लिबास जो पहना था साल भर,
उम्र ने अब उतार कर रख दिया,
और साथ में उतार दिए,
वो गिनती के दिन, जो मुझे दिए थे,
कह कर के ये तेरा हिस्सा है,
इनको जिस मर्ज़ी खर्च कर।
बचा तो ना पाया मैं एक दिन भी,
पर जाने कहाँ उनको दे आया हूँ।
खुशियाँ तो नहीं खरीदी मैंने उनसे,
ना ही किसी के दुख बाँटे मैंने,
हाँ, कभी निकाले थे कुछ दिन,
किसी आरज़ू के लिए,
शायद बाक़ी किश्तें भरता रहा हूँ,
उसके पूरी होने के इंतज़ार में।
-गौरव धूत
