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Sunday, August 17, 2014

इतना घूमा हूँ तुम्हारी चाह में.........अश्विनी कुमार विष्णु


 
 
अपना सारा जिस्म ही महका लगे
सोचना तुमको बहुत अच्छा लगे !

यूँ भी होता है तुम्हारी बज़्म में
वक़्त अपनी गोद में ठहरा लगे !

इस तरह देखो मुझे तुम आँख भर
ज़ख़्म इस दिल पर कोई गहरा लगे !

इतना घूमा हूँ तुम्हारी चाह में
ख़ूँ में हरदम कारवाँ भटका लगे !

कीजिए तो इश्क़ मौजे-नूर है
सोचिए तो धुन्ध का दरिया लगे !!

--अश्विनी कुमार विष्णु
प्रस्तुतिः सोनू अग्रवाल


http://yashoda4.blogspot.in/2012/05/blog-post.html

Wednesday, July 30, 2014

यादों की किरचें ..................................फाल्गुनी
















दिल की कोमल धरा पर
धँसी हुई है
तुम्हारी यादों की किरचें
और
रिस रहा है उनसे
बीते वक्त का लहू,

कितना शहद था वह वक्त
जो आज तुम्हारी बेवफाई से
रक्त-सा लग रहा है।
तुम लौटकर आ सकते थे
मगर तुमने चाहा नहीं

मैं आगे बढ़ जाना चाहती थी
मगर ऐसा मुझसे हुआ नहीं।

तुम्हारी यादों की
बहुत बारीक किरचें है
दुखती हैं
पर निकल नहीं पाती

तुमने कहा तो कोशिश भी की।
किरचें दिल से निकलती हैं तो
अँगुलियों में लग जाती है

कहाँ आसान है
इन्हें निकाल पाना
निकल भी गई तो कहाँ जी पाऊँगी
तुम्हारी यादों के बिना। 
-फाल्गुनी