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Sunday, March 5, 2017

बचा हुआ है रास्ता.........कृष्ण सुकुमार










बचा हुआ हूँ शेष
जितना नम आँखों में विदा गीत !
बची हुई है जिजीविषा
जितनी किसी की प्रतीक्षा में
पदचापों की झूठी आहट !

बची हुई है मुस्कान
जितना मुर्झाने से पूर्व फूल !

बचा हुआ है सपना
जितना किसी मरणासन्न के मुँह में
डाला गंगाजल !

बचा हुआ है रास्ता
जितना अंतिम यात्रा में श्मशान !

और तुम ! बचे हुए हो
इन्हीं अटकलों के बीच कहीं !
गुनगुनायी जाती धुन की तरह...

-कृष्ण सुकुमार


Monday, February 6, 2017

मुझे क्यों सदा दी गई थी....


भड़कने की पहले दुआ दी गई थी।
मुझे फिर हवा पर हवा दी गई थी।

मैं अपने ही भीतर छुपा रह गया हूं,
ये जीने की कैसी अदा दी गई थी।

बिछु्ड़ना लिखा था मुकद्दर में जब तो,
पलट कर मुझे क्यों सदा दी गई थी।

अँधेरों से जब मैं उजालों की जानिब
बढा़, शम्मा तब ही बुझा दी गई थी।

मुझे तोड़ कर फिर से जोडा़ गया था,
मेरी हैसियत यूं बता दी गई थी।

सफर काटकर जब मैं लौटा तो पाया,
मेरी शख्सियत ही भुला दी गई थी।

गुनहगार अब भी बचे फिर रहे हैं,
तो सोचो किसे फिर सज़ा दी गयी थी। 


-कृष्ण सुकुमार