तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
भटकती निशा कह रही है कि तम में
दिये से किरन फूटना ही उचित है,
शलभ चीखता पर बिना प्यार के तो
विधुर सांस का टूटना ही उचित है,
इसी दर्द में रात का यह मुसाफ़िर,
न रुक पा रहा है, न चल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
मिलन ने कहा था कभी मुस्करा कर,
हँसो फूल बन, विश्व-भर को हंसाओ
मगर कह रहा है, विरह अब सिसक कर,
इसी से नयन का विकल जल-कुसुम यह,
न झर पा रहा है, न खिल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
कहाँ दीप है जो किसी उर्वशी की
किरन-उंगलियों को छुए बिना जला हो?
बिना प्यार पाए किसी मोहिनी का
कहां है पथिक जो निशा में चला हो!
अचंभा अरे कौन फिर जो तिमिर यह
न गल पा रहा है, न ढल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
किसे है पता धूल के इस नगर में,
कहाँ मृत्यु वरमाल ले कर खड़ी है?
किसे ज्ञात है प्राण की लौ छिपाए
चिता में छुपी कौन सी फुलझड़ी है?
इसी से यहां राज़ हर ज़िन्दगी का
न छुप पा रहा है, न खुल पा रहा है,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
-गोपाल दास नीरज

