Monday, July 22, 2019

कहाँ से आएगी माँ....यशोदा अग्रवाल


सोनोग्राफी क्लिनिक के अन्दर
एक महिला ने
थरथराते होठों से
एकान्त में..कहा
घर वाले मेरा ..
करवाना चाहते हैं
परीक्षण
जानना चाहते वे
लड़का है या फिर लड़की
अन्तरात्मा मेरी
धिक्कारती है मुझको
मैडम आप ही 
कोई दीजिए सुझाव
कह दीजिए आप
अगर 
आपने यह परीक्षण करवाया
तो प्रसव मैं नही करवा सकती..
हाँ,"मैडम ने कहा"
वैसे भी गलत भी 
हो जाते हैं कई टेस्ट 
सौ प्रतिशत 
कोई नहीं बता सकता
फिर मैडम ने कहा
क्यों नही चाहती आप??
क्या नहीं चाहिए बेटा??
लड़की तो हैं न एक फिर
ये खतरा क्यूँ...
वो महिला बोल पड़ी....
खतरा...
हाँ लड़की जन्मना 
खतरा ही तो है
पर,मैडम जी जब
एक माँ ऐसा सोचने लगे
तो फिर माँ कौन बनेगा
ये सृष्टि कैसे चलेगी???


Sunday, July 21, 2019

पहाड़ी (कुमाउँनी बोली) हाइकु..... कमला निखुर्पा


दैणा होया रे 
खोली का गणेशा हो 
सेवा करूंल ।
(1-अर्थ= दैणा होया= (कृपा करना),  
खोली =(मुख्य द्वार पर स्थापित)
2
दैणा होया रे
पंचनाम देवता
असीक दिया ।
( 2- असीक =आशीष)
3
मेरो पहाड़
हरयूँ  छ भरयूँ
आंख्यों मां  बस्युं ।
(3- अर्थ -हरयूँ  छ भरयूँ =हराभरा है)
4
बुरांशी फूली
डांडा कांठा सजी गे
के भल लागी ।
(4- बुरांश =एक पहाड़ी पुष्प, 
डांडा कांठा =पहाड़ का कोना कोना, 
भल =सुन्दर )
5
पाक्यो हिसालू
बेरू काफल पाक्यो
घुघूती बास्यो ।
 (5-हिसालू, बेरू ,काफल = पहाड़ी जंगली फल ,
घुघूती =पहाड़ी कबूतर,  बास्यो=गाता है  )

6
मुरूली बाजी
हुड़का ढमाढम
आयो बसंत ।
6- हुड़का = पहाड़ी वाद्ययंत्र 
(जो शिवजी के डमरू की तरह दिखता है)
7
गाओ झुमैलो
चाचरी की तान माँ
ताल मिलैलो ।
 (7-झुमैलो ,चाचरी =
पहाडी गीत जिसमें कदम से कदम मिलाकर 
समूह में नृत्य करते हैं।)
8
पीली आँङरी
घाघरी फूलों वाली
लागे आँचरी।
 ( 8- आँङरी = अँगिया(कुर्ती), 
आँचरी= परी  )
9
ओ री आँचरी
घर, खेत, जंगल
त्वीले सँवारी।
 (9- त्वीले = तुमने )
10-
मेरी बौराण
लोहा की मनख तू
हौंसिया पराण ।
(10- बौराण= बहुरिया(बहू), 
मनख =मनुष्य, 
हौंसिया पराण = जिंदादिल,हँसमुख)
11
छम छमकी
घुँघराली दाथुली
डाणा कांठा मां ।
[11- घुंघराली = घुंघरू लगे हुए , 
दाथुली= हँसिया(घास काटने का औजार)]
12
ओ री घसेरी
गाए तू जब न्योली
भीजी रे प्योंली ।
(12-घसेरी = घसियारिन,  
न्योली= विरहगीत/एक पक्षी,   
प्योंली=पीला पहाडी पुष्प )
13
पीठ पे बोझ
आँखें हेरे हैं बाट 
सिपाही स्वामी ।
14
धन्य हो तुम
धन्य हिम्मत तेरी
प्यारी घुघूती ।

15
तू शक्तिरूपा
इजा, बेटी, ब्वारी तू
तू वसुंधरा ।
(15 इजा=माँ , ब्वारी=बहू )

16
ऊँचा हिमाल
ऊँचो सुपन्यू तेरो
पूर्ण ह्वे जाल ।
( 16- सुपन्यू =सपना )
-कमला निखुर्पा

Saturday, July 20, 2019

ज़िंदगी की किताब.....अनीता सैनी


क़्त  ने   लिखे  अल्फ़ाज़,
ज़िंदगी  की नज़्म  बन  गयी, 
सीने में दबा, साँसों ने लिया संभाल, 
अनुभवों  की  किताब  बन गयी  |

होठों की मुस्कान, 
न भीगे  नम आँखों से,ख़ुशी का आवरण गढ़ गयी,
शब्दों को सींचा स्नेह से,
दर्द में डूबी मोहब्बत,अल्फ़ाज़ में सिमट गयी |

गुज़रे   वक़्त   को, 
आँखों  में किया बंद, लफ़्ज़ ज़िंदगी पढ़ती गयी , 
मिली  मंज़िल  मनचाही, 
हिम्मत  साँसों  में  ढलती गयी  |

 संघर्ष  के  पन्नों  पर, 
अमिट उम्मीद की मसी  फैल  गयी , 
सुख  खिला  संतोष  में,
इंसानियत  की  नींव  रखती   गयी  |

न हृदय को पड़ी,  मैं की  मार, 
न अंहकार से  हुई  तक़रार,
मिली चंद साँसें  उसी  को  जीवन वार,
ज़िंदगी अल्फ़ाज़  में  सिमटी  किताब  बन  गयी |
                

            लेखक परिचय - अनीता सैनी 

Friday, July 19, 2019

आँखों की अनदेखी लिपियाँ..रश्मि शर्मा


कही तुमने 
बार-बार वो बातें
जिनका मेरे लिए
न कोई अर्थ है
ना ही अस्तित्व

जो मैं पढ़ना चाहूँ
तुम्हारी आँखों की 
अनदेखी लिपियाँ
कहो, कौन सी कूट का
इस्‍तेमाल करूं !

ढूंढ रही हूँ 
कोई ऐसा स्रोत
ऐसी किताब
जो नयनों की भाषा को
शब्‍दों में बदलती हो

है ये ईसा पूर्व की, या
सोलहवीं सदी 
की सी बात
कि हमारे बीच से
शब्‍द अदृश्‍य ही रहे हैं

अब तुम पढ़ना
मेरा मौन, देखना 
मेरी अनवरत प्रतीक्षा
अब मैं कूट-लिपिक बन
पढूंगी बस
आँखों की अनदेखी लिपियाँ...। 

-रश्‍मि शर्मा
मूल रचना

Thursday, July 18, 2019

कुछ यूँ लगा जैसे....मीना शर्मा

छूकर मेरी पलकें मेरा सपना चला गया
कुछ यूँ लगा जैसे कोई अपना चला गया !

खाली पड़ा हुआ था, जो मुद्दत से बंद था
रहकर उसी मकान में मेहमां चला गया !

ले गया कोई हमें, हमसे ही लूटकर
इक अजनबी के संग दिल-ए-नादां चला गया !

आँखें तो कह रही थीं, रोक लो अगर चाहो
जाने के बाद फिर ये ना कहना - चला गया !

मंज़िल को ढ़ूँढ़ती रहीं कुछ गुमशुदा राहें
ना जाने कब, यहाँ से कारवां चला गया !

वो शौक, वो फ़ितूर, वो दीवानगी कहाँ ?
बारिश में भीगने का जमाना चला गया !

अब घोंसलों को तोड़कर बनते हैं घरौंदे
चिड़िया का इस शहर से आशियां चला गया !!!


लेखक परिचय -  मीना शर्मा 

Wednesday, July 17, 2019

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ..दिगंबर नासवा

खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा !!


लेखक परिचय -  दिगंबर नासवा

Tuesday, July 16, 2019

मरने के इन्तजार में एक दिन...अरुण चन्द्र रॉय

जिस दिन
मैं मर जाऊंगा
घर के सामने वाला पेड़
कट  जाएगा
उजड़ जाएंगे
कई जोड़े घोसले
उनपर नहीं चहचहाएंगी
गौरैया मैना
गिलहरियां भी
सुबह से शाम तक
अटखेलियां नहीं करेंगी
कोई नहीं रखेगा इन चिड़ियों के दाना और पानी
अपनी व्यस्तता से निकाल कर दो पल





पहली मंजिल की बैठकखाने की खिड़कियाँ

जहाँ अभी पहुँचती है पेड़ की शाखा
वहां सुबह से शाम तक रहा करेगा
उज्जड रौशनी
ऐसा कहते हैं घरवाले
मेरी पीठ के पीछे
इसी शाखा की वजह से
बैठकखाने में नहीं लग पा रहा है
वातानुकूलन यन्त्र
मेरी गोद  में उछल कर कहता है
मेरी सबसे छोटी पोती।





जैसे मेरे मरने के बाद नीचे नहीं आया करेगा

पीला कुत्ता
जिसे मैंने चुपके से गिरा दिया करता हूँ
अपने हिस्से की रोटी से एक कौर
मर जाएगा मेरे और कुत्ते के बीच एक अनाम सम्बन्ध
झूठ कहते हैं कि  कोई मरता है अकेला
जबकि जब भी कोई मरता है
उसके साथ मरती हैं  कई और छोटी छोटी चीज़ें



मरने का इन्तजार

पूरे जीवन के वर्षों से कहीं अधिक दीर्घ होता है !



Monday, July 15, 2019

तपती दुपहरी......शुभा मेहता

जेठ की इस 
तपती दुपहरी में
हाल -बेहाल
पसीने से लथपथ 
जब काम खत्म कर 
वो निकली बाहर 
घर जाने को 
बडी़ गरमी थी 
प्यास से गला 
सूखा.......
घर पहुँचने की जल्दी थी 
वहाँ बच्चे कर रहे थे 
इंतजार उसका 
सोचा ,चलो रिक्षा कर लूँ
फिर अचानक बच्चों की 
आवाज कान में गूँजी..
"माँ ,आज लौटते में 
तरबूज ले आना 
गरमी बहुत है 
मजे से खाएंगे"
और उसके कदम 
बढ़ उठे उधर 
जहाँ बैठे थे 
तरबूज वाले
सोचा ,बच्चे कितने खुश होगें 
मैं तो पैदल ही 
पहुंच जाऊँगी ...
पसीना पोंछ 
मुस्कुराई ...
तरबूज ले 
चल दी घर की ओर ......माँँ जो थी

लेखक परिचय - शुभा मेहता 

Sunday, July 14, 2019

वो .... पूजा प्रियम्वदा

सड़क के बीचों बीच 
भूल गयी अपना पता 
नाम, शख्सियत

गर्म तवा छू लिया 
सोचके कि 
ठंडी सुराही रखते थे 
पहले वहाँ 
चाय में नमक है 
सब्ज़ी में दूध उड़ेलते ही 
हवा को घुटन होने लगती है

आँसू हैं या पसीना 
कोई चखे तो जाने 
चेहरा भीग गया है 
उमस की अँधेरी रात 
आँखों में उतरती

किसी चौराहे पर 
निर्वस्त्र खड़ी है 
फ़व्वारे थक गए हैं 
वो अपना नाम भूल गयी है

- पूजा प्रियम्वदा

Saturday, July 13, 2019

माँ तेरा बचपन देख आया हूँ .... शिवनाथ कुमार


माँ तेरा बचपन देख आया हूँ 
माँ तुझे खेलता देख आया हूँ 
मैंने देखा तुम्हें 
अपनी माँ की गोद में रोते 
देखा तुम्हें थोड़ा बड़ा होते 
मिटटी सने हाथ देखे तुम्हारे 
खिलौने भरे हाथ देखे तुम्हारे 
तुम्हारी मासूम हँसी देखी 
तुम्हारा रोना देखा 
पापा का तुमपर बरसता प्यार देखा 
माँ का तुम्हारे लिए दुलार देखा 
तुम्हें पग पग बढ़ते देखा 
मेंहदी लगे तेरे हाथों में 
शादी के जोड़े में 
सजा श्रृंगार देखा 
आँखों में विदाई की पीड़ा 
माँ पापा भाई बहन अपनों से 
दूर जाने की पीड़ा 
तेरा अलग बनता एक संसार देखा 
तुम्हारी नयी दुनिया देखी 
पराये थे जो कल तक 
उनके लिए अपनेपन का भाव देखा 
लाखों दर्द छुपाए 
जिम्मेदारियों को ढोने का अंदाज देखा
ससुराल में रहकर भी  
मायका के लिए अटूट प्यार देखा 
माँ फिर मैंने खुद को देखा 
तुम्हारी गोद में 
तुम्हारी ममतामयी गोद में
तुम्हें मुझे खिलाते हुए  
और माँ 
अब तुम मुझे देख रही हो 
खेलते हुए 
बड़े होते हुए 
बूढ़े होते हुए !


लेखक परिचय - शिवनाथ कुमार 

Friday, July 12, 2019

कुछ रिश्ते अनाम होते है ....संजय भास्कर


कुछ रिश्ते अनाम होते है 
पर वो रिश्ते
दिल के करीब होते है 
अनाम होने पर भी रिश्ते 
कायम रहते है !
पर जब भी उन्हें नाम देने 
की कोशिश की जाती है !
तो जाने क्‍यूँ 
वो रिश्ते लड़खड़ाने लगते है 
नाम से रिश्ते तो बन्ध जाते है !
पर बेनाम आगे बढ़ते जाते है 
न कोई बंधन और न ही कोई सहारा 
सच्ची मुस्कान लिए होते है 
अनाम रिश्ते !
सभी बन्धनों से मुक्त ,
बिना किसी सहारे के लम्बी दूरी तक 
साथ निभाते है अनाम रिश्ते ! 
हमेशा दिल के पास होते है 
ये अनाम रिश्‍ते 
अपनेपन का नाम साथ लेकर ही
बस खास होते है !!
- संजय भास्कर

Thursday, July 11, 2019

रात सावन की...अज्ञेय

रात सावन की
कोयल भी बोली
पपीहा भी बोला
मैं ने नहीं सुनी
तुम्हारी कोयल की पुकार
तुम ने पहचानी क्या
मेरे पपीहे की गुहार?
रात सावन की
मन भावन की
पिय आवन की
कुहू-कुहू
मैं कहाँ-तुम कहाँ-पी कहाँ!
-अज्ञेय 

Wednesday, July 10, 2019

एक चिड़िया मरी पड़ी थी.....एम.वर्मा

बलखाती थी
वह हर सुबह 
धूप से बतियाती थी
फिर कुमुदिनी-सी 
खिल जाती थी
गुनगुनाती थी 
वह षोडसी
अपनी उम्र से बेखबर थी
वह तो अनुनादित स्वर थी 
सहेलियों संग प्रगाढ़ मेल था 
लुका-छिपी उसका प्रिय खेल था
खेल-खेल में एक दिन
छुपी थी इसी खंडहर में
वह घंटों तक 
वापस नहीं आई थी
हर ओर उदासी छाई थी
मसली हुई 
अधखिली वह कली
घंटों बाद 
शान से खड़े 
एक बुर्ज के पास मिली
अपनी उघड़ी हुई देह से भी
वह तो बेखबर थी
अब कहाँ वह भला
अनुनादित स्वर थी 
रंग बिखेरने को आतुर
अब वह मेहन्दी नहीं थी 
अब वह कल-कल करती
पहाड़ी नदी नहीं थी
टूटी हुई चूड़ियाँ 
सारी दास्तान कह रही थीं
ढहते हुए उस खंडहर-सा 
वह खुद ढह रही थी
चश्मदीदों ने बताया
जहाँ वह खड़ी थी 
कुछ ही दूरी पर 
एक चिड़िया मरी पड़ी थी !!

लेखक परिचय - ऍम वर्मा 

Tuesday, July 9, 2019

वह...मंजू मिश्रा

वह 

पूरे परिवार की 

जिंदगी का ताना बाना होती है 

घर भर के दुःख दर्द आँसू 

हँसी मुस्कान और रिश्ते... सब 

उसके आँचल की गांठ से बंधे 

उसकी डिग्री या बिना डिग्री वाली 

मगर गजब की स्किल्स के आस पास  

जीवन की आंच में धीरे धीरे पकते रहते हैं 

बच्चों के कच्ची माटी से भविष्य 

उसके सधे हाथों में गढ़ते रहते हैं 

और वह चौबीस घंटे धुरी सी 

घूमती रहती है

सबकी साँसों में साँसे पिरोती रहती है 

पता ही नहीं चलता 

वो कब जान लेती है 

सबके मन की बात 

पर शायद ही 

कोई जान पाता है 

कभी उसके मन की बात 

ये भी कोई कहाँ जान पाता है कि

कब होती है उसकी सुबह 

और कब होती है रात 

उसका सोना जागना 

सब कुछ मानो 

एक जादू की छड़ी सा 

न जाने 

कौन से पल में निपट जाता है

उसके पास 

सबकी फरमाइशों का खाता है

सबके दुःख दर्द का इलाज  

और घर भर के सपनों को 

पालने का जुझारूपन भी

मौका पड़े तो लड़ जाए 

यमराज से भी 

पता नहीं ये अदम्य साहस 

उसमे कहाँ से आता है 

जो भी हो उसका 

आसपास होना बहुत भाता है

जीवन से उसका अटूट नाता है 

उसे माँ के नाम से जाना जाता है 

Monday, July 8, 2019

वो रेल वो आसमान और तुम.....दीप्ति शर्मा

रेल में खिडकी पर बैठी
मैं आसमान ताक रही हूँ
अलग ही छवियाँ दिख रही हैं हर बार
और उनको समझने की कोशिश
मैं हर बार करती 
कुछ जोड़ती, कुछ मिटाती 
अनवरत ताक रही हूँ
आसमान के वर्तमान को या
अपने अतीत को
और उन छवियों में
अपनों को तलाशती
मैं तुम्हें देख पा रही हूँ
वहाँ कितने ही पेड़,
बेंच, कुआँ, सड़क, नाला,पहाड़
निकलते चले जा रहे हैं
इन्हें देख लगता है
इस भागती जिदंगी में
कितने साथ छूटते चले गये
मन के कोने में कुछ याद तो है ही
अब चाहे अच्छी हो ,बुरी हो
और मैं उन्हें ढोती ,रास्ते पार करती
तुम्हें खोज रही हूँ
बहुत बरस बाद आज ,
मन के कोने  से निकल दिखे हो
वहाँ बादलों की छवियों में
और मैं तुम्हें निहार रही हूँ !!

Sunday, July 7, 2019

"फिक्र".....मीना भारद्वाज

मेरी कुछ यादें और उम्र के अल्हड़ बरस ।
अब भी रचे-बसे होंगें उस छोटे से गाँव में ।।

जिसने ओढ़ रखी है बांस के झुरमुटों की चादर ।
और सिमटा हुआ है ब्रह्मपुत्र की बाहों में ।।

आमों की बौर से लदे सघन कुंजों से ।
      पौ फटते ही कोयल की कुहूक गूँजा करती थी ।।

गर्मी की लूँ सी हवाएँ बांस के झुण्डों से ।
सीटी सी सरगोशी लिए बहा करती थी ।।

हरीतिमा से ढका एक छोटा सा घर ।
मोगरे , चमेली और गुलाबों सा महकता था ।।

अमरूद , आम और घने पेड़ों  के बीच ।
हर दम सोया सोया सा रहता था ।।

बारिशों के मौसम में उसकी फिक्र सी रहने लगी है ।
नाराजगी में नदियाँ गुस्से का इजहार करने लगी हैं ।।


लेखक परिचय - मीना भारद्वाज 

Saturday, July 6, 2019

जब बताता है तुझे तेरा मुक़द्दर आइना.....डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी


2122 2122 2122 212
अब न चहरे की शिकन कर दे उजागर आइना ।
देखता रहता है कोई छुप छुपा कर आइना ।।

गिर गया ईमान उसका खो गये सारे उसूल ।
क्या दिखायेगा उसे अब और कमतर आइना ।।

सच बताने पर सजाए मौत की ख़ातिर यहां ।
पत्थरो से तोड़ते हैं लोग अक्सर आइना ।

आसमां छूने लगेंगी ये अना और शोखियां ।
जब दिखाएगा तुझे चेहरे का मंजर आइना ।।

अक्स तेरा भी सलामत क्या रहेगा सोच ले ।
गर यहां तोड़ा कभी बनके सितमगर आइना ।।

आरिजे गुल पर तुम्हारे है कोई गहरा निशान ।
अब दिखायेगा ज़माना मुस्कुरा कर आइना ।।

खुद के बारे में बहुत अनजान होकर जी रहा ।
आजकल रखता कहाँ इंसान बेहतर आइना ।।

तोड़ देंगे आप भी यह हुस्न ढल जाने के बाद ।
एक दिन बेशक़ चुभेगा बन के निश्तर आइना ।।

कुछ तो उसकी बेक़रारी का तसव्वुर कीजिये ।
जो सँवरने के लिए देखा है शब भर आइना ।।

हैं लबों पर जुम्बिशें क्यूँ इश्क़ के इज़हार पर ।
जब बताता है तुझे तेरा मुक़द्दर आइना ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी