-१-
बैठा रहता
बहती धारा...
जिसको कविता कहता
दूर न पास
अंदर न बाहर
अपने आप में पूर्ण..
चलना कितना
दूर उसको ले आता
दरवाज़े के उस पार
आसमान नीलम-सा
मौन..
कविता गाता...।
-२-
प्रेम-कहानी
पढ़ने में
मुझें डर लगता...
क्योंकि
चमकते हुये तारों
और-
टूट के गिरते तारों में
फरक समझता हूँ...।
-३-
प्रेम...
कहते है ...
हर एक को होता और..
वह उड़ता रहता उसी
डगर में..
एक झलक ..देख
खिल उठता ..
इंद्रधनुष!
-पुरुषोत्तम व्यास

