Sunday, September 22, 2019

मेरा शहर..... अमरेंद्र "अमर"


मदमस्त हवाओ से भरा 
ये मेरा शहर 
आज मेरे लिए ही बेगाना क्यू है 
हर तरफ
महकते फूल, चहकते पंक्षी 
फिर मुझे ही 
झुक जाना  क्यू है 

आज फिर इक चुप्पी सी साधी है 
इन हवाओ ने,
मेरे लिए
नहीं तो कोई,
दूर फिजाओ में जाता क्यू है 

छुपा रहा है
हमसे कोई राज, ये पवन 
नहीं तो और भी है,
इसकी राहों में 
ये इक हमी को तपाता क्यू है 

आज बड़ा खुदगर्ज, बड़ा मगरूर
सा लगता है ये मेरा शहर 
शायद इसकी मुलाकात हुई है  'उनसे'
नहीं तो ये हमी को जलाता क्यू है 

ए 'अमर' जरूर,  रसूख 
कुछ कम हुआ है शायद  
वरना ये अपना हुनर 
हमी पे  दिखाता क्यू है !!

Saturday, September 21, 2019

हसरतों के काफ़िले ....दिनेश पारीक "मेरा मन"

नजर मिलते ही ,हमारे ईमान गये
ऐ मोहब्बत ! हम तुमको पहचान गये

तुमको पाने, बेताब है हर शख्स यहाँ
कितने ही होकर यहाँ से परेशान गये

तेरा कहना कि समंदर, एक बूँद
पानी में है बंद, हम मान गये

देखकर तस्वीर तुम्हारी ,हमारे दिल में
देखने वाले सभी हैरान गये

ऐसे ही नहीं,तुम्हारी हसरतों के काफ़िले
से लुटकर सभी मेहमान गये

-दिनेश पारीक "मेरा मन"

Friday, September 20, 2019

अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ ...जॉन एलिया

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम

खमोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम

ये काफी है कि हम दुश्मन नहीं हैं
वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम

वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत 
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम 

हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम 
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम 

किया था अहद जब लम्हों में हम ने 
तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम 

नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी 
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम 

ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती 
यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँ करें हम 
-जॉन एलिया

Thursday, September 19, 2019

मंजिल का ख़्वाब...आतिफ़ सिराज

उठो कि रात गई दिन निकलने वाला है
वो देखो रात के दामन तले उजाला है

हमारे साथ रहो क्योंकि हमने मंजिल का
हर एक ख़्वाब बड़ी मेहनतों से पाला है

हमारे चारों तरफ हौसले ही रहते हैं
जैसे चांद के चारों तरफ हाला है

हमारे बारे में कहते हैं राह के पत्थर
न आना राह में उसकी की ये जियाला है

हज़ार बार डराने को आई रातें और 
हमनें डर को हर इक बार मार डाला है।
-आतिफ़ सिराज

Wednesday, September 18, 2019

दिल पिसा जाता है ..... भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

नींद आती नहीं धड़के कि बस आवाज़ से।
तंग आया हूँ मैं इस पुरसोज़-दिल के साज से।

दिल पिसा जाता है उनकी चाल के अंदाज़ से।
हाथ में दामन लिए आते हैं वह किस नाज़ से।

सैंकड़ों मुर्दे जिलाए औ' मसीहा नाज़ से,
मौत शर्मिंदा हुई क्या-क्या तेरे ऐजाज़ से।

बागवां कुंजे कफ़स में मुद्दतों से हूँ असीर,
अब खुले पर भी तो मैं वाक़िफ़ नहीं परवाज़ से।

कब्र में राहत से सोए थे न था महशर का ख़ौफ़,
बाज़ आए ऐ मसीहा हम तेरे ऐजाज़ से ।

बे ग़फ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो,
चौंक पड़ता हूँ शिकस्तः होश की आवाज़ से।

नाज़े माशुकाना से ख़ाली नहीं है कोई बात,
मेरे लाश को उठाए है वो किस अंदाज़ से।

क़ब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका 'रसा',
चौंकाने वाले हैं कब हम सूर की आवाज़ से।
-भारतेन्दु हरिश्चद्र

Tuesday, September 17, 2019

ये सजदा रवा क्यूँ कर ..... जमील मज़हरी

ग़ौर तो कीजे के ये सजदा रवा क्यूँ कर हुआ
उस ने जब कुछ हम से माँगा तो ख़ुदा क्यूँ कर हुआ

ऐ निगाह-ए-शौक़ इस चश्म-ए-फ़ुसूँ-परदाज़ में
वो जो इक पिंदार था आख़िर हया क्यूँ कर हुआ

इक तराज़ू इश्क़ के हाथों में भी जब है तो वो
आलम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से मावरा क्यूँ कर हुआ

दीन ओ दानिश दोनों ही हर मोड़ पर थे दिल के साथ
यक-ब-यक दीवाना दोनों से ख़फ़ा क्यूँ कर हुआ

रह-ज़नों के ग़ोल इधर थे रह-बरों की भीड़ उधर
आ गए मंज़िल पे हम ये मोजज़ा क्यूँ कर हुआ

ख़ार-ज़ार-ए-दीन-ओ-दानिश लाला-ज़ार-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
दिल की इक वहशत से तय ये मरहला क्यूँ कर हुआ

अपने ज़ेहनी ज़लज़लों का नाम जो रख लो मगर
दो दिलों का इक तसादुम सानेहा क्यूँ कर हुआ

तेरी महरूमी उसे जो भी कहे लेकिन 'जमील'
ग़ैर से उस ने वफ़ा की बे-वफ़ा क्यूँ कर हुआ
-ज़मील मजहरी

Monday, September 16, 2019

देखते ही देखते जवान, पिताजी बूढ़े हो जाते हैं......राजू मुंजाल

देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं..

सुबह की सैर में,
कभी चक्कर खा जाते हैं,
सारे मौहल्ले को पता है,
पर हमसे छुपाते हैं...

दिन प्रतिदिन अपनी,
खुराक घटाते हैं,
और तबियत ठीक होने की,
बात फ़ोन पे बताते हैं...

ढ़ीले हो गए कपड़ों,
को टाइट करवाते हैं,
देखते ही देखते जवान, 
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं...!

किसी के देहांत की खबर,
सुन कर घबराते हैं,
और अपने परहेजों की,
संख्या बढ़ाते हैं,

हमारे मोटापे पे,
हिदायतों के ढ़ेर लगाते हैं, 
"रोज की वर्जिश" के,
फायदे गिनाते हैं,

‘तंदुरुस्ती हज़ार नियामत',
हर दफे बताते हैं,
देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं..

हर साल बड़े शौक से,
अपने बैंक जाते हैं, 
अपने जिन्दा होने का,
सबूत देकर हर्षाते हैं...

जरा सी बढ़ी पेंशन पर,
फूले नहीं समाते हैं, 
और फिक्स्ड डिपॉजिट,
रिन्यू करते जाते हैं...

खुद के लिए नहीं,
हमारे लिए ही बचाते हैं,
देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं...

चीज़ें रख के अब,
अक्सर भूल जाते हैं, 
फिर उन्हें ढूँढने में,
सारा घर सर पे उठाते हैं...

और एक दूसरे को,
बात बात में हड़काते हैं, 
पर एक दूजे से अलग,
भी नहीं रह पाते हैं...

एक ही किस्से को,
बार-बार दोहराते हैं,
देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं...

चश्में से भी अब,
ठीक से नहीं देख पाते हैं, 
बीमारी में दवा लेने में,
नखरे दिखाते हैं...

एलोपैथी के बहुत सारे,
साइड इफ़ेक्ट बताते है, 
और होमियोपैथी,
आयुर्वेद की ही रट लगाते हैं..

ज़रूरी ऑपरेशन को भी,
और आगे टलवाते हैं. 
देखते ही देखते जवान
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं..

उड़द की दाल अब,
नहीं पचा पाते हैं, 
लौकी तुरई और धुली मूंगदाल,
ही अधिकतर खाते हैं,

दांतों में अटके खाने को,
तीली से खुजलाते हैं, 
पर डेंटिस्ट के पास,
जाने से कतराते हैं,

"काम चल तो रहा है",
की ही धुन लगाते हैं..
देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं..

हर त्यौहार पर हमारे,
आने की बाट देखते हैं, 
अपने पुराने घर को,
नई दुल्हन सा चमकाते हैं..

हमारी पसंदीदा चीजों के,
ढ़ेर लगाते हैं,
हर छोटी बड़ी फरमाईश,
पूरी करने के लिए,
माँ रसोई और पापा बाजार,
दौड़े चले जाते हैं..

पोते-पोतियों से मिलने को,
कितने आंसू टपकाते हैं.. 
देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं...

देखते ही देखते जवान,
पिताजी बूढ़े हो जाते हैं...

-राजू मुंजाल

Sunday, September 15, 2019

पता है न....शुभा मेहता

पता है न ...
एक दिन तुम भी
टँग जाओगे
तस्वीर में
घर के किसी
कोने में
किसी खूँटी पर 
इसीलिए...
प्रेम बीज बोओ
उन्हें प्रेम से पालो
सींचो प्रेम से
प्रेम फल पाओगे
क्या धरा है
झगड़े -लड़ाई में
प्रेम बोओगे
सबके दिलों  मेंं
रह जाओगे ।
      
लेखिका - शुभा मेहता

Saturday, September 14, 2019

हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम....अनीता सैनी


हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम,
पीढ़ियों से अर्जित संस्कारों की हैं शबनम |

  सजा इन्हीं का मुकुट,  
शीश  पर ,
हया का ओढ़ा  है  घूँघट 
मन  पर ,
छलकाती हैं करुणा,
नित नभ नूतन पर,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

 रस्म-ओ-रिवाज के नाज़ुक बँधन से,
 बँधे  हैं  हमारे  हर बँधन,
मातृत्व को  धारणकर ,
ममता को निखारा है हमने , 
धरा-सा कलेजा ,
सृष्टि-सा रुप निखारा है हमने,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

हम पर टिका है, 
नारी के नारीत्व का विश्वास,
अच्छे होने का उठाया है बीड़ा,
हमने  अपने सर, 
मान देती हैं  मर्यादा को,
परम्परावादी विशुद्ध प्रेम, 
  परिवार पहला  दायित्व  है हमारा, 
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

 कँधों पर हमारे  टिका है, 
समाज की अच्छाई का स्तम्भ,
हृदय जलाकर दिखाती हैं,
रौशनी समाज के भविष्य को, 
त्याग के तल पर जलाती हैं,
 दीप स्नेह का ,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं  हम |

अच्छा लगता है ,
हमें रिश्तों में घुल-मिल जाना ,
नहीं अच्छा लगता,   
मन से बेलगाम हो जाना,
देख  रही  हैं   हम,
 बेलगाम  मन  का अंजाम,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं  हम !

लेखिका - अनीता सैनी 

Friday, September 13, 2019

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है....कविता रावत


पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है !



पराये दिल का दर्द अक्सर काठ का लगता है

पर अपने दिल का दर्द पहाड़ सा लगता है !



अंगारों को झेलना चिलम खूब जानती है

समझ तब आती है जब सर पर पड़ती है !



पराई दावत पर सबकी भूख बढ़ जाती है

अक्सर पड़ोसी मुर्गी ज्यादा अण्डे देती है !



अपने कन्धों का बोझ सबको भारी लगता है

सीधा  आदमी  पराए  बोझ  से दबा रहता है !



पराई चिन्ता में अपनी नींद कौन उड़ाता है

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है !



लेखिका - कविता रावत 

Thursday, September 12, 2019

गहराती हुई शाम है ....फाल्गुनी रॉय

गहराती हुई शाम है
और उचटे हुए मन पर अबूझ-सी उदासी।

कच्ची सी एक सड़क है,
धान खेतों से होकर गुजरती हुई
दूर तक चली जाती है —
पैना-सा एक मोड़ है
और भटके हुऐ दो विहग।

गहराती हुई शाम है,
घनी पसरी हुई एक खामोशी,
दूर कहीं बजती हुई बंसी के स्वर में
आहिस्ता-आहिस्ता पलाश के फूल
फूट रहे हैं ...
और असंख्य तारों को कतारबद्ध
गिनते हुए बैठे हैं हम दोनों।

Wednesday, September 11, 2019

बहते हुये ज़ज़्बात हैं ...श्वेता सिन्हा

नज़र-नज़र की बात है
सच-झूठ,दिन या रात है

ख़ामोश हुई सिसकियाँ
बहते हुये ज़ज़्बात हैं 

लब थरथरा के रह गये
नज़रों की मुलाकात है

साँसों की ये सरगोशियाँ
नज़रों की ही सौगात है

रोया है कोई ज़ार-ज़ार
बिन अभ्र ही बरसात है

दिल की बिछी बिसात पर
नज़रों की शह और मात है

मनमर्ज़ियाँ चलती हो जब
नजरों की क्या औकात है

Tuesday, September 10, 2019

कचरे की वस्तुएँ ......अर्चना तिवारी


इंसान बड़ा सयाना है
वह सब जानता है
कि उसे क्या चाहिए, क्या नहीं
नहीं रखता कभी
अपने पास, अपने आसपास 
ग़ैरज़रूरी, व्यर्थ की वस्तुएँ
उन्हें फेंक देता है उठाकर
कचरे के डिब्बे में प्रतिदिन।
इंसान बड़ा सयाना है
नहीं फेंकता कुछ वस्तुएँ कभी
किसी भी कचरे के डिब्बे में
बेशक वे कितनी ही सड़-गल जाएँ
कितनी ही दुर्गन्धयुक्त हो जाएँ
उन्हें रखता जाता है सहेजकर
मन के डिब्बे में प्रतिदिन !!


लेखक परिचय - अर्चना तिवारी

Monday, September 9, 2019

कौशल शुक्ला


मैंने पत्थर में भी फूलों सी नज़ाकत देखी
पिस के सीमेंट बने, ऐसी शराफ़त देखी

थी तेज हवा, उनका आँचल गिरा गई
इस शहर ने उस रोज क़यामत देखी

'मर्ज कैसा भी हो, दो दिन में चला जायेगा'
तुमनें दीवार पर लिखी वो इबारत देखी?

क्या बेमिसाल जश्न मनाया था गए साल
उस विधायक की बड़ी जीत की दावत देखी?

अब एम ए भी भरा करते हैं चपरासियों के फार्म
हमारे देश में रोजगार की किल्लत देखी?

कितने शरीफ़ लगते थे अल्फ़ाज़ जिगर में,
अब कागज़ों पर इनकी शरारत देखी?

-कौशल शुक्ला

Sunday, September 8, 2019

हेकड़ी ......गुलज़ार

एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ 
अपनी धुन में रहता हूँ, मै मस्त कलंदर हूँ 

ताजमहल पे बैठ के मैंने ठुमरी-वुमरी गाई 
शाहजहाँ भी जाग गए, आ बैठे ओढ़ रजाई 
मै जितना ऊपर दीखता हूँ उतना ही अन्दर हूँ 
एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ 

कार्ल मार्क्स से बचपन में खेला है गिल्ली डंडा 
एफिल टावर पे चढ़ के छीना है चील से अंडा 
एवरेस्ट की चोटी भी हूँ मै एक समन्दर हूँ 
एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ 

लन्दन जा के जॉर्ज किंग को मैंने गाना सुनाया 
क्या नाम था रब-रक्खे उस को तबला सिखाया 
हरफन-मौला कहते है, मै एक धुरंधर हूँ 
एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ 

एक सिकंदर था पहले, मै आज सिकंदर हूँ   
-  गुलज़ार

Saturday, September 7, 2019

रफूगिरी.....साधना वैद



सारी ज़िंदगी
मरम्मत करती रही हूँ
फटे कपड़ों की
कभी बखिया करके
तो कभी पैबंद लगा के
कभी तुरप के
तो कभी छेदों को रफू करके !
धूप की तेज़ रोशनी और  
साफ़ नज़र की कितनी
ज़रुरत होती थी उन दिनों
सुई में धागा पिरोने के लिए
और सफाई से सीने के लिए !
मरम्मत तो अब भी
करती ही रहती हूँ
कभी रिश्तों की चादर में
पड़े हुए छेदों को
रफू कर जोड़ने के लिए  
तो कभी ज़िंदगी के
उधड़ते जा रहे लम्हों को
तुरपने के लिए
कभी विदीर्ण मन की
चूनर पर करीने से
पैबंद लगाने के लिए
तो कभी भावनाओं के
जीर्ण शीर्ण लिबास को  
बखिया लगा कर  
सिलने के लिए !
बस एक सुकून है कि
इस ढलती उम्र में
यह काम रात के
निविड़ अन्धकार में ही
बड़े आराम से हो जाता है
इसके लिए मुझे
किसी सुई धागे और
तेज़ रोशनी की
ज़रुरत नहीं होती !!

लेखिका - साधना वैद  

Friday, September 6, 2019

सोलह सिंगारों में प्रमुख मेंहदी ....आशा सक्सेना


सोलह सिंगारों में प्रमुख 
मेंहदी के रूप अनूप 
हाथों की शोभा होती दुगुनी 
जब पूर्ण कुशलता से रचाई जाती 
कलात्मक हरी हरी मेंहदी 
सावन में मेंहदी से करतीं 
महिलायें अपना श्रृंगार 
हरियाली तीज मनातीं धूमधाम से 
रक्षाबंधन पर बहनों के हाथ 
भरे रहते लाल लाल मेंहदी से 
हल्दी लगाने के बाद 
मेंहदी से सजाये जाते 
हाथ दुल्हन के 
मेंहदी का रंग जितना गहरा होता 
गहन प्यार की गवाही देता 
रचाई गयी कलात्मक मेंहदी से 
लिखा जाता हथेली पर 
प्रियतम का नाम 
बहुत समय लगता उसे खोजने में 
बहुत प्रसन्नता होती दूल्हे को 
देख कर प्रियतमा की हथेली पर 
अपना छिपा हुआ नाम 
दोनों के हाथों में रहता विश्वास 
रहे हाथों में हाथ इसी तरह 
कभी न छूटे साथ ! 

लेखिका - आशा सक्सेना 

Thursday, September 5, 2019

कहमुकरियाँ ....त्रिलोक सिंह ठकुरेला

1.
जब देखूँ तब मन हरसाये। 
मन को भावों से भर जाये। 
चूमूँ, कभी लगाऊँ छाती। 
क्या सखि साजन? ना सखि पाती॥
2.
रातों में सुख से भर देता। 
दिन में नहीं कभी सुधि लेता। 
फिर भी मुझे बहुत ही प्यारा।
क्या सखि साजन? ना सखि तारा॥
3.
मुझे देखकर लाड़ लड़ाये। 
मेरी बातों को  दोहराये। 
मन में मीठे सपने बोता। 
क्या सखि साजन? ना सखि तोता॥
4.
सबके सन्मुख मान बढ़ाये। 
गले लिपटकर सुख पंहुचाये। 
मुझ पर जैसे जादू डाला।
क्या सखि साजन? ना सखि माला।
5.
जब आये तब खुशियाँ लाता। 
मुझको अपने पास बुलाता।
लगती मधुर मिलन की बेला। 
क्या सखि साजन? ना सखि मेला। 
6.
पाकर उसे फिरूँ इतराती।
जो मन चाहे सो मैं पाती।
सहज नशा होता अलबत्ता।
क्या सखि साजन? ना सखि सत्ता।
7.
मैं झूमूँ तो वह भी झूमे। 
जब चाहे गालों को चूमे। 
खुश होकर नाचूँ दे ठुमका। 
क्या सखि साजन? ना सखि झुमका।
8.
वह सुख की डुगडुगी बजाये। 
तरह तरह से मन बहलाये। 
होती भीड़ इकट्ठी भारी। 
क्या सखि साजन? नहीं, मदारी।
 9.
जब आये,रस-रंग बरसाये।
बार बार मन को हरसाये। 
चलती रहती हँसी - ठिठोली। 
क्या सखि साजन? ना सखि, होली।
10.
मेरी गति पर खुश हो घूमे।  
झूमे, जब जब लहँगा झूमे।
मन को भाये, हाय, अनाड़ी।
क्या सखि,साजन? ना सखि साड़ी।
11.
बिना बुलाये, घर आ जाता।
अपनी धुन में गीत सुनाता।
नहीं जानता ढाई अक्षर।
क्या सखि,साजन? ना सखि, मच्छर।
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला..

Wednesday, September 4, 2019

जिहाल-ए-मिस्कीं ....गुलज़ार

जिहाल-ए-मिस्कीं मुकों बा-रंजिश, 
बहार-ए-हिजरा बेचारा दिल है,
सुनाई देती हैं जिसकी धड़कन, 
तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।

वो आके पेहलू में ऐसे बैठे, 
के शाम रंगीन हो गयी हैं,
ज़रा ज़रा सी खिली तबियत, 
ज़रा सी ग़मगीन हो गयी हैं।

कभी कभी शाम ऐसे ढलती है 
जैसे घूंघट उतर रहा है,
तुम्हारे सीने से उठता धुंवा 
हमारे दिल से गुज़र रहा है।

ये शर्म है या हया है, क्या है, 
नज़र उठाते ही झुक गयी है,
तुम्हारी पलकों से गिरती शबनम 
हमारी आंखों में रुक गयी है।
- गुलज़ार