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Sunday, May 19, 2019

एक प्रेमगीत-सात रंग का छाता बनकर....जयकृष्ण राय तुषार

सात रंग का
छाता बनकर
कड़ी धूप में तुम आती हो ।
अलिखित
मौसम के गीतों को
मीरा जैसा तुम गाती हो ।

जब सारा 
संसार हमारा साथ
छोड़कर चल देता है,
तपते हुए
माथ पर तेरा
हाथ बहुत सम्बल देता है,
आँगन में
चाँदनी रात हो,
चौरे पर दीया-बाती हो ।

कभी रूठना
और मनाना
इसमें भी श्रृंगार भरा है,
बादल-बिजली के
गर्जन से
अमलतास वन हरा-भरा है,
बार -बार
पढ़ता सारा घर
तुम तो एक सगुन पाती हो ।
-जयकृष्ण राय तुषार

Thursday, December 6, 2018

शहनाई गूँज रही...जयकृष्ण राय तुषार

जाने क्या होता
इन प्यार भरी बातों में?
रिश्ते बन जाते हैं
चन्द मुलाकातों में ।

मौसम कोई हो
हम अनायास गाते हैं,
बंजारे होठ मधुर
बाँसुरी बजाते हैं,
मेंहदी के रंग उभर आते हैं
हाथों में ।

खुली-खुली आँखों में
स्वप्न सगुन होते हैं,
हम मन के क्षितिजों पर
इन्द्रधनुष बोते हैं,
चन्द्रमा उगाते हम
अँधियारी रातों में ।

सुधियों में हम तेरी
भूख प्यास भूले हैं
पतझर में भी जाने
क्यो पलाश फूले हैं
शहनाई गूँज रही
मंडपों कनातों में।
-जयकृष्ण राय तुषार