Saturday, July 6, 2013

उसने दुश्मन भी न समझा, लोगो...........परवीन श़कीर

बाद मुद्दत उसे देखा, लोगो
वो ज़रा भी नहीं बदला, लोगो

खुश न था मुझसे बिछड़ कर वो भी
उसके चेहरे पे लिखा था लोगो

उसकी आँखें भी कहे देती थीं
रात भर वो भी न सोया, लोगो

अजनबी बन के जो गुजरा है अभी
था किसी वक़्त में अपना, लोगो

दोस्त तो खैर, कोई किस का है
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगो

रात वो दर्द मेरे दिल में उठा
सुबह तक चैन न आया, लोगो


-श़ाय़रा  परवीन श़कीर
जन्म वर्षः1952
ज़न्नतनशीं वर्षः 1994

परवीन शकीर की शायरी आम जनता बीच में अच्छी तरह पढ़ी गई
सौजन्यः BESTGHAZALS
 

6 comments:

  1. बेहतरीन ग़ज़ल.... बहुत सुंदरअभिव्यक्ति .......!!

    ReplyDelete
  2. waaaaaaaaaaah bhot khub ....parvin ji ki gajle ya nazme dono padh ke sukoon milta hai.....kuch sher to mano MIRA ki trah hote hai

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,अभार।

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर गज़ल..आभार यशोदा जी

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (07-07-2013) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in/“ मँहगाई की बीन पे , नाच रहे हैं साँप” (चर्चा मंच-अंकः1299) <a href=" पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  6. मैं भी कितना भुलक्कड़ हो गया हूँ। नहीं जानता, काम का बोझ है या उम्र का दबाव!
    --
    पूर्व के कमेंट में सुधार!
    आपकी इस पोस्ट का लिंक आज रविवार (7-7-2013) को चर्चा मंच पर है।
    सूचनार्थ...!
    --

    ReplyDelete