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Wednesday, March 25, 2020

तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुव...दिगंबर नासवा

धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे


बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा

कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे


नाते रिश्तेदार सभी उग आए हैं

लोगों का कहना है हम मशहूर हुवे


घुटनों से लाचार हुवे उस दिन जो हम

किस्से फैल गये की हम मगरूर हुवे


गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते

जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे


पहले उनकी यादें में जी लेते थे

यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे !


लेखक - दिगंबर नासवा 

Tuesday, December 17, 2019

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो :(

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

लेखक परिचय - दिगंबर नासवा


Wednesday, July 17, 2019

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ..दिगंबर नासवा

खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा !!


लेखक परिचय -  दिगंबर नासवा

Wednesday, June 26, 2019

कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी.....दिगंबर नासवा

पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगी
मासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगी

इंसान की गली से, इंसानियत नदारद
मासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगी

कुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बे
जालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगी

बाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वाले
पैसे नहीं जो फैंके, जम्हाइयां मिलेंगी

पहले कहा था अपना, ईमान मत जगाना
इंसानियत के बदले, कठिनाइयां मिलेंगी

बातों के वो धनी हैं, बातों में उनकी तुमको
आकाश से भी ऊंची, ऊंचाइयां मिलेंगी

हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी !!


लेखक परिचय -  दिगंबर नासवा