ज़मीर और मतलब की यलग़ार में
उजागर हुए ऐब किरदार में
गिरा है ज़मीर ऐसा इंसान का
क़बा बेच आया है बाज़ार में
न पूछो वहाँ ऐश राजाओं के
जहां संत लिपटे हों व्यभिचार में
तजर्बे ये हासिल हैं इक उम्र का
निहाँ हैं जो चांदी के हर तार में
तमद्दुन ने हम को अता क्या किया
कि इंसानियत थी फ़क़त ग़ार में
गुलों की नज़ाकत ने ताईद की
अजब सी कशिश है हर इक ख़ार में
कोई नर्म कोंपल उभर आयेगी
“इन्हीं ज़र्द पत्तों के अंबार में”
न “मुमताज़” जीता यहाँ सच कभी
ये सब मंतक़ें यार बेकार में
-मुमताज़ नाज़ां 09867641102
यह रचना मुझे lafzgroup.wordpress.com में पढ़ने को मिली
आप भी पढ़ सकते हैं इसे यहाँ- http://wp.me/p2hxFs-1oH
आप भी पढ़ सकते हैं इसे यहाँ- http://wp.me/p2hxFs-1oH
चित्र गूगल महराज की कृपा से
