Tuesday, April 7, 2020

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं ...ममता किरण

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं
ज़िंदगी के साथ चलता क्यों नहीं

बोझ सी लगने लगी है ज़िंदगी
ख़्वाब एक आँखों में पलता क्यों नहीं

कब तलक भागा फिरेगा ख़ुद से वो
साथ आख़िर अपने मिलता क्यों नहीं

गर बने रहना है सत्ता में अभी
गिरगिटों सा रंग बदलता क्यों नहीं

बातें ही करता मिसालों की बहुत
उन मिसालों में वो ढलता क्यों नहीं

ऐ ख़ुदा दुख हो गये जैसे पहाड़
तेरा दिल अब भी पिघलता क्यों नहीं

ओढ़ कर बैठा है क्यूँ खामोशियाँ
बन के लौ फिर से वो जलता क्यों नहीं

क्या हुई है कोई अनहोनी कहीं
दीप मेरे घर का जलता क्यों नहीं.
-ममता किरण

Monday, April 6, 2020

दरवाज़े की आंखें ...आरती चौबे मुदगल

दीवारों के कान होते हैं
एक पुरानी कहावत है
किंतु अब दरवाज़े देखने भी लगे हैं
उनके पास आंखें जो हो गई हैं

चलन बदल गया है
पहले नहीं लगी होती थी कुंडी
सिर्फ़ उढ़के होते थे दरवाज़े
कोई भी खोल के
घर के अंदर प्रवेश कर सकता था

फिर धीरे से कुंडी बंद होने लगी
खड़काने पर ही दरवाज़े खुलते

चीज़ें बदलीं
डोर बेल का ज़माना आया
साथ ही डोर 'आई '
और सी सी टी वी भी

बेल बजते ही
पूरा घर चौकन्ना हो जाता है
दरवाज़े की आंखें
और दीवारों के कान
आपस में तय करने लगते हैं
किसे अंदर आना है
किसे नहीं...

-आरती चौबे मुदगल

Sunday, April 5, 2020

सफ़ेद कुरता....नीलिमा शर्मा

अब तुम कही भी नही हो
कही भी नही
ना मेरी यादों में
न मेरी बातों में

अब मैं मसरूफ रहती हूँ
दाल के कंकड़ चुन'ने में
शर्ट के दाग धोने में
क्यारी में टमाटर बोने में

एक पल भी मेरा
कभी खाली नही होता
जो तुझे याद करूँ
या तुझे महसूस करू

मैंने छोड़ दिए
नावेल पढने
मैंने छोड़ दिए है
किस्से गढ़ने

अब मुझे याद रहता हैं बस
सुबह का अलार्म लगाना
मुंह अँधेरे उठ चाय बनाना
और सबके सो जाने पर
उनको चादर ओढ़ाना

आज तुमको यह कहने की
क्यों जरुरत आन पढ़ी हैं
सामने आज मेरी पुरानी
अलमारी खुली पड़ी हैं

किस्से दबे हुए हैं जिस में
कहानिया बिखरी सी
और उस पर मुह चिढ़ाता
तेरा उतारा सफ़ेद कुरता भी

नही नही !!अब कही भी नही हो
न मेरी यादो में न मेरी बातो में
फिर भी अक्सर मुझको सपने में
यह कुरता क्यों दिखाई देता हैं ......
- नीलिमा शर्मा


Saturday, April 4, 2020

सरगोशियों का मलाल था .. मृदुला प्रधान

पिछले पोस्ट पर कई लोगों ने इच्छा व्यक्त की .. 
वहाँ जिस कविता का ज़िक्र हुआ था 
उसे पढ़ने की .. तो प्रस्तुत है ..

कभी मुंतज़िर चश्में
ज़िगर हमराज़ था
कभी बेखबर कभी
पुरज़ुनू ये मिजाज़ था
कभी गुफ़्तगू के हज़ूम तो 
कभी खौफ़-ए-ज़द
कभी बेज़ुबां
कभी जीत की आमद में मैं
कभी हार से मैं पस्त था...

कभी शौख-ए-फ़ितरत का नशा
कभी शाम-ए-ज़श्न  
ख़ुमार था 
कभी था हवा का ग़ुबार तो
कभी हौसलों का पहाड़ था
कभी ज़ुल्मतों के शिक़स्त में 
ख़ामोशियों का शिकार था
कभी थी ख़लिश कभी रहमतें 
कभी हमसफ़र का क़रार था..

कभी चश्म-ए-तर की 
गिरफ़्त में
सरगोशियों का मलाल था
कभी लम्हा-ए-नायाब में
मैं  भर रहा परवाज़ था
कभी  था उसूलों से घिरा
मैं रिवायतों के अजाब में
कभी था मज़ा कभी बेमज़ा 
सूद-ओ-जिया के हिसाब में..

मैं था बुलंदी पर कभी 
छूकर ज़मीं जीता रहा
कभी ये रहा,कभी वो रहा 
और जिंदगी चलती रही .……
-मृदुला प्रधान
मूल रचना

Friday, April 3, 2020

आग ...वीरेन्दर भाटिया



आग
मनुष्य का
अविष्कार नहीं, मनुष्य से
पहले से है आग
आग 
खोज भी नहीं है मनुष्य की
खुद आग खोज रही थी
कोई सुरक्षित हाथ
जिसमे कल्याणकारी रहे आग

2
आग 
छिपकर आयी चकमक में
यही आग का दर्शन था
आग को जहां
नग्न किया गया
आग वहां विकराल हो गयी

3
आग
मनुष्यता को मिला 
सबसे नायाब तोहफा था
सभी तत्वों से सबसे ज्यादा तीव्रता थी 
आग में
आग ही ने समझाए
आग को झेलने..और
आग से खेलने के  हुनर

4
आग से खेलने की पराकाष्ठा में
इसी आग से
मनुष्य ने
मनुष्यता जला डाली

-वीरेंदर भाटिया

Thursday, April 2, 2020

दरख्तों ने कितने रंगों के घूंघट सजाए हैं ...राज्यश्री त्रिवेदी

कुछ अनजानी आहटें हैं,
सफ़र ही सफ़र समाया है जिनमें,
ऐसी ही कुछ राहें हैं..
हर कदम पर खनकती हैं बारिशें,
अब हरी-सी लगती हैं ख्वाहिशें,
नए से रंग नज़ारों में समाए हैं..
हर वक्त सुनाई देता है इक शोर,
जबकि तनहाई का नहीं ओर-छोर,
बारिशों ने कैसे नगमें सुनाए हैं..
दिखते भी नहीं फिज़ाओं के रंग,
घुल से गए जैसे, बादलों के संग,
चाल बदली-सी, गीली हवाएं हैं..
अंधियारों की चली है,
चांद से बादलों की खूब बनी है,
दरख्तों ने कितने रंगों के घूंघट सजाए हैं..

-राज्यश्री त्रिवेदी
इंदौर, मध्यप्रदेश 

Wednesday, April 1, 2020

अचानक उग आए थे अप्रैल में इतने सारे फूल ...घनश्याम कुमार 'देवांश'

सिर्फ़ तुम्हारी बदौलत
भर गया था अप्रैल
विराट उजाले से
हो रही थी बरसात
अप्रैल की एक ख़ूबसूरत सुबह में
चाँद के चेहरे पर नहीं थी थकावट
रातों के सिलसिले में
एक इन्द्रधनुष टँग गया था
अप्रैल की शाम में
एक सूखे दरख़्त की फुनगी में
मंदिर की घंटियाँ
गिरजे की कैंडल्स और
मस्जिद की अज़ान
घुल गई थी
अप्रैल की त्रिवेणी में...

सचमुच... सिर्फ़ तुम्हारी ही बदौलत
अचानक उग आए थे
अप्रैल में
इतने सारे फूल
पहली बार अच्छा लग रहा था
बनकर अप्रैल फूल...
-घनश्याम कुमार 'देवांश'

Tuesday, March 31, 2020

मन के पलाश ...निशा माथुर

एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम।

सुनो, तुम जरा मेरे साथ तो आओ,
कुछ मौसमों को भी बुला लाओ।
मैं ...... मैं बादल ले आऊं,
और इस भीगी-भीगी शाम में,
गुलमोहरी मधुमास चुराऊं।  

सुनो, तुम आज कुछ बिगड़ो, कुछ बनो, 
और आंधियां भी संग ले आओ।
मैं........मैं चिराग बन जाऊं,
और इस आंधी संग जल-जल के,
अपना विश्वास आजमाऊं।

सुनो, तुम कुछ पल पहाड़ बन जाओ, 
और सन्नाटे से लहरा जाओ।
मैं........मैं धुंधला के सांये-सी मचलूं, 
सन्नाटे में तुम्हारा नाम पुकारूं।

सुनो, तुम आज वक्त बन जाओ,
और मेरे लिए थोड़े ठहर जाओ।
मैं............मैं फिर स्मृतियां छू लूं,
दर्पण में अनुरागी छवियां निहार लूं।

सुनो, तुम आज मेरा आंगन बन जाओ,
और मेरा सपना बनकर बिखर जाओ।
मैं...मैं मन के पलाश-सी खिल जाऊं, 
अनुरक्त पंखुरी-सी झर-झर जाऊं।

सुनो, फिर एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम ।
मैं........तुम्हारी आंखों के दो मोती चुराऊं
और उसमें अपना चेहरा दर्ज कराऊं।

-निशा माथुर

Monday, March 30, 2020

अच्छा हुआ ....डॉ. अख़्तर खत्री

आख़िर में हम मिल गए, अच्छा हुआ,
बाकी सब हम भूल गए, अच्छा हुआ ।

मैं मुझ में नहीं हूं, तुम ख़ुद में नहीं हो,
दूजे की रूह में घुल गए, अच्छा हुआ ।

मुराज़ई हुई सी थी ज़िंदगियां अपनी,
दिल से दिल तक खिल गए, अच्छा हुआ ।

ख़ुदा ने लिखा था और हो गया, देखो,
नसीब अपने खुल गए, अच्छा हुआ ।

आ गए तुम 'अख़्तर' की इन बाहों में,
लौट कर के ना फ़िर गए, अच्छा हुआ ।
-डॉ. अख़्तर खत्री

Sunday, March 29, 2020

बेटी- टुकड़ा है मेरे दिल का... सुधा देवरानी

मुद्दतों बाद उसका भी वक्त आया
जब वह भी कुछ कह पायी
सहमत हो पति ने आज सुना
वह भी दिल हल्का कर पायी

आँखों में नया विश्वास जगा
आवाज में क्रंदन था उभरा
कुचली सी भावना आज उठी
सोयी सी रुह ज्यों जाग उठी

हाँ!बेटी जनी थी बस मैंने
तुम तो बेटे ही पर मरते थे
बेटी बोझ, परायी थी तुमको
उससे नजरें यूँ फेरते थे...

तिरस्कार किया जिसका तुमने
उसने देवतुल्य सम्मान दिया
निज प्रेम समर्पण और निष्ठा से
दो-दो कुल का उत्थान किया

आज बुढापे में बेटे ने
अपने ही घर से किया बेघर
बेटी जो परायी थी तुमको
बिठाया उसने सर-आँखोंं पर

आज हमारी सेवा में
वह खुद को वारे जाती है
सीने से लगा लो अब तो उसे
ये प्रेम उसी की थाती है.......

सच कहती हो,खूब कहो !
शर्मिंदा हूँ निज कर्मों से......
वंश वृद्धि और पुत्र मोह में
उलझा था मिथ्या भ्रमोंं से

फिर भी धन्य हुआ जीवन मेरा
जो पिता हूँ मैं भी बेटी का
बेटी नहीं बोझ न पराया धन
वह तो टुकड़ा अपने दिल का !!

Saturday, March 28, 2020

हिन्दी ब्लॉगरों के लिए सुनहरा अवसर

हिन्दी ब्लॉगरों के लिए 
ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2020 के लिए नामांकन शुरू


यदि आप हिन्दी ब्लॉगर है तो यह सूचना आपके लिए ही है। आप ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2020 के लिए प्रतिभाग कर सकते है। ज्ञात रहे पिछले वर्ष 2019 का ब्लॉगर ऑफ द ईयर का अवार्ड राजस्थान के डा. चन्द्रेश छतलानी जी को मिला था, जो लघुकथाओं पर आधारित ब्लॉग का संचालन करते है और उप विजेता दिल्ली के मुकेश सिन्हा जी रहे, जो कविताओं पर आधारित ब्लॉग का संचालन करते है।
हिन्दी ब्लॉगिंग और ब्लॉगरों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से iBlogger द्वारा वर्ष 2019 में ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2020 शुरू किया गया था, जिसे ब्लॉगरों ने सराहा और बढ़-चढ़कर प्रतिभाग भी किया।
यह कार्यक्रम सिर्फ हिन्दी के ब्लॉगरों के लिए ही है, यदि आप भी हिन्दी ब्लॉग का संचालन कर रहे है तो आपको इस प्रतियोगिता में जरूर प्रतिभाग करना चाहिए।

ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2020 के लिए आवेदन कैसे करें
सर्वप्रथम ब्लॉगर प्रतिभाग करने के लिए ब्लॉगर https://www.iblogger.prachidigital.in/blogger-of-the-year/ 
पर जाकर सभी नियम एवं शर्तों का अवलोकन करें। उसके बाद ब्लॉगर ऑफ द ईयर के लिए iBlogger ब्लॉग पर आवेदन करें। उसके बाद ब्लॉगर को एक पोस्ट iBlogger पर प्रकाशित करनी होगी, जिसमें  प्रतिभागी को अपनी ब्लॉग यात्रा व अपने ब्लॉग से संबधित जानकारी देनी होगी।
इसके अलावा पोस्ट में प्रतिभागी ब्लॉगर को एक अन्य ब्लॉगर (ब्लॉग पते के साथ) को इस Award के लिए नामित करना है जो कि अनिवार्य है। इसमें यह भी बताना आवश्यक है कि आपने उन्हे क्यों नामित किया है या उन्हे यह Award क्यों मिलना चाहिए।
ध्यान दें, यदि नामित होने वाले ब्लॉगर को इस Contest का प्रतिभागी होना अनिवार्य है, इसलिए यदि आपके द्वारा नामित किया गया ब्लॉगर प्रतिभागी नहीं है तो वह ब्लॉगर प्रतिभाग करने के लिए आवेदन कर सकता है।
वहीं, यदि आपके द्वारा नामांकित ब्लॉगर प्रतिभागी नहीं है, तो आप उसे नामांकन की सूचना देकर प्रतिभाग करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते है। आपके द्वारा नामित ब्लॉगर प्रतिभागी को एक प्वाइंट मिल जायेगा, जो नामित प्रतिभागी के लिए विजेता बनने में सहयोगी होगा। यदि आपको दूसरे ब्लॉगर ने आपको नामांकित किया है, तो आपको अपनी पोस्ट में उसका उल्लेख करना आवश्यक है।

प्रतिभागियों को पुरस्कार / सम्मान

विजेता प्रतिभागी को iBlogger की ओर से Blogger of the Year 2020 की उपाधि प्रदान की जायेगी। iBlogger की ओर से विजेता को Certificate एवं Trophy कोरियर द्वारा प्रेषित किया जायेगा।
Runner Up को iBlogger की ओर से Blogger of the Year 2020 के Runner Up की उपाधि प्रदान की जायेगी। साथ ही Runner Up को भी Certificate जो कि iBlogger की ओर से कोरियर द्वारा प्रेषित किया जायेगा।
इसके अलावा विजेता एवं उप विजेता के अलावा सर्वश्रेष्ठ 10 प्रतिभागियों को iBlogger की ओर से Top 10 - Blogger of Year 2020 की उपाधि प्रदान की जायेगी। iBlogger ओर से इन 10 प्रतिभागियों को Printable Digital Certificate प्रदान किए जायेंगे।
ध्यान दें कि ब्लॉगर ऑफ द ईयर में आवेदन करने की अंतिम तिथि 20 जून 2020 है।

कैसे चयनित किया जायेगा ब्लॉगर ऑफ द ईयर
Blogger of the Year 2020 की उपाधि ब्लॉग की गुणवत्ता, पाठकों के लिए ब्लॉग का महत्व, ब्लॉगर को मिले नामांकन, ब्लॉगर द्वारा लिखी गई पोस्ट के अवलोकन के पश्चात निर्णायक टीम द्वारा दिया जायेगा। 

यदि आप पोस्ट में अपने अनुसार कोई बदलाव करना चाहते हैं या संबधित कोई अन्य जानकारी चाहते है तो दिये गये लिंक पर जाकर अवलोकन कर सकते है-

https://www.iblogger.prachidigital.in/blogger-of-the-year/ 

Friday, March 27, 2020

आँगन...आशा लता सक्सेना

बदले समय के  साथ में  
बढ़ती जनसंख्या के भार से
बड़े मकानों का चलन न रहा  
रहनसहन का ढंग बदला |
पहले बड़े मकान होते थे
उनमें आँगन होते थे अवश्य
दोपहर में चारपाई डाल महिलाएं
 बुनाई सिलाई करतीं थीं
 धूप का आनंद लेतीं थीं |
अचार चटनी मुरब्बे में धूप लगातीं
गर्मीं में ऊनी कपडे सुखाना 
सम्हाल कर रखना नहीं भूलतीं थीं
आँगन  ही  थी  कर्मस्थली उनकी |
बच्चों के  खेल का मैदान भी वही था  
 रात में चन्दा मांमा को देख कर  खुश होने  को कैसे भूलें
तारों  के संग बातें करना
 मां से  कहानी सुनना  न  छूटा कभी |
जब कोई तारा टूटता
 मांगी   मुराद पूरी करता
हाथ जोड़    कभी  मन की  मुराद  माँगते
या चाँद पकड़ने के लिए बहुत बेचैन रहते  |
मां थाली में जल भर कर 
चन्द्रमा के अक्स को दिखा कर हमें बहलातीं 
फिर थपकी दे कर हमें सुलातीं | 
आज  शहरों के बच्चे रात में
बाहर निकलने से भयाक्रांत होते है
शायद उन्हें यही भय रहता है
 कहीं चाँद उन पर ना  गिर जाए |
कारण समझने में देर न लगी
बढ़ती आबादी ने आँगन सुख से दूर किया है
छोटे मकानों में आँगन की सुविधा कहाँ  
  यादें भर शेष रह गईं है घर के बीच आँगन की !!

लेखिका - आशा लता सक्सेना 

Thursday, March 26, 2020

अजनबी हूँ इस अजनबी शहर में...अजय कुमार सिंह

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में
तलाश अपनेपन कि यहाँ  जारी है

होश को होश नहीं मय के आगोश में
ख़तम न होने वाली ये बेकरारी है

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में …

हर रात सी लेता हूँ मैं चाक दिल के
सुबह फिर चोट खाने की  तैयारी है

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में …

मेरा वजूद तो  बंजारों सा है
फिर किसी और मकाम की बारी है

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में …

रखना पड़ता है निवालों का हिसाब
इस मुल्क में इसकदर बेरोजगारी है

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में …

इस कदर हैं बदहाल है मेरा नसीब
कमी पैसों कि मेरी खाईश पे भारी है

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में …

अजनबी  हूँ  इस अजनबी शहर में
तलाश अपनेपन कि यहाँ  जारी है

Wednesday, March 25, 2020

तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुव...दिगंबर नासवा

धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे


बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा

कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे


नाते रिश्तेदार सभी उग आए हैं

लोगों का कहना है हम मशहूर हुवे


घुटनों से लाचार हुवे उस दिन जो हम

किस्से फैल गये की हम मगरूर हुवे


गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते

जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे


पहले उनकी यादें में जी लेते थे

यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे !


लेखक - दिगंबर नासवा 

Tuesday, March 24, 2020

वक्त चुराना होगा.....अनीता जी

वक्त चुराना होगा !

काल की तरनि बहती जाती
तकता तट पर कोई प्यासा,
सावन झरता झर-झर नभ से
मरुथल फिर भी रहे उदासा !

झुक कर अंजुलि भर अमृत का भोग लगाना होगा
वक्त चुराना होगा !

समय गुजर ना जाए यूँ ही
अंकुर अभी नहीं फूटा है,
सिंचित कर लें मन माटी को
अंतर्मन में बीज पड़ा है !

कितने रैन-बसेरे छूटे यहाँ से जाना होगा
वक्त चुराना होगा !

कोई हाथ बढ़ाता प्रतिपल
जाने कहाँ भटकता है मन,
मदहोशी में डुबा रहा है
मृग मरीचिका का आकर्षण !

उस अनन्त में उड़ना है तो सांत भुलाना होगा
वक्त चुराना होगा !

जग की नैया सदा डोलती
हिचकोले भी कभी लुभाते,
जिन रस्तों से तोबा की थी
लौट-लौट कर उन पर आते !

नई राह चुनकर फिर उस पर कदम बढ़ाना होगा
वक्त चुराना होगा !

Sunday, March 22, 2020

हालात .....नादिर खान

नियम/अनुशासन
सब आम लोगों के लिए है
जो खास हैं
इन सब से परे हैं
उन पर लागू  नहीं होते
ये सब
ख़ास लोग तो तय करते हैं
कब /कौन/ कितना बोलेगा
कौन सा मोहरा
कब / कितने घर चलेगा
यहाँ शह भी वे ही देते हैं 
और मात भी
आम लोग मनोरंजन करते हैं 
आम लोगों का रेमोट
ख़ास लोगों के हाथों में होता है 
वे नचाते हैं
आम लोग नाचते हैं.....
मगर हालात
हमेशा एक जैसे नहीं होते
और न ही बदलने में वक़्त लगता
बस !! एक हल्का सा झटका
और खिसकने लगती है
पैरों के नीचे से ज़मीन
फिर जैसे मुट्ठी से रेत
जितना ज़ोर लगाओ
उतनी ही तेजी से फिसलते हैं हालात.....

Saturday, March 21, 2020

बीमार सा लगता है मेरा शहर....शुभा मेहता

आज बीमार सा लगता है 
मेरा ये शहर 
कभी गुलजा़र हुआ करता था 
हर तरफ हुआ करती थी 
ताजा हवा ...
जिसके झोंके से 
मिलता था सुकून .
पेड़ों की शाखों पर 
गाते थे पक्षी ..
आज देखो तो 
बस धुआँ ही धुआँ 
खाँसते लोग ...
प्रदूषण के मारे 
बेहाल ......!!
      
लेखिका - शुभा मेहता 

Friday, March 20, 2020

आज विश्व गौरैया दिवस पर ...इ. गणेश बागी

20 मार्च 
"विश्व गौरैया दिवस" 
पर विशेष : 
"गौरैया" 
याद आ रही है...
करीने से बँधी चोटियाँ
आँगन में खेलती बेटियाँ
गुड्डा-गुड़िया, गोटी-चिप्पी,
आइ-स्पाइस, छुआ-छुई
चंदा-चूड़ी, लँगड़ी-बिच्छी

याद आ रहा है...
गाँव का पुराना घर
घर के सामने खड़ा पीपल का घना पेड़
जो रोक लेता लू के थपेड़ो को
जैसे सहन पर बैठे हों दादाजी
रोक लेते बुरी बलाओं को

याद आ रहा है...
सुबह-सुबह तुलसी के चौरा पर
दादी माँ का जल चढ़ाना
फिर कुछ लोटा जल
आँगन के कोने में पड़े
मिट्टी के नाद में भर देना

याद आ रहा है...
भात बनाने से पहले माँ का
एक मुट्ठी कच्चे चावल
आँगन में बिखेर देना.. 
फिर...
न जाने कहाँ से आ जाता
गौरैयों का झुण्ड
चुग लेते वे चावल के दाने
जल भरे नाद में
जल-क्रीडा करते

अब तो शहर में छोटा सा घर
न वो घना पीपल का पेड़
और ना ही दादा-दादी
ससुराल चली गयीं बेटियाँ
नहीं आता वो गौरैयों का झुण्ड

आज माँ ने फिर से बिखेर दिया है 
बालकोनी में
कच्चे चावल के कुछ दाने
और रख दिया है पानी भरा पात्र

आहा ! यह क्या...
आ गयीं कुछ गौरैया
जैसे बड़े दिन बाद आयी हों
पीहर में बेटियाँ....
-गणेश बाग़ी

Thursday, March 19, 2020

लडकियों दुनिया बदल रही हैं.....नीलिमा शर्मा

लडकियों
दुनिया बदल रही हैं
किस्मत चमक रही हैं
अब घर बेठने से कम नही चलेगा
उठो निकलो काम पर अपने काम से

रास्ता अँधेरा होगा
दूर पर कही सवेरा होगा
रोशन करनी हैं तुम्हे दुनिया
उठो चलो कदम बढाओ शान से

एक अकेली मत चलो
आपस में तुम मत लड़ो
छा सकती हो तुम दुनिया पर
जब चला दो झुण्ड में तीर कमान से

कारवां होने लगा छोटा
नर नारी की जातका
कन्या को भी जन्मदो
और समूह बनाओ उनका तुम सम्मान से

एकता मैं बल हैं
बल ही बलवान हैं
नारी ही नारी की दुश्मन
झूठ कर दो इस बयां को अपने ज्ञान से .....

- नीलिमा शर्मा