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Tuesday, April 2, 2019

एहसास की रिदाएं....सुरेश पसारी

ख़्वाबो- ख़याल में ही तुम्हें सोचने लगा
अर ज़िन्दगी से अपनी कहीं जोड़ने लगा

जिसकी ज़ुबां पे प्यार के अल्फ़ाज़ ही नहीं
नफ़रत के लफ़्ज़ आज वही बोलने लगा

हमने उसी को अपना बनाया था राज़दार
जो राज़ दफ़्न थे वो सभी खोलने लगा

अपना किसे कहूँ कि जहां में तेरे सिवा
रिश्ते हरेक शख़्स यहाँ तोड़ने लगा

अपनी हदों को तोड़के मिलने की आरज़ू
एहसास की रिदाएं ही मैं ओढ़ने लगा

आने लगी है यार की अब याद इस तरह
हर वक़्त हर घड़ी मैं उसे सोचने लगा
-सुरेश पसारी

रिदा... चादर

Saturday, October 29, 2016

न्याय.............अधीर













न्याय बिक जाता है ...
कोतवाल बिक जाता है....
वकीलों का भी,
हर सवाल बिक जाता है,
सच को भी यहाँ….
अक्सर बिकते देखा है,
मुजरिमों को ऐश.... 
हमने करते देखा है,
मिलती है सज़ायें..
नेकी ..करने वालो को,
मिटा देते है कभी कभी 
ये अंधेरें भी.. उजालो को
हाँ... 
इस बात से,
नही मुझे इंकार है,
की नेकियाँ जहां में..
फिर भी बरक़रार है।

-सुरेश पसारी "अधीर"