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Saturday, April 26, 2014

कुछ आन जरुरी लगती है..........मनोज सिंह"मन"


इक़ दर्द छुपा हो सीने में,तो मुस्कान अधूरी लगती है,
जाने क्यों,बिन तेरे,मुझको हर शाम अधूरी लगती है,

कहना है,तुमसे दिल को जो,वो बात जरुरी लगती है,
तेरे बिन मेरी गज़लों की,हर बात अधूरी लगती है,

दिल भी तेरा,हम भी तेरे,एक आस जरुरी लगती है,
अब बिन तेरे,मेरे दिल को,हर सांस अधूरी लगती है,

माना की जीने की खातिर,कुछ आन जरुरी लगती है,
जाने क्यों,"मन"को तेरे बिन,ये शान अधूरी लगती है,

मनोज सिंह"मन"


Monday, April 21, 2014

किस्से तो बहुत होते है प्यार के यहाँ.........नीशीत जोशी



पढ़ के किताब प्यार किया नहीं जाता,
जब हो जाये तब से जिया नहीं जाता,

किस्से तो बहुत होते है प्यार के यहाँ,
"मजनू" नाम सबको दिया नहीं जाता,

मर कर भी कई आशिक अमर हो गए,
हर आशिको से ज़हर लिया नहीं जाता,

किताबी रवायत का मुहब्बत में काम नहीं,
दिल खोने के बाद कुछ किया नहीं जाता,

कई अंजाम लिखे मिलेंगे उन किताबो में,
परवाह करने वालो से प्यार किया नहीं जाता !!!!

-नीशीत जोशी
प्राप्ति स्रोतः ग़ज़ल संध्या
https://www.facebook.com/GazalaSandhya?ref=hl

Sunday, April 20, 2014

ये दुनिया है दिल नही चेहरे देखती है...............प्रकाश सिंह बघेल ''बाबा''



वो तो अब महल नही पहरे देखती है ,
ये दुनिया है दिल नही चेहरे देखती है ,

भले ही फुटपाथ पर सोती है वो आँख ,
लेकिन ख्वाब वो भी सुनहरे देखती है,

वो तो अब महल नही पहरे देखती है ,
ये दुनिया है दिल नही चेहरे देखती है ,

भले ही फुटपाथ पर सोती है वो आँख ,
लेकिन ख्वाब वो भी सुनहरे देखती है,

पता है वक़्त उनके घर से निकलने का,
सारी दुनिया नाज़नीन के नखरे देखती है ,

वो भी इश्क करती है पर डरती है बहुत ,
पगली है वो मंजिल नही खतरे देखती है ,

पढ़ लेती मेरी आँखों कि मायूसी को भी ,
वो मेरी माँ है जो इतने गहरे देखती है ,

गंदी बस्तियों में भी कुछ सितारे रहते है ,
तेरी अमीरी है जो इनमे कचरे देखती है ,

-प्रकाश सिंह बघेल ''बाबा''

Friday, April 18, 2014

बुरा है तो भला क्या है..........राजीव कुमार


बुरा है तो भला क्या है, खलिश है तो खला क्या है
सवालों से हुआ क्या है, सवालों में भला क्या है

मुकद्दर अपने घर पे है, मुसीबत हर डगर पे है,
जो होना है हुआ ही है, दुवाओं से टला क्या है/

जमाना जिद पे है कायम, नफासत हो गयी गायब,
ये ही दौर ए तरक्की है, हवाओं में घुला क्या है/

भयानक है बड़ा मंजर, हर इक हाथों में है खंजर,
ये ख्वाहिश है की साजिश है,दिलों में ये पला क्या है/

शिकन माथे की गहरी है, मादर-ए-हिन्द कहती है,
गुलामी फिर से आनी है, गुलामों से गिला क्या है /

ये हुस्न ओ इश्क़ के जलवे, जहाँ जैसे हैं रहने दो,
नज़ाकत और दिखावे के, अदाओं से मिला क्या है/

-राजीव कुमार
प्राप्ति स्रोतः ग़ज़ल संध्या (फेसबुक)
https://www.facebook.com/GazalaSandhya?ref=hl