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Sunday, January 15, 2017

उस पार का जीवन... सुशील कुमार शर्मा

मृत्यु के उस पार
क्या है एक और जीवन आधार 
या घटाटोप अंधकार।  

तीव्र आत्मप्रकाश
या क्षुब्ध अमित प्यास।   

शरीर से निकलती चेतना 
या मौत-सी मर्मांतक वेदना 
एक पल है मिलन का 
या सदियों की विरह यातना।  

भाव के भंवर में डूबता होगा मन 
या स्थिर शांत कर्मणा 
दौड़ता-धूपता जीवन होगा 
या शुद्ध साक्षी संकल्पना।

प्रेम का उल्लास अमित 
या विरह की निर्निमेष वेदना
रात्रि का घुटुप तिमिर है 
या हरदम प्रकाशित प्रार्थना।

है शरीर का कोई विकल्प
या है निर्विकार आत्मा
है वहां भी सुख-दु:ख का संताप 
या परम शांति की स्थापना।

है वहां भी पाप-पुण्य का प्रसार 
या निर्द्वंद्व अंतस की कामना 
होता होगा रिश्तों का रिसाव 
या शाश्वत प्रेम की भावना। 

-सुशील कुमार शर्मा

Tuesday, December 20, 2016

सच के साथ...........सुशील कुमार शर्मा


सच कहना
गुनाह तो नहीं है
रूठते लोग। 

मन में आंधी
घुमड़ते विचार
कब रुके हैं।  

सत्य बोलना
बहुत कठिन है
रहो अकेले।  

जब भी लिखा
कुछ न लिख पाया
सच के सिवा।  

मिट्टी का दीया
अंधेरे में प्रकाश
छोटी-सी आस।  

खिलाफ मेरे
सारा जहां खड़ा है
साथ हो तुम   

-सुशील कुमार शर्मा

Monday, October 31, 2016

सत्य कुछ फटा सा........... सुशील कुमार शर्मा





















सत्य कुछ फटा सा
लुटा सा
पिटा सा
हर एक पल
घटा सा।
सत्य कुछ फटा सा।

रोता हुआ
पिटता हुआ
सड़क पर
घिसटता हुआ
आधा साबुत
आधा मिटा सा।
सत्य कुछ फटा सा।  

पहला सा
सहला सा
गरीब जैसा
दहला सा
अजनबी जैसा
खटा सा।
सत्य कुछ फटा सा।  

बिकता हुआ
फिंकता हुआ
बेगारों सा
भटकता हुआ
पैरों के नीचे
अटा सा।
सत्य कुछ फटा सा।

सिमटता हुआ
निपटता हुआ
मन के कोने
चिमटता हुआ
अंदर से कुछ
घुटा सा।
सत्य कुछ फटा सा।  

थमता हुआ
रमता हुआ
बर्फ सा
जमता हुआ।
जिंदगी सा
मिटा सा।
सत्य कुछ फटा सा।

चीखता हुआ
चिल्लाता हुआ
टीवी पर
झल्लाता हुआ
सफेद कुर्ते में
ठुंसा सा।
सत्य कुछ फटा सा।  

मिटता हुआ
सटता हुआ
औरत की चीखों
सा घुटता हुआ
सबकी जुबां पर
रटा सा
सत्य कुछ फटा सा।    

-सुशील कुमार शर्मा