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Sunday, January 6, 2019

माँग का मौसम....अपर्णा वाजपेई

प्रेम की मूसलाधार बारिश से,
हर बार बचा ले जाती है ख़ुद को,
वो तन्हा है........
है प्रेम की पीड़ा से सराबोर,
नहीं बचा है एक भी अंग इस दर्द से आज़ाद।
जब-जब बहारों का मौसम आता है,
वो ज़र्द पत्ते तलाशती है ख़ुद के भीतर,
हरियाले सावन में अपना पीला चेहरा...

छुपा ले जाती है बादलों की ओट,
कहीं बरस न पड़े.....
उसके अंतस का भादों;
पलकों की कोर से।

माँग में;
पतझड़ का बसेरा हुआ जब से,
सूख गयी है वो....
जेठ के दोपहर सी;
कि अब, बस एक ही मौसम बचा है
उसके आस-पास
वैधव्य का।
-अपर्णा बाजपेई