कच्चे केसरिया सावन में
खिलते हर्षाते खेत में
आज फिर याद आए तुम
तुमसे जुड़ी हर बात
घनघोर बरसात के साथ। 
-स्मृति आदित्य

Thursday, February 7, 2013

अदब से झुकने की तहज़ीब खानदान की है .............सचिन अग्रवाल 'तन्हा'

हवा जो नर्म है ,साज़िश ये आसमान की है
वो जानता है परिंदे को ज़िद उड़ान की है............

मेरा वजूद ही करता है मुझसे ग़द्दारी
नहीं तो उठने की औकात किस ज़ुबान की है ............

हमारे शहर में अफ़सर नयी जो आई है
सुना है मैंने, वो बेटी किसी किसान की है ..............

अभी भी वक़्त है मिल बैठकर ही सुलझालो
अभी तो बात फ़क़त घर के दरमियान की है .............

जवान जिस्म से बोले बुलंदियों के नशे
रहे ख़याल की आगे सड़क ढलान की है ...............

तेरी वफ़ा पे मुझे शक है कब मेरे भाई
मिला है मौके से जो बात उस निशान की है ..........

ये मीठा नर्म सा लहजा ही सिर्फ उसका है
अदब से झुकने की तहज़ीब खानदान की है .............

--सचिन अग्रवाल 'तन्हा'

Monday, February 4, 2013

रात भर जागे हैं........... डा० श्रीमती तारा सिंह


रात भर जागे हैं , नींद हमको आती नहीं
काफ़िर के आँखों की शरारत जाती नहीं

क्या बात करूँ उस बेहया की ,जब आती 
है याद , तो मेरी नज़रों से शर्माती नहीं

आतिशे - आग*  में जल- जलकर दिल खाक
हो रहा,वो है कि उसे बू-ए-सोजे-निहाँ# आती नहीं

डरूँ कैसे न उस सितमगर के कूचे में जाने से
मुहब्बत है ,कि भरोसा दिलाती नहीं

शाखे-गुल@ की तरह रह-रह के लचक जाती है् वो
क्यों उसे मेरे दिल पे लगी चोट नजर आती नहीं


--डा० श्रीमती तारा सिंह



*इश्क की आग #जलने की गंध @डाली पर के फ़ूल


Friday, February 1, 2013

कहानी हीर-रांझा की पुरानी थी, पुरानी है..........श्रद्धा जैन


मेरे दामन में काँटे हैं, मेरी आँखों में पानी है

मगर कैसे बताऊँ मैं ये किसकी मेहरबानी है


खुला ये राज़ मुझ पर ज़िंदगी का देर से शायद

तेरी दुनिया भी फानी है, मेरी दुनिया भी फ़ानी है


वफ़ा नाज़ुक सी कश्ती है ये अब डूबी कि तब डूबी

मुहब्बत में यकीं के साथ थोड़ी बदगुमानी है


तुम्हें हम फासलों से देखते थे औ'र मचलते थे

सज़ा बन जाती है कुरबत, अजब दिल की कहानी है


मिटा कर नक्श कदमों के, चलो अनजान बन जाएँ

मिलें शायद कभी हम-तुम, कि लंबी ज़िंदगानी है


ये मत पूछो कि कितने रंग पल-पल मैंने बदले हैं

ये मेरी ज़िंदगी क्या, एक मुजरिम की कहानी है


किताबे-उम्र का बस इक सबक़ ही याद है मुझको

तेरी कुर्बत में जो बीता वो लम्हा जावेदानी है


वफ़ा के नाम पर 'श्रद्धा' न हो कुर्बान अब कोई

कहानी हीर-रांझा की पुरानी थी, पुरानी है

---------श्रद्धा जैन