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Monday, July 1, 2019

सोलह श्रृंगार. .......नरेंद्र श्रीवास्तव

ये सोलह श्रृंगार है, अभिसार के लिये।
ये चितवन इज़हार है, इक़रार के लिये॥

ये चूड़ी की खनक,
ये बिंदी की चमक।
ये माला की लटक,
ये पायल की छमक॥
ये प्रीत मनुहार है, दिलदार के लिये।

ये मेहंदी की महक,
ये माहुर की चहक।
ये काजल की दहक,
ये कुंकुम की कहक॥
ये अमृत बयार है, सत्कार के लिये।

ये सपनों की लचक
ये लज्जा की कसक।
ये रिश्ते की भनक,
ये अपनों की झलक॥
ये अंतर पुकार है,दीदार के लिये।
-नरेंद्र श्रीवास्तव

Thursday, October 19, 2017

चंद हाईकू...नरेंद्र श्रीवास्तव


शिकारी हारा
जाल सहित पक्षी
नभ में उड़े।
*
दर्द के गीत
प्रीत लिखती रही
पत्थर देव।
*
मौन आकांक्षा
मन की बात जाने
कोई अपना।
*
शब्द व्यथित
अपरिचित जन
भाषा अंजान।
*
नदी से रेत
पर्वत से खनिज
लुटती धरा।

-नरेंद्र श्रीवास्तव


Friday, October 13, 2017

मुक्तक.............नरेंद्र श्रीवास्तव


क़िस्मत
~~~~~
किसान के दिन
परेशानियों ने लादे
आसमान से
ओले मिले
नेताओं से वादे।
....

प्यासे
~~~~
वे
अच्छे अच्छों को
पानी पिलाते हैं
बाक़ी
प्यासे रह जाते हैं
*
प्रशंसक
~~~~~
एक नेता ने
कमाल कर दिखाया
उन्होंने
खिलौने में 
प्लास्टिक का
कुत्ता खरीदा
प्रशंसक दौड़कर
प्लास्टिक के
बिस्किट ले आया।
*
चमत्कार
~~~~~~
उनका
कुरता पायजामा
चमत्कार
दिखलाता है
काम बनाता है।
*
गड्ढे
~~~
सड़क के गड्ढे
उनके
बड़े काम आते हैं
जेब भर जाते हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव