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Sunday, September 2, 2018

तेरी ज़रूरत ज्यादा है..........अमित जैन 'मौलिक'

रोमांटिक ग़ज़ल । लव ग़ज़ल । ग़ज़ल । Gazal । Best love gazal
मेरी उजरत कम, तेरी ज़रूरत ज्यादा है
ऐ ज़िंदगी कुछ तो बता, तेरा क्या इरादा है।

दांव पर ईमान लगाकर, तरक़्क़ी कर लेना
आज के दौर का, फ़लसफ़ा सीधा सादा है।

हड़बड़ी में दिख रहा, ख्वाहिशों का समंदर
लहरों में उफान है, आसमां पे चाँद आधा है।

ऐ जम्हूरियत तू भी, अब पहले जैसी नहीं रही
आजकल मुल्क में काम कम, शोर ज्यादा है।

बहुत हुई बारूदों की ज़िद, ये तमंचों की होड़ 
ख़ुदा ख़ैर करे, अभी क्या कम खून ख़राबा है।

नूर की ख़ातिर सितारे को, इतना ना निचोड़ो
सीधा चाँद को थामो, ये तो उसका एक प्यादा है।

-अमित जैन 'मौलिक'

Saturday, October 28, 2017

ख़्वाब कोई मचल रहा होगा....अमित जैन 'मौलिक'

नींद में चांद चल रहा होगा
ख़्वाब कोई मचल रहा होगा.

हूक़ उठती है दिल लरज़ता है
कोई कहके बदल रहा होगा.

वो हवाओं से बैर क्यों लेगा
जो चिरागों सा जल रहा होगा.

आँख नींदों से भर गया कोई
ख़्वाब नैनों में मल रहा होगा.

आप आये बड़ी नवाज़िश है 
आपका दिल पिघल रहा होगा.

इन मुंडेरों पे चाँद खिलता था
ख़ूबसूरत वो पल रहा होगा.

हाँ यहीं पर बना है ताज़महल
हाथ हाथों में कल रहा होगा.

दिन ढला फिर वही कयामत है
दिल मचलकर संभल रहा होगा.

Monday, October 16, 2017

माँ चुप रह जाती है...............अमित जैन 'मौलिक'

मेरे हालात को मुझसे, पहले समझ जाती है
माँ अब कुछ नहीं कहती, चुप रह जाती है।

तब भी मुस्कराती थी, अब भी मुस्कराती है
माँ चुप रहकर भी, बहुत कुछ कह जाती है।

एक वक्त था जब सब, माँ ही तय करती थी
अब क्या तय करना है, तय नहीं कर पाती है।

तसल्लियों की खूंटी पर, टांग देती है ज़रूरतें
मेरी मुश्किलात माँ, पहले ही समझ जाती है।

जिसे दुश्वारियों के, तूफ़ान भी ना हिला पाये हों
वो अपने बच्चे के, दो आँसुओं में बह जाती है।

मेरी माँ कभी मेरी, जेबें खाली नहीं छोड़ती 
पहले पैसे भरती थी, अब दुआयें भर जाती है।

Thursday, October 12, 2017

तेरी ज़रूरत ज्यादा है..........अमित जैन 'मौलिक'


रोमांटिक ग़ज़ल । लव ग़ज़ल । ग़ज़ल । Gazal । Best love gazal
मेरी उजरत कम, तेरी ज़रूरत ज्यादा है
ऐ ज़िंदगी कुछ तो बता, तेरा क्या इरादा है।

दांव पर ईमान लगाकर, तरक़्क़ी कर लेना
आज के दौर का, फ़लसफ़ा सीधा सादा है।

हड़बड़ी में दिख रहा, ख्वाहिशों का समंदर
लहरों में उफान है, आसमां पे चाँद आधा है।

ऐ जम्हूरियत तू भी, अब पहले जैसी नहीं रही
आजकल मुल्क में काम कम, शोर ज्यादा है।

बहुत हुई बारूदों की ज़िद, ये तमंचों की होड़ 
ख़ुदा ख़ैर करे, अभी क्या कम खून ख़राबा है।

नूर की ख़ातिर सितारे को, इतना ना निचोड़ो
सीधा चाँद को थामो, ये तो उसका एक प्यादा है।

Friday, October 6, 2017

आतुरता......अमित जैन 'मौलिक'


आतुरता का
व्याकुलता की ओर
यह प्रवाह
आह!!
गुमान ही ना था
कोई अनुमान ही ना था।
लज़्ज़त के गगन से
टप्प टप्प बूँद गिरती रही
हृदय के रजत कटोरे में
चुपके से, लबालब 
चांदनी भरती रही।
जब तंद्रा टूटी 
तो देखा
विदीर्ण हो गई
किन्तु-परंतु की रेखा
जब होश आया तो देखा
पीयूष से भर गया घट
लहक उठा आलम
ख़यालों में था मन
अधखुले नयनों के
बंद ही न होते पट।
क्या छुआ
जो यूँ हुआ
ये वज़ूद तो
तने की तरह तना था
बेपरवाह लापरवाह
स्वयं में मुग्ध।
घट का पीयूष पिया
तो समझा 
अब तक क्या जिया।
खुरदुरेपन में फूटे 
नवीन अंकुर
निकल आईं शाखायें
अब मैं हरा भरा हूँ
हाँ एक जगह ही खड़ा हूँ,
लेकिन तुम थोड़ा और 
उतंग करो अपना उफान
मैं छू लूंगा तुम्हारे तरंगित
अस्तित्व को, 
झुक कर-झुकाकर 
अपनी शाखायें,
हो जाऊँगा तरबतर।
उम्मीदें बढ गईं हैं
कि अब जी लूंगा
देर सवेर ही सही
मैं अमृत पी लूंगा।
- अमित जैन 'मौलिक'