मुझे पुकार लो कभी तुम मुस्कुरा के,
झुकी-झुकी सी नज़र से शरमा के।
खिले हुए सूरत-ए-कँवल को,
दिन बहुत हो चुके,
हँसे हुए लब़-ए-ग़ज़ल को,
दिन बहुत हो चुके,
वही अदा का दीदार दो फिर जुल्फ़ उठाके॥1॥
गुज़र ना जाए दिन हँसी के,
फिर सबा बन के,
कभी मिलो तो हम से आ के,
नयी सुबह बन के,
छलक उठेंगे दिल के अरमां सिसकिया के॥2॥
सिले हुए लबों से मैं क्या,
इक़रार करूँ,
सुलगते जज़्बा लेके कब तक,
इंतज़ार करूँ,
ज़रा सा छू लो आ के दिल को तरस खा के॥3॥
नज़ारों में भी इन बहारों की,
एक वीरानी है,
ज़रा बढ़ाओ भी ये क़दम कि,
पास आनी है,
करो ना देर, क्या मिलेगा दिल जला के॥4॥
- सुहानता "शिकन"

