मैली चादर को धोया है.
हंसते-हंसते वह रोया है.
वही काटना सदा पड़ेगा,
जीवन में जो कुछ बोया है.
आज उसे अहसास हो गया,
क्या पाया है क्या खोया है.
नब्ज़ समय की पकड़ में आई,
शुष्क आंत को अब टोया है.
उसकी क्यों कर कमर झुकेगी,
जिसने भार नहीं ढोया है.
सपनों में चुसका लेने दो,
बच्चा रो कर के सोया है.
-डॉ. सुरेश उजाला
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लखनऊ (उ.प्र.)
साभारः रचनाकार
