Wednesday, September 12, 2012

जीना सीख लिया.............सुरेश पसारी "अधीर"

इक सीख ना सकें, हम तुम्हे भुलाना,
हमने खुद को, भुलाना सीख लिया।

अपनी खुशियाँ , हम छिपा ना सके,
इक ग़म को, छिपाना सीख लिया।

नहीं सीख सके, तुम्हे अपना बनाना
पर जग अपना, बनाना सीख लिया।

कभी तुमसे प्यार, हम जता ना सके,
पर दुनिया से, जताना सीख लिया।

सीख ना सकें हम, बस तन्हा रहना,
इक तेरी यादों मे, जीना सीख लिया।

बस अपना जीवन, हम जी ना सके,
तेरी खुशियों मे, जीना सीख लिया।



- सुरेश पसारी "अधीर"

Tuesday, September 11, 2012

क्या पाया है, आपकी याद में .......रचनाकात :: अज्ञात

आपकी याद में
आँखें नम रहती हैं, आपकी याद में
साँसें थमी हैं , आपकी याद में

होंठ तो चुप रहते हैं लेकिन
 

अब खामोशियाँ बोलती हैं, आपकी याद में


न खुद की खबर है और न दुनिया की कोई खबर

सबको भूल गए हैं, आपकी याद में



इश्क की बातें सुनी थी जमाने से

इश्क को जाना है, आपकी याद में



जिंदगी की खूबसूरती के बारे में पढ़ा था किताबों में

इसकी खूबसूरती को महसूस किया है, आपकी याद में



यादों की दुनिया में खोई रहती हूँ आजकल

दीवानी हो गई हूँ, आपकी याद में



बहुत बेचैन रहती हूँ आजकल

दिल की धड़कनें अब धड़कती हैं, आपकी याद में



सजती-संवरती रहती हूँ आजकल दिन भर

खुद से मोहब्बत करने लगी हूँ, आपकी याद में



न जाने क्या-क्या खोया ?

और क्या-क्या पाया है, आपकी याद में ...

रचनाकात :: अज्ञात
प्रस्तुति करण :: सोनू अग्रवाल


Monday, September 10, 2012

अच्छा लगता है..................विशाल शाहदेव

कबतक पहने रहूँ ये हँसी का मुखौटा,
कभी-कभी अकेले में रोना अच्छा लगता है...

कबतक सहूँ ये चिलमिलाती धूप,
अचानक हीं बिन बादल बारिश का होना अच्छा लगता है...

कब-तक करवटें बदलता रहूँ इस काँटों भरे बिस्तर पे,
कभी-कभी खुली आँख से गहरी नींद में सोना अच्छा लगता है...

कबतक सोचता रहूँ बीते हुए कल को,
आने वाले कल का खुश्नुमा ख्वाब अच्छा लगता है...

कबतक पूछूँ सवाल औरों से,
अब तो खुद से हीं सवाल और उसका जवाब अच्छा लगता है...

कबतक करूँ सुबह का इंतजार इस अँधेरी रात में,
भोर में घास पे पड़ा वो आफताब अच्छा लगता है...

कबतक कहूँ कि किस्मत हीं रूठी है मेरी,
अब तो खुद रूठकर खुद को मनाना अच्छा लगता है...

कबतक झूठ कहूँ खुद से हीं,
लेकिन खुद से ये कड़वा सच छुपाना अच्छा लगता है...

कबतक याद करूँ बचपन के वो दिन, वो छोटा-सा बच्चा,
लेकिन क्या करूँ, उसकी मासूम किलकारियाँ सुनना अछ्छा लगता है...

कबतक रहूँ यूँ बिखरा-बिखरा,
लेकिन क्या करूँ, अब खुद टुकड़ों में बिखर, उन्हें चुनना अच्छा लगता है...

कबतक फँसा रहूँ इन उलझनों में,
लेकिन क्या करूँ, शब्दों का ये जाल बुनना अच्छा लगता है...

कबतक डरूं एक पत्थर से,
लेकिन क्या करूँ, शीशे के उस महल में रहना अच्छा लगता है...

कबतक मरुँ बिना मतलब के,

लेकिन क्या करूँ, शायद वो मीठा दर्द सहना अच्छा लगता है...

कबतक रहूँ खामोश, 
लब्ज भी मिलते नहीं,
लेकिन क्या करूँ, 
दिल की बात यूँ ही आपसे कहना अच्छा लगता है...


- विशाल शाहदेव

Wednesday, September 5, 2012

वक़्त गुज़रा मगर नहीं गुज़रा..........तन्हा अज़मेरी

वक़्त गुज़रा मगर नहीं गुज़रा

तेरी यादों का कारवाँ दिल से.

कहते हैं जीते हैं सब यंहा कब से

जीता कोई नहीं यंहा दिल से.

जो सितम करके सिखा गए जीना

निकले कैसे वो मेहरबाँ दिल से.

बोले मुझपे भी होंगी इनायतें उनकी

अर्ज़ ये उन्होंने किया कंहा दिल से.

सोचता हूँ अब मिटा ही डालूं

दर्द का ये आसमाँ दिल से.

वक़्त गुज़रा मगर नहीं गुज़रा

तेरी यादों का कारवाँ दिल से ..

-तन्हा अज़मेरी

Tuesday, September 4, 2012

बदलने की आदत नहीं.........डॉ. सुदर्शन दीवान

ख्वाबो में आने वाला
शख्स हकीकत में नहीं आया
सोचती हूँ होगी कोई मजबूरी




जो कभी लौटा ही नहीं वो
मेरी तरफ.....
वरना मौसम भी लौटे मेरी तरफ तो
सिर्फ वो नहीं लौटा
मौसम जल्दी बदलते हैं

सुकून है उस शख्स में
बदलने की आदत नहीं.........

---डॉ. सुदर्शन दीवान
प्रस्तुतिकरण: सोनू अग्रवाल

आज का दौर.......डॉ. औरीना अब्बासी "अदा"


आज का दौर
आज के इस दौर ने
हर शै को महंगा कर दिया,
कीमतें ऐसी बढ़ी कि
इनसां को सस्ता कर दिया.

हम तो समझे थे कि यादों
का सफर अब थम गया,
रात एक तस्वीर ने यादों को
ताजा कर दिया.

आप की शायद यह ख्वाहिश थी
कि हो मेरी शिकस्त,
लीजिये खुद को हरा कर
उन का अरमान पूरा कर दिया.


-डॉ. औरीना अब्बासी "अदा"

Monday, September 3, 2012

कहीं दूर चली जाऊँ.............. फाल्गुनी

मन करता है
कहीं दूर चली जाऊँ,
कभी नहीं आऊँ,
और फिर तुम
मुझे अपने आसपास ना पाकर,
परेशान हो जाओ,
मैं तुम्हें खूब याद आऊँ,
इतनी याद आऊँ कि
ढुलक पड़े तुम्हारी पत्थर जैसी
बेजान आँखों से बेतरह आँसू,
तुम्हारे कठोर दिल से
निकल पड़े ठंडी आहें,
और तुम दुआएँ माँगों
बार-बार
मेरे हक में कि
ऐ खुदा लौटा दे
मेरी उस सच्ची चाहने वाली को
पर मैं तब भी
नहीं मिलूँ तुम्हें,
फिर तुम्हें
अपनी हर बेवफाई
याद आए
एक-एक कर,
जिसे मैंने जिया है
हर रोज मरकर। 

-स्मृति जोशी 'फाल्गुनी'