Friday, May 24, 2019

कुछ अशआर...प्रीति श्रीवास्तव

वफा के बदले वफा क्यूँ नहीं देते।
जख्म दिया है दवा क्यूँ नहीं देते।।

आंख है नम जो तुम्हारी साथ से।
तुम उसे अभी भुला क्यूँ नहीं देते।।

मुहब्बत नहीं जब तुम्हारी रूह से।
गुनाह की उसे सजा क्यूँ नहीं देते।।
-प्रीति श्रीवास्तव

Thursday, May 23, 2019

फ्लाईओवर पर तेजी से दौड़ता हुआ शहर:) .....संजय भास्कर

फ्लाईओवर पर तेजी से दौड़ता 
हुआ शहर
यह वह शहर नहीं रहा अब
जिस शहर में 
'' मैं कई वर्षो पहले आया था ''
अब तो यह शहर हर समय भागता 
नजर आता है !
कच्ची सड़के ,कच्चे मकानों
और साधन के नाम पर
पर साईकल पर चलने 
वाले लोग 
रहते है अब आलिशान घरों में
और दौड़ते है तेजी से कारों में
नए आसमान की तलाश में
फ्लाईओवर के आर- पार
मोटरसाइकल कारों पर
तेजी से दौड़ता 
हुआ शहर
पहुच गया है नई सदी में
मोबाइल और इन्टरनेट के जमाने में
बहुत तेजी से बदल रहा है
..........छोटा सा शहर  !!!

-- संजय भास्कर 

Wednesday, May 22, 2019

शब्द ....श्वेता सिन्हा

मौन हृदय के आसमान पर
जब भावों के उड़ते पाखी,
चुगते एक-एक मोती मन का 
फिर कूजते बनकर शब्द।

कहने को तो कुछ भी कह लो
न कहना जो दिल को दुखाय,
शब्द ही मान है,शब्द अपमान
चाँदनी,धूप और छाँव सरीखे शब्द।

न कथ्य, न गीत और हँसी निशब्द
रूंधे कंठ प्रिय को न कह पाये मीत,
पीकर हृदय की वेदना मन ही मन 
झकझोर दे संकेत में बहते शब्द।

कहने वाले तो कह जाते है 
रहते उलझे मन के धागों से,
कभी टीसते कभी मोहते 
साथ न छोड़े बोले-अबोले शब्द।

फूल और काँटे,हृदय भी बाँटे
हीरक,मोती,मानिक,माटी,धूल,
कौन है सस्ता,कौन है मँहगा
मानुष की कीमत बतलाते शब्द।

-श्वेता सिन्हा

Tuesday, May 21, 2019

हाइकु..... डॉ.यासमीन ख़ान

मौन वेदना
हँसते हुए मुख
 नम हैं नैना
---------

कर्म है सिंधु
दूर अभी साहिल
नियति बिंदु।
---------

मन हिलोर
सजे याद की बज़्म
प्रेम ही ठौर।
-------

दिल को भाये
सदा से ही सागर
नैना रिझाये।
------------

महके यास्मीं 
जूही,चंपा,कली सी
सजी सी ज़मीं।
डॉ.यासमीन ख़ान 
02-05-2019

Monday, May 20, 2019

शायरी जाती रही...नामालूम ..व्हाट्सएप से


शौक़ सारे छिन गये, दीवानगी जाती रही
आयीं ज़िम्मेदारियाँ, तो आशिकी जाती रही

मांगते थे ये दुआ, हासिल हो हमको दौलतें
और जब आयी अमीरी, शायरी जाती रही

मय किताब-ए-पाक़ मेरी, और साक़ी है ख़ुदा
बोतलों से भर गया दिल, मयकशी जाती रही

रौशनी थी जब मुकम्मल, बंद थीं ऑंखें मेरी
खुल गयी आँखें मगर फिर रौशनी जाती रही

ये मुनाफ़ा, ये ख़सारा, ये मिला, वो खो गया
इस फेर में निनयानबे के ज़िन्दगी जाती रही

सिर्फ़ दस से पांच तक, सिमटी हमारी ज़िन्दगी
दफ़्तरी आती रही, आवारगी जाती रही

मुस्कुरा कर सितमग़र, फिर से हमको छल गया
भर गया हर ज़ख्म तो नाराज़गी जाती रही

उम्र बढ़ती जा रही है तुम बड़े होते नहीं
ऐसे तानों से हमारी, मसख़री जाती रही

हर उम्मीदें बर आईं हर खाहिशें हुई पूरी..,
लबे-तर से पुरकशीश वो तिश्नगी जाती रही..... 
-नामालूम ..व्हाट्सएप से

Sunday, May 19, 2019

एक प्रेमगीत-सात रंग का छाता बनकर....जयकृष्ण राय तुषार

सात रंग का
छाता बनकर
कड़ी धूप में तुम आती हो ।
अलिखित
मौसम के गीतों को
मीरा जैसा तुम गाती हो ।

जब सारा 
संसार हमारा साथ
छोड़कर चल देता है,
तपते हुए
माथ पर तेरा
हाथ बहुत सम्बल देता है,
आँगन में
चाँदनी रात हो,
चौरे पर दीया-बाती हो ।

कभी रूठना
और मनाना
इसमें भी श्रृंगार भरा है,
बादल-बिजली के
गर्जन से
अमलतास वन हरा-भरा है,
बार -बार
पढ़ता सारा घर
तुम तो एक सगुन पाती हो ।
-जयकृष्ण राय तुषार

Saturday, May 18, 2019

कविता की तलाश ......सरिता यादव

क्या लिखूँ मैं,
मेरे ख़ुदा मुझे एक कविता चाहिए।
कभी न सही 
अभी और इसी वक़्त चाहिए।
मेरे ख़ुदा मुझे एक कविता चाहिए, 
ताज न शोहरत चाहिए।
मेरे ख़ुदा मुझे 
कुछ शब्द चाहिए।
लिख सकूँ दिल की बात  
टूटी बिखरी यादों के अल्फ़ाज़
ढूँढ रही स्वछंद छंद।
ऐसी पंक्ति की कविता चाहिए 
मेरे ख़ुदा मुझे एक शब्द चाहिए।
मेरे ख़ुदा मुझे एक कविता चाहिए।
-सरिता यादव 

Friday, May 17, 2019

चारकोल....पूजा प्रियंवदा

याद चारकोल स्केच है 
धीरे-धीरे मन की पृष्ठभूमि में 
घुलने लगती है

तुम्हारा छूना 
एक स्थायी गोदना 
रूह के माथे पर 
धुंधलाने लगा है

आसमान 
काले और सफ़ेद के बीच 
नीला होना भुला चुका है

तुम्हारी मोहब्बत
दीमक बन ख़ोखला
कर रही है मेरे दिल को


Thursday, May 16, 2019

रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता ....महादेवी वर्मा

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रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;
इस निदाघ के मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता !

उसमें मर्म छिपा जीवन का,
एक तार अगणित कंपन का,
एक सूत्र सबके बंधन का,
संसृति के सूने पृष्ठों में करुणकाव्य वह लिख जाता !

वह उर में आता बन पाहुन,
कहता मन से, अब न कृपण बन,
मानस की निधियाँ लेता गिन,
दृग-द्वारों को खोल विश्वभिक्षुक पर, हँस बरसा आता !

यह जग है विस्मय से निर्मित,
मूक पथिक आते जाते नित,
नहीं प्राण प्राणों से परिचित,
यह उनका संकेत नहीं जिसके बिन विनिमय हो पाता !

मृगमरीचिका के चिर पथ पर,
सुख आता प्यासों के पग धर,
रुद्ध हृदय के पट लेता कर,
गर्वित कहता ‘मैं मधु हूँ मुझसे क्या पतझर का नाता’ !

दुख के पद छू बहते झर झर,
कण कण से आँसू के निर्झर,
हो उठता जीवन मृदु उर्वर,
लघु मानस में वह असीम जग को आमंत्रित कर लाता !
-महादेवी वर्मा 


Wednesday, May 15, 2019

तुम जीवित हो माने कैसे?....श्वेता सिन्हा

चित्र-मनस्वी प्रांजल

लीपे चेहरों की भीड़ में
सच-झूठ पहचाने कैसे?
अनुबंध टूटते विश्वास की
मौन आहट जाने कैसे?

नब्ज संवेदना की टटोले
मोहरे बना कर मासूमियत को,
शह मात की बिसात में खेले
शकुनियों के रुप पहचाने कैसे?

खींचते है प्राण,अजगर बन
निष्प्राण अवचेतन करके
निगलते सशरीर धीरे-धीरे
फनहीन सर्पों को पहचाने कैसे?

सोच नहीं बदलता ज़माना 
कभी नारी के परिप्रेक्ष्य में
बदलते युग के गान में दबी
सिसकियों को पहचाने कैसे?

बैठे हो कान में उंगलियाँ डाले
नहीं सुनते हो चीखों को?
नहीं झकझोरती है संवेदनाएँ?
मृत नहीं तुम जीवित हो माने कैसे?

Tuesday, May 14, 2019

खड़े जहाँ पर ठूँठ.....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

खड़े जहाँ पर ठूँठ
कभी वहाँ
पेड़ हुआ करते थे।
सूखी तपती
इस घाटी में कभी
झरने झरते थे।

छाया के 
बैरी थे लाखों
लम्पट ठेकेदार,
मिली-भगत सब 
लील गई थी
नदियाँ पानीदार।
अब है सूखी झील 
कभी यहाँ 
पनडुब्बा तिरते थे।

बदल गए हैं 
मौसम सारे
खा-खा करके मार
धूल-बवण्डर
सिर पर ढोकर 
हवा हुई बदकार 
सूखे कुएँ,
बावड़ी सूखी
जहाँ पानी भरते थे।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Monday, May 13, 2019

फेक इश्क.....ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

भटके हुये दिलों के प्रेमी
आत्म मंजिल तक
नहीं पहुंचते हैं... 
फिर गलत इंसान से
धोखा खाकर
सही इंसान
से बदला लेते हैं......
घर की तकलीफ़ें.
चौराहे पर उड़ेलकर
घर को मकां
कर लेते हैं.... 
जीवन में हम इंसा
सिर्फ़ सुख के लिए
बिखरते हैं... 
मेरे युवा भाई-बहनों
माता-पिता पर ना
तुम भार बनो... 
फेक इश्क में
बदनाम ना होकर
जनसेवा से
यशवान बनो
बनो राष्ट्रभक्त
गद्दारों के तुम
काल बनो
आतंक मिटे
इस धरती से
मिलकर कुछ
ऐसे काम करो






Sunday, May 12, 2019

मातृदिवस पर दो कविताएँ

तुमसा कोई नहीं है मां
मेरे हर दुःख-दर्द की
दवा है मेरी मां,
मुसीबतों के समय
मख़मली ढाल है मेरी मां,
अपनी चमड़ी के जूते बनाकर
पहनाऊं वह भी कम है, मां,
इस जहां में तो क्या,
किसी भी जहां में
तुमसा कोई नहीं है मां
-विनीता शर्मा


इंद्रधनुष की रंगत मां

प्यार की परिभाषा है मां
जीने की अभिलाषा है मां
हृदय में जिसके सार छुपा
शब्दों में छिपी भाषा है मां
इंद्रधनुष की रंगत है मां
संतों की संगत है मां
देवी रूप बसा हो जिसमें
ज़मीं पर ऐसी जन्नत है मां
-मधु टांक



माँ .....डॉ. कविता भट्ट

माँ जब मैं तेरे पेट में पल रही थी
मेरे जन्म लेने की ख़ुशी का रास्ता देखती 
तेरी आँखों की प्रतीक्षा और गति
उस उमंग और उत्साह को
यदि लिख पाती 
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 पहाड़ के दुरूह
चढ़ाई-उतराई वाले रास्तों पर
घास-लकड़ी-पानी और तमाम बोझ के साथ
ढोती रही तू मुझे अपने गर्भ में
तेरे पैरों में उस समय जो छाले पड़े
उस दर्द को यदि शब्दों में पिरो लेती
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 तेज़ धूप-बारिश-आँधी में भी
तू पहाड़ी सीढ़ीदार खेतों में
दिन-दिन भर झुककर 
धान की रोपाई करती थी
पहाड़ी रास्तों पर चढ़ाई-उतराई को 
नापती तेरी आँखों का दर्द और
उनसे टपकते आँसुओं का हिसाब
यदि मैं काग़ज़ पर उकेर पाती
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 तेरी ज़िंदगी सूखती रही
मगर तू हँसती रही
तेरे चेहरे की एक-एक झुर्री पर
एक-एक किताब अगर मैं लिख पाती
तो शायद मैं लेखिका बन जाती

 आज मैं हवाई जहाज़ से उड़कर
करती रहती हूँ देश-विदेश की यात्रा
मेरी पास है सारी सुख-सुविधा
गहने-कपड़े सब कुछ है मेरे पास
मगर तेरे बदन पर नहीं था 
बदलने को फटा-पुराना कपड़ा
थी तो केवल मेहनत और आस
मैं जो भी हूँ तेरे उस संघर्ष से ही हूँ
उस मेहनत और आस का हिसाब
काश! मैं लिख पाती 
तो शायद मैं लेखिका बन जाती ...
-डॉ. कविता भट्ट

Saturday, May 11, 2019

श्रृंगार है हिन्दी ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

खुसरो के हृदय का उद्‌गार है हिन्दी।
कबीर के दोहों का संसार है हिन्दी॥

मीरा के मन की पीर बन गूँजती घर-घर।
सूर के सागर - सा विस्तार है हिन्दी॥

जन-जन के मानस में, बस गई जो गहरे तक।
तुलसी के 'मानस' का विस्तार है हिन्दी॥

दादू और रैदास ने गाया है झूमकर।
छू गई है मन के सभी तार है हिन्दी॥

'सत्यार्थप्रकाश' बन अँधेरा मिटा दिया।
टंकारा के दयानन्द की टंकार है हिन्दी॥

गाँधी की वाणी बन भारत जगा दिया।
आज़ादी के गीतों की ललकार है हिन्दी॥

'कामायनी' का 'उर्वशी’ का रूप है इसमें।
'आँसू’ की करुण, सहज जलधार है हिन्दी॥

प्रसाद ने हिमाद्रि से ऊँचा उठा दिया।
निराला की वीणा वादिनी झंकार है हिन्दी॥

पीड़ित की पीर घुलकर यह 'गोदान' बन गई।
भारत का है गौरव, श्रृंगार है हिन्दी॥

'मधुशाला' की मधुरता है इसमें घुली हुई।
दिनकर के 'द्वापर' की हुंकार है हिन्दी॥

भारत को समझना है तो जानिए इसको।
दुनिया भर में पा रही विस्तार है हिन्दी॥

सबके दिलों को जोड़ने का काम कर रही।
देश का स्वाभिमान है, आधार है हिन्दी॥
रामेश्वर काम्बोज
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Friday, May 10, 2019

समानता....श्वेता सिन्हा

देह की 
परिधियों तक
सीमित कर
स्त्री की 
परिभाषा
है नारेबाजी 
समानता की।
दस हो या पचास
कोख का सृजन
उसी रजस्वला काल 
से संभव
तुम पवित्र हो 
जन्म लेकर
जन्मदात्री
अपवित्र कैसे?
रुढ़ियों को 
मान देकर
अपमान मातृत्व का
मान्यता की आड़ में
अहं तुष्टि या
सृष्टि के
शुचि कृति का
तमगा पुरुषत्व को
देव दृष्टि 
सृष्टि के 
समस्त जीव पर 
समान,
फिर…
स्त्री पुरुष में भेद?
देवत्व को 
परिभाषित करते 
प्रतिनिधियो; 
देवता का
सही अर्थ क्या?
देह के बंदीगृह से
स्वतंत्र होने को
छटपटाती आत्मा
स्त्री-पुरुष के भेद
मिटाकर ही
पा सकेगी
ब्रह्म और जीव
की सही परिभाषा।
-श्वेता सिन्हा

Wednesday, May 8, 2019

मेरी माँ ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

ढिबरी के नीम उजाले में
पढ़ने मुझे बिठाती माँ।

उसकी चक्की चलती रहती
गाय दूहना, दही बिलोना
सब कुछ करती जाती माँ।

सही वक़्त पर बना नाश्ता
जी भर मुझे खिलाती माँ।
घड़ी नहीं थी कहीं गाँव में
समय का पाठ पढ़ाती माँ।

छप्पर के घर में रहकर भी
तनकर चलती–फिरती माँ।
लाग–लपेट से नहीं वास्ता
खरी-खरी कह जाती माँ।

बड़े अमीर बाप की बेटी
अभाव से टकराती माँ।
धन–बात का उधार न सीखा
जो कहना कह जाती माँ

अस्सी बरस की इस उम्र ने
कमर झुका दी है माना।
खाली बैठना रास नहीं
पल भर कब टिक पाती माँ।

गाँव छोड़ना नहीं सुहाता
शहर में न रह पाती माँ।
वहाँ न गाएँ, सानी-पानी
मन कैसे बहलाती माँ।

कुछ तो बेटे बहुत दूर हैं
कभी-कभी मिल पाती माँ।
नाती-पोतों में बँटकर के
और बड़ी हो जाती माँ।

मैं आज भी इतना छोटा
है कठिन छूना परछाई।
जब–जब माँ माथा छूती है
जगती मुझमें तरुणाई।

माँ से बड़ा कोई न तीरथ
ऐसा मैंने जाना है।
माँ के चरणों में न्योछावर
करके ही कुछ पाना है।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

बिछोह.....पूजा प्रियंवदा

मुझ तक आने से पहले ही 
खर्च चुके थे तुम 
अपने सारे उम्र भर के वादे

गर्मी की किसी दोपहर 
किसी नीम अँधेरे कमरे में 
जो होठों से मेरे माथे पर रखा था 
वो बिछोह था हमेशा का

अमृता को पढ़ती हूँ 
गला भर आता है 
तुमसे बेतरतीब बालों वाले 
किसी छोटे बच्चे को देखती हूँ 
फूट -फूट कर रोने लगती हूँ

दिल उस सूफी का मज़ार है 
जिसका कासा कभी न भरा 
हथेलियों में उठाये फिर रही हूँ 
गर्म दिन, लम्बी रातें 
मेरी रूह पर जलने के दाग 
पक्के होने लगे हैं

Tuesday, May 7, 2019

हिंदी गौरव.....बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

(असबंधा छंद)
भाषा हिंदी गौरव बड़पन की दाता।
देवी-भाषा संस्कृत मृदु इसकी माता॥
हिंदी प्यारी पावन शतदल वृन्दा सी।
साजे हिंदी विश्व पटल पर चन्दा सी॥

हिंदी भावों की मधुरिम परिभाषा है।
ये जाये आगे बस यह अभिलाषा है॥
त्यागें अंग्रेजी यह समझ बिमारी है।
ओजस्वी भाषा खुद जब कि हमारी है॥

गोसाँई ने रामचरित इस में राची।
मीरा बाँधे घूँघर पग इस में नाची॥
सूरा ने गाये सब पद इस में प्यारे।
ऐसी थाती पा कर हम सब से न्यारे॥

शोभा पाता भारत जग मँह हिंदी से।
जैसे नारी भाल सजत इक बिंदी से॥
हिंदी माँ को मान जगत भर में देवें।
ये प्यारी भाषा हम सब मन से सेवें॥

-बासुदेव अग्रवाल 'नमन'