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Saturday, August 29, 2020

खुद पर यकीन करो ..मंजू मिश्रा


उठो
सीधी खड़ी  हो 
और खुद पर यकीन करो 
तुम किसी से कम नहीं हो 
तुम झूठे पौरुष के दंभ का शिकार 
जानवरों का शिकार तो
बिलकुल नहीं बनोगी
तुम जिंदगी में 
किसी से नहीं डरोगी ....
*** 
अपने
पैरों के नीचे की जमीन 
और सर के ऊपर का आसमान 
तुम खुद तलाश करोगी 
तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए
उसके होने न होने की राह भी 
तुम खुद तय करोगी
तुम जिंदगी में 
किसी से नहीं डरोगी ....
***
रिश्तों का मोल 
तुम खूब पहचानती हो 
इनको निभाने का सलीका भी 
खूब जानती हो लेकिन 
तुम कमजोर नहीं हो
अपने स्वाभिमान की कीमत पर 
तुम कुछ नहीं सहोगी  
तुम जिंदगी में  
किसी से नहीं डरोगी ....
***
-मंजू मिश्रा
मूल रचना


Friday, April 17, 2020

10 हाइकु ...मंजू मिश्रा

हाइकु

1.
सर्दी ने छीने
जो पेड़ों के गहने
लाया वसंत
2.
तितलियों ने
वासंती खत लिखे
मौसम के नाम
3.
सर्दी की भोर
चमकतीं, हीरे सी
ओस की बूँदें
4.
रात रोई थी
चमक रहे दूब पे
ओस- से आँसू
5.
लाया वसंत
खुशियों की आहट
बिखरे रंग
6.
उड़ते ख्वाब
हवा की डोरी संग
जैसे पतंग
7.
ढल रहा है
सागर की गोद मे
थका –सा सूर्य
8.
पुल के पार
डूब रही है साँझ
लाल सिंदूरी
9.
मिल रहा है
धरती से आकाश
दृष्टि का भ्रम
10.
रात झील में
दूध के कटोरे सा
उतरा चाँद
-मंजू मिश्रा
मूल रचना

Monday, May 23, 2016

मुट्ठी भर सपने.....मंजू मिश्रा


मुट्ठी भर सपने
दो चार अपने  
ख़ुशी के चार पल
तुम्हारी याद नहीं, तुम
बस.…
जिंदगी से
इतना ही तो माँगा था
क्या ये बहुत ज्यादा था !!!

-:-

दुःख में
रोने को एक कांधा
सुख में ... झूलने को दो बाहें
वारी जाने को
एक प्यारी सी मुस्कान
सपने समेटने को  
जीवन से भरी दो आँखें
बस.…
जिंदगी से
इतना ही तो माँगा था
क्या ये बहुत ज्यादा था !!!

-:-

ठिठकी सी धूप
जब चढ़े छत की मुंडेर का कोना
तो दौड़ जाएँ मेरी आँखें
गली के कोने तक
और समेट लाएं तुमको
पलकों में बंद करके
ऐसी एक शाम का  
एक रूमानी सा इंतजार  
बस.…
जिंदगी से
इतना ही तो माँगा था
क्या ये बहुत ज्यादा था !!!

-:-

अक्सर 
बड़े बड़े सपनो के पीछे 
भागने में 
हम इतने व्यस्त हो जाते हैं 
कि छोटी छोटी 
खुशियों का 
मोल ही भूल जाते हैं :-)



Tuesday, March 22, 2016

सभी को विश्व कविता दिवस की बहुत बहुत बधाई....मंजू मिश्रा

चलो न 
आज विश्व कविता दिवस पर 
हम भी एक कविता बनायें        
मगर 
कविता की रेसिपी कहाँ से लाएं 
क्यूँ  न गूगल कर के देखें 
शायद कुछ पा जाएँ 
नहीं तो एक काम करते हैं 
थोड़ी खुशियां थोड़े गम 
थोड़ा तुम थोड़े हम 
बस ऐसे ही 
जो भी 
आस-पास हाथ आये 
सब कुछ 
एक साथ मिलाएं 
छोटी छोटी मुस्कानों से सजाएँ 
और  जिंदगी की तश्तरी में 
बड़े अदब से  पेश करें 
हंसती मुस्कराती 
गुनगुनाती 
कुछ कुछ लजाती 
प्यारी सी कविता 
-:-
सभी को विश्व कविता दिवस की बहुत बहुत बधाई !!
-मंजू मिश्रा




Saturday, February 20, 2016

कुछ नयी पुरानी क्षणिकायें,,, मंजू मिश्रा


चुटकी भर धूप 
मुट्ठी भर सपने 
थोड़ी सी ख़ुशी 
दो चार अपने 
बस बीज देंगे 
जीवन की धरती 
फिर उगेंगी 
मुस्काने ही मुस्काने 
हमारे आँगन में 
तुम भी आना 
मिल के हँसेंगे 


जीने का क़र्ज़ 
उधड़ते हुये 
रिश्तों को ढांप-ढूंप 
दुनिया की नज़रों से बचाकर 
कब तक 
रफू करे कोई …..


जीना 
अगर तरीके से हो
एक सलीके से हो , 
तो ठीक !
वरना कब तक 
जीने का क़र्ज़ 
अदा करे कोई …..


सन्नाटे का जादू
चाँद पहरे पर है 
और चांदनी … मुस्तैद 
यादें भी 
यहाँ वहाँ लटकी हुयी 
दिल के दरख़्त पे,
मानों.. किसी केइंतज़ार में 
मगर सब गुपचुप 
जैसे डर हो कि
जरा सी आहट से 
कहीं रात का 
सन्नाटे का जादू 
टूट न जाये


उजाले की पैठ 
देशों की सीमायें 
नहीं देखती 
जाति या धर्म भी 
नहीं देखती 
वो तो बस 
अँधेरा देखती है 
और हर घर को 
रोशन करती है 
अपना धर्म समझ कर !!


कुछ तो लोग कहेंगे
कुछ तो लोग कहेंगे ही ….
कहने दो उन्हें 
जो कुछ कहते हैं
तुम उनसे…
हजार गुना बेहतर हो
जो दूसरों के कन्धों को
सीढ़ी बनाकर
ऊपर चढ़ते हैं
और फिर
सीना तान कर
खुद को पर्वत समझते हैं


जीवन में 
जाने कितने प्रश्नचिन्ह
जिन्हें  हम 
या तो जान कर 
या अनजाने में 
बस 
यूँ ही छोड़ देते हैं
और पूरी ज़िंदगी 
उन के इर्द गिर्द जीते हैं….
...............


*मंजू मिश्रा*