रंग-बिरंगे पर फड़काती,
तितली जब बगिया में आती
सब बच्चो के मन को भाती,
सब बच्चो का जी ललचाता
फूलो के ऊपर मंडराती,
पत्तों के पीछे छिप जाती
रंगत कैसे इतनी पाती
नहीं किसी को भी बतलाती
जी में आता उसे पकड़कर
हम अपने घर में ले आए
अपनी दादी को दिखलाए
अपने दादा को दिखलाए
यह चंचल-चालाक बड़ी है
हाथ किसी के कभी न आती
हाथो कि छाया भी उस पर
पड़ी कि वह झट से उड़ जाती
तितली रानी, बोल सको तो
इतना तो जाओ बतलाती
मुझको याद तुम्हारी आती
मेरी याद तुम्हे भी आती ?
-स्मृतिशेष हरिवंशराय बच्चन
मूल रचना