धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे
बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे
नाते रिश्तेदार सभी उग आए हैं
लोगों का कहना है हम मशहूर हुवे
घुटनों से लाचार हुवे उस दिन जो हम
किस्से फैल गये की हम मगरूर हुवे
गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे
पहले उनकी यादें में जी लेते थे
यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे !
लेखक - दिगंबर नासवा




