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Saturday, July 25, 2020

रंग फूलों के निखरने लगे ...विनोद प्रसाद

अब तक कुछ किया नहीं, तबियत के मुताबिक
बस निभाते रह गए फकत,रवायत के मुताबिक

कू ब कू शोर बहुत है गुलशन में बहार आने की
रंग फूलों के निखरने लगे लताफ़त के मुताबिक

जोरे हुकूमत से तो सर झुका नहीं सकते अपना
तस्लीम किया करते हैं हम,वज़ाहत के मुताबिक

ताउम्र एहतिराम किया चाहा किया दिल से जिसे
पेशे नजर हम जब भी हुए,ज़ियारत के मुताबिक़

है बात दीगर दर्दो गम कुछ ज्यादे मिले उल्फत में
हर चीज कहाँ बँटती है अब वसियत के मुताबिक

उस दिन के बाद लौटकर फिर गुजरे नहीं गली से
अब आईने में भी पराए से हुए सूरत के मुताबिक

वक्त की रफ्तार में, हस्ती हमारी कुछ भी तो नहीं
मिलना है जो मिलता है इस किस्मत के मुताबिक

कैद ए हयात से न मिली अब तक निजात हमको
चंद सांसों की बस इजाजत जमानत के मुताबिक
-विनोद प्रसाद

Sunday, June 14, 2020

खुला है मैक़दा कोई ....डॉ. नवीनमणि त्रिपाठी

1212 1122 1212 22
यूँ उसके हुस्न पे छाया शबाब धोका है ।
तेरी नज़र ने जिसे बार बार देखा है ।।1

वफ़ा-जफ़ा की कहानी से ये हुआ हासिल।
था जिसपे नाज़ वो सिक्का हूज़ूर खोटा है ।।2

उसी के हक़ की यहां रोटियां नदारद हैं ।
जो अपने ख़ून पसीने से पेट भरता है ।।3

खुला है मैक़दा कोई सियाह शब में क्या ।
हमारे शह्र में हंगामा आज बरपा है ।।4

निकल पड़े न किसी दिन सितम की हद पर वो ।
जो अश्क़ मैंने अभी तक सँभाल रक्खा है ।।5

मिले हैं फूल किताबों में आज फिर यारो ।
पता करें ये मुहब्बत का काम किसका है ।।6

अब उनके बारे में चर्चा तमाम क्या करना ।
जो अपनी शर्तों पे इस ज़िन्दगी को जीता है ।।7

न घर से उठ सकी ईमानदार की अर्थी ।
ये किस के साथ खड़ा देखिए ज़माना है ।।8

हर एक ज़र्रा है रोशन ग़रीब ख़ाने का ।
अभी अभी तो मेरे घर में चाँद उतरा है ।।9

ये दिल है आज मुअत्तर सनम की खुशबू से ।
बहुत क़रीब से महबूब मेरा गुज़रा है ।।10

वो शख़्स फिर न मुहब्बत में डूब जाए कहीं ।
बहार आई है मौसम नया नया सा है ।। 11
- नवीन मणि त्रिपाठी

Saturday, May 16, 2020

महजबी अलाव को सलाम ...विनोद प्रसाद

धूप को सलाम है,है छांव को सलाम
छोड़ जो आए हरेक गाँव को सलाम

निःस्वार्थ समर्पित है सेवार्थ सभी के
तपते रास्तों के नंगे पाँव को सलाम

लहरों को नमन प्रणाम आँधियों को
मंझधार में डूबी उस नाव को सलाम

टीस ने जो गीत बुने आपका आभार
जख्मों से उपजे हुए धाव को सलाम

मन्दिर ओ मस्जिद नहीं बस्तियाँ जलाते
सुलगे हुए महजबी अलाव को सलाम

उँची सियासती कद को है मेरे आदाब
आदमी के गिरते हुए भाव को सलाम
-विनोद प्रसाद

Saturday, May 2, 2020

छाँह कहाँ रह गई ....विनोद प्रसाद

मनचाही जाने अब चाह कहाँ रह गई
पहुँचा दे घर तलक,राह कहाँ रह गई

दंतहीन वृक्ष खड़े रास्तों में कतारों से
सुलग रही धूप में छाँह कहाँ रह गई

कहाँ रह गई हमारे आंगन की रौनकें
ओट से निहारती निगाह कहाँ रह गई

हो गया गंदला मानसरोवर सा यह मन
प्रीत गंगा में भी वह,थाह कहाँ रह गई

रिश्ते भी ऐसे कर्ज ढोते हैं एहसानों के
अब तो संबंधों में निबाह कहाँ रह गई

बच्चे की किलकारी भी शोर हो गई है
घर के बुजुर्गों की सलाह कहाँ रह गई

अब हौसले भी नहीं हैं जीने के अपने
यह जिन्दगी होके तबाह कहाँ रह गई
-विनोद प्रसाद

Monday, April 20, 2020

क्या कमी थी मुझमें ....अर्जुन थापा 'चिन्तन'

दफन थी जो बात दिल में
वो बात मैंने किसी से कहा नहीं

मिलने का वादा कर
तु मिलने आई क्यों नहीं

क्या कमी थी मुझमें दिल का जख्म
तेरी यादों से अभी तक भरा नहीं

इन आँखों में अब भी तेरा इन्तजार
वादा कर तु मिलने आई क्यों नहीं

ढू़्ंढा तुझे कहां-कहां
तेरा मकां मुझे मिला नहीं

दिल की बात रह गई दिल में
मोहब्बत का इजहार मुझसे हुआ नही

करता रहा मैं प्यार तुझसे
दुबारा तेरी सूरत दिखाई दी नहीं

-अर्जुन थापा 'चिन्तन'

Sunday, April 12, 2020

ख़ुदा ख़ैर करे' ...डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

2122 1122 1122 22

तेरी आँखें हैं ख़ता वार ख़ुदा ख़ैर करे' ।
दिल हुआ मेरा गिरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

ज़मीं की तिश्नगी को देख रहा है बादल ।
आज बारिश के हैं आसार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

नाम आया है मेरा जब से सनम के लब पर ।
पूरी बस्ती हुई बेज़ार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

हर तरफ़ उनकी अदाओं पे हुआ हंगामा ।
ज़िंदगी जीना है दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

बिजलियाँ खूब गिराते हैं नशेमन पे सनम।
सब्र की टूटे न दीवार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

अब तो मासूम दिलों पर है उसी का कब्जा ।
हुस्न की चल रही सरकार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

कास आएं तो सही आप मेरी महफ़िल में ।
बज़्म हो जाए ये गुलज़ार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

लोग उल्फ़त की तिज़ारत का तक़ाज़ा लेकर ।
खुद ब खुद आ रहे बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

अपनी ताक़त पे जो इतरा रहे थे दुनियाँ में ।
आज वो मुल्क भी लाचार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

वो क़यामत है क़रोना की तरह छूते ही ।
दिल हज़ारों हुए बीमार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

क़ैद हूँ घर में मिलूं भी तो भला कैसे मिलूं ।
याद तड़पाये बहुत बार ख़ुदा ख़ैर करे ।।

-डॉ. नवीन मणि त्रिपाठी

Saturday, February 22, 2020

इक हाँ के इंतिज़ार में ....ज़नाब मेंहदी अब्बास रिज़वी

आज आपको एक ग़ज़ल पढ़वा रहे हैं
फेसबुक से उठा लाए हैं हम
आपको ज़रूर पसंद आएगी
...
वादा किया है जो भी निभाएंगे रात दिन
हर रस्में वफ़ादारी दिखाएँगे रात दिन।

नज़रों से तेरी आँख का काजल निकाल कर,
चेहरे को अपने ख़ूब सजाएँगे रात दिन।

हर इक क़दम पे रूसवा हुए ठोकरें मिलीं,
फिर भी तेरी गली में ही आएंगे रात दिन।

आग़ोशे एहतिजाज के पाले हुए है हम,
ज़ुल्मों सितम को आँख दिखाएँगे रात दिन।

मंज़िल मिलेगी मुझ को भरोसा रहा सदा,
नारा - ए इंक़लाब लगाएंगे रात दिन।

इक हाँ के इंतिज़ार में सदियां गुज़र गईं,
मिलते जवाब नाज़ उठाएंगे रात दिन।

बाद-ए-सबा के आते अंधेरा भी जायेगा,
फिर अज़्म का चराग़ जलाएंगे रात दिन।

जो कुछ दिया है उस के लिए शुक्रिया जनाब,
हर ज़ख़्में दिल सभी को दिखाएँगे रात दिन।

' मेंहदी ' उदास न हो गुलूकार हर तरफ़,
नग़में तुम्हारे झूम के गाएंगे रात दिन।
 -ज़नाब मेंहदी अब्बास रिज़वी
" मेंहदी हल्लौरी "