Monday, October 23, 2017

याद....शबनम शर्मा


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बरसों बाद
पीहर की दहलीज़,
आँख भर आई, 
सोच 
बेसुध सीढ़ियाँ चढ़ना 
पापा के गले लग 
रो देना, 
हरेक का उनके 
आदेश पर गिर्द घूमना, 
खूँटी पर टंगा काला कोट, 
मेज़ पर चश्मा, ऐश-ट्रे,
घर के हर कोने में 
रौबीली गूँज।
आज घूरती आँखें, 
रिश्तों को निभाती आवाज़ें, 
समझती बेटी को बोझ, 
हर तरफ़ परायापन
एक आवाज़ बुलाती, 
जोड़ती उस पराये 
दर से ‘पापा बुआ 
आई हैं।’

-शबनम शर्मा

Sunday, October 22, 2017

संतुष्टि छीन ली......निधि सक्सेना

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हमने उन्हें महत्वाकांक्षाएं तो दीं
परंतु धैर्य छीन लिया..
उनकी आंखों में ढेरों सपने तो बोये
पर नींदे छीन लीं..
हमने उन्हें हर परीक्षा के लिए तैयार किया
परंतु परीक्षा के परे की हर खुशी छीन ली..
हमने किताबी ज्ञान खूब उपलब्ध कराया
परंतु संवेदनायें छीन लीं..
हमने उन्हें प्रतिद्वंदी बनाया
पर संतुष्टि छीन ली..
हमने उन्हें तर्क करना सिखाया
परंतु आस्थायें छीन लीं..
हमने उन्हें बार बार चेताया
और विश्वास छीना..
हमने उन्हें उड़ना सिखाया
और पैरों के नीचे से जमीन छीन ली..
सच !! 
हम सा लुटेरा अभिभावक पहले न हुआ होगा..
~निधि सक्सेना

Saturday, October 21, 2017

ये दिये रात की ज़रूरत थे....बशीर बद्र

हर जनम में उसी की चाहत थे;
हम किसी और की अमानत थे;

उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई;
हम ग़ज़ल की कोई अलामत थे;

तेरी चादर में तन समेट लिया;
हम कहाँ के दराज़क़ामत थे;

जैसे जंगल में आग लग जाये;
हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे;

पास रहकर भी दूर-दूर रहे;
हम नये दौर की मोहब्बत थे;

इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया;
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना;
ये दिये रात की ज़रूरत थे।
-बशीर बद्र

Friday, October 20, 2017

हमेशा हाथ ही मलता रहा......अनिरुद्ध सिन्हा

धूप को सर पर लिये  चलता रहा
मैं ज़मीं के साथ  ही जलता रहा

नफ़रतों के  जहर पीकर  दोस्तो
प्यार के साँचे में मैं  ढलता रहा

टूटकर इक दिन बिखर जाऊँगा मैं
मेरे अन्दर  खौफ़ ये  पलता रहा

लौट आया आसमां को  छूके  मैं
जलनेवाला उम्र- भर जलता  रहा

लोग अपनी मंज़िलों को  हो लिये
वो  हमेशा  हाथ  ही मलता रहा

-अनिरुद्ध सिन्हा
गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार )811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com
Mobile-09430450098  

Thursday, October 19, 2017

चंद हाईकू...नरेंद्र श्रीवास्तव


शिकारी हारा
जाल सहित पक्षी
नभ में उड़े।
*
दर्द के गीत
प्रीत लिखती रही
पत्थर देव।
*
मौन आकांक्षा
मन की बात जाने
कोई अपना।
*
शब्द व्यथित
अपरिचित जन
भाषा अंजान।
*
नदी से रेत
पर्वत से खनिज
लुटती धरा।

-नरेंद्र श्रीवास्तव


Wednesday, October 18, 2017

चंद श़ेर.....जनाब खलीलुर्रहमान आज़मी

तेरे न हो सके तो किसी के न हो सके 
ये कारोबारे-शौक़ मुक़र्रर न हो सका 
*** 
यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं 
ज़िन्दगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैंने 
*** 
क्या जाने दिल में कब से है अपने बसा हुआ 
ऐसा नगर कि जिसमें कोई रास्ता न जाए
*** 
हमने खुद अपने आप ज़माने की सैर की 
हमने क़ुबूल की न किसी रहनुमा की शर्त 
*** 
कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पाँव चूमूंगा 
ज़माना लाख करे आके संगसार मुझे 
*** 
ज़ंज़ीर आंसुओं की कहाँ टूट कर गिरी 
वो इन्तहाए-ग़म का सुकूँ कौन ले गया
*** 
उम्र भर मसरूफ हैं मरने की तैय्यारी में लोग 
एक दिन के जश्न का होता है कितना एहतमाम

-जनाब खलीलुर्रहमान आज़मी

Tuesday, October 17, 2017

तू मेरी न सुन मगर कहूँगा......निजाम रामपुरी

कहने से न मनअ' कर कहूँगा 
तू मेरी न सुन मगर कहूँगा 

तुम आप ही आए यूँ ही सच है 
नाले को न बे-असर कहूँगा 

गर कुछ भी सुनेंगे वो शब-ए-वस्ल 
क्या क्या न में ता-सहर कहूँगा 

कहते हैं जो चाहते हैं दुश्मन 
मैं और तुम्हें फ़ित्ना-गर कहूँगा 

कहते तो ये हो कि तू है अच्छा 
मानोगे बुरा अगर कहूँगा 

यूँ देख के मुझ को मुस्कुराना 
फिर तुम को मैं बे-ख़बर कहूँगा 

इक बात लिखी है क्या ही मैं ने 
तुझ से तो न नामा-बर कहूँगा 

कब तुम तो कहोगे मुझ से पूछो 
मैं बाइस-ए-दर्द-ए-सर कहूँगा 

तुझ से ही छुपाऊँगा ग़म अपना 
तुझ से ही कहूँगा गर कहूँगा 

मालूम है मुझ को जो कहोगे 
मैं तुम से भी पेश-तर कहूँगा 

हैरत से कुछ उन से कह सकूँगा 
भूलूँगा का इधर उधर कहूँगा 

कुछ दर्द-ए-जिगर का होगा बाइस 
क्यूँ तुझ से मैं चारा-गर कहूँगा 

अब हाल-ए-'निज़ाम' कुछ न पूछो 
ग़म होगा तुम्हें भी गर कहूँगा  


Monday, October 16, 2017

माँ चुप रह जाती है...............अमित जैन 'मौलिक'

मेरे हालात को मुझसे, पहले समझ जाती है
माँ अब कुछ नहीं कहती, चुप रह जाती है।

तब भी मुस्कराती थी, अब भी मुस्कराती है
माँ चुप रहकर भी, बहुत कुछ कह जाती है।

एक वक्त था जब सब, माँ ही तय करती थी
अब क्या तय करना है, तय नहीं कर पाती है।

तसल्लियों की खूंटी पर, टांग देती है ज़रूरतें
मेरी मुश्किलात माँ, पहले ही समझ जाती है।

जिसे दुश्वारियों के, तूफ़ान भी ना हिला पाये हों
वो अपने बच्चे के, दो आँसुओं में बह जाती है।

मेरी माँ कभी मेरी, जेबें खाली नहीं छोड़ती 
पहले पैसे भरती थी, अब दुआयें भर जाती है।

Sunday, October 15, 2017

कवि के हाथों में लाठी!...परितोष कुमार ‘पीयूष’


वो बात किया करते हैं
अक्सर ही स्त्री स्वतंत्रता की
बुद्धिजीवियों की जमात में 
उनका दैनिक उठना बैठना 
चाय सिगरेट हुआ करता है

साहित्यिक राजनीतिक मंचों से
स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में
धाराप्रवाह कविता पाठ किया करते हैं
अखबारी स्तंभों में भी 
यदा कदा नजर आ ही जाते हैं
नवलेखन, साहित्य अकादमी, 
साहित्य गौरव, साहित्य शिरोमणि, कविताश्री
और पता नहीं क्या-क्या इकट्ठा कर रखा है
उसने अपने अंतहीन परिचय में

सड़क से गुजरते हुए
एकदिन अचानक देखा मैंने
उनके घर के आगे 
भीड़! शोर शराबा! 
पुलिस! पत्रकार!
कवि के हाथों में लाठी!
मुँह से गिरती धाराप्रवाह गालियाँ!
थोड़े ही फासले पर फटे वस्त्रों में खड़ी
रोती-कपसती एक सुंदर युवती
और ठीक उसकी बगल में 
अपाहिज सा लड़खड़ाता एक युवक

इसी बीच 
भीड़ की कानाफूसी ने मुझे बताया
पिछवाड़े की मंदिर
उनकी बेटी ने दूसरी जाति में
विवाह कर लिया है

मैं अवाक् सोचता रहा
कि आखिर किनके भरोसे 
बचा रहेगा हमारा समाज
क्या सच में कभी
स्त्रियों को मिल पायेगी
उनके हिस्से की स्वतंत्रता
-परितोष कुमार ‘पीयूष’ 

Saturday, October 14, 2017

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है......मनोज सिंह”मन”

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है,
ख्बाबों की बस्ती है, एक दिन उजड़ जाना है,

टूटी हुई कश्ती है, दरिया पे ठिकाना है,
उम्मीदों का सहारा है,इक दिन चले जाना है,

बदला हुआ वक़्त है, ज़ालिम ज़माना है,
यंहा मतलबी रिश्ते है, फिर भी निभाना है,

वो नाकाम मोहब्बत थी, अंजाम बताना है,
इन अश्कों को छुपाना है, गज़ले भी सुनाना है,

इस महफ़िल में सबको, अपना ही माना है,
“मन” कैसा है दोस्तों, ये आपको ही बताना है,


Friday, October 13, 2017

मुक्तक.............नरेंद्र श्रीवास्तव


क़िस्मत
~~~~~
किसान के दिन
परेशानियों ने लादे
आसमान से
ओले मिले
नेताओं से वादे।
....

प्यासे
~~~~
वे
अच्छे अच्छों को
पानी पिलाते हैं
बाक़ी
प्यासे रह जाते हैं
*
प्रशंसक
~~~~~
एक नेता ने
कमाल कर दिखाया
उन्होंने
खिलौने में 
प्लास्टिक का
कुत्ता खरीदा
प्रशंसक दौड़कर
प्लास्टिक के
बिस्किट ले आया।
*
चमत्कार
~~~~~~
उनका
कुरता पायजामा
चमत्कार
दिखलाता है
काम बनाता है।
*
गड्ढे
~~~
सड़क के गड्ढे
उनके
बड़े काम आते हैं
जेब भर जाते हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव

Thursday, October 12, 2017

तेरी ज़रूरत ज्यादा है..........अमित जैन 'मौलिक'


रोमांटिक ग़ज़ल । लव ग़ज़ल । ग़ज़ल । Gazal । Best love gazal
मेरी उजरत कम, तेरी ज़रूरत ज्यादा है
ऐ ज़िंदगी कुछ तो बता, तेरा क्या इरादा है।

दांव पर ईमान लगाकर, तरक़्क़ी कर लेना
आज के दौर का, फ़लसफ़ा सीधा सादा है।

हड़बड़ी में दिख रहा, ख्वाहिशों का समंदर
लहरों में उफान है, आसमां पे चाँद आधा है।

ऐ जम्हूरियत तू भी, अब पहले जैसी नहीं रही
आजकल मुल्क में काम कम, शोर ज्यादा है।

बहुत हुई बारूदों की ज़िद, ये तमंचों की होड़ 
ख़ुदा ख़ैर करे, अभी क्या कम खून ख़राबा है।

नूर की ख़ातिर सितारे को, इतना ना निचोड़ो
सीधा चाँद को थामो, ये तो उसका एक प्यादा है।

Wednesday, October 11, 2017

क्या है मुझ में............नौबहार 'साबिर'

बूंदी पानी की हूं थोड़ी-सी हवा है मुझ में
इस बिज़ाअत पे भी क्या तुर्फ़ां इना है मुझ में

ये जो इक हश्र शबो-रोज़ बपा है मुझ में
हो न हो और भी कुछ मेरे सिवा है मुझ में

सफ़्हे-दहर पे इक राज़ की तहरीर हूं मैं
हर कोई पढ़ नहीं सकता जे लिखा है मुझ में

कभी शबनम की लताफ़त कभा शो'ले की लपक
लम्हा-लम्हा ये बदलता हुआ क्या है मुझ में

शहर का शहर हो जब अर्सए-मशहर की तरह
कौन सुनता है जो कुहराम मचा है मुझ में

वक्त ने कर दिया 'साबिर' मुझे सहरा-ब-किनार
इक ज़माने में समुंदर भी बहा हो मुझ में
- नौबहार 'साबिर'
शब्दार्थः
बिज़ाअत -पूंजी, तुर्फ़ां -विचित्र,  इना -अहं, हश्र -प्रलय, 
शबो-रोज़ -रात-दिन, बपा -मचा हुआ, सफ़्हे-दहर -संसार रूपी पन्ने, तहरीर -लेख, लताफ़त -कोमलता, अर्सए-मशहर -प्रलय क्षेत्र, 
सहरा-ब-किनार - मरुस्थल के अंक में 

Tuesday, October 10, 2017

तीन लघु नज़्म....हुमैरा राहत


 तेरा नाम
 बारिशों के मौसम में 
 छत पे' बैठ के तन्हा 
 नन्ही नन्ही बूंदों से 
 तेरा नाम लिखती हूँ 

 काश 
मेरे मालिक 
बहुत रहमो-करम 
मुझ पर किये तूने 
मैं तेरा शुक्र अदा करते नहीं थकती 
मगर, बस एक छोटी सी शिकायत है
कि मेरी ज़िन्दगी में 
इतने सारे 'काश' 
क्यों रक्खे 

सवाल 
मुहब्बत आशना लम्हे (प्रेम पूर्ण क्षण ) 
छिपाये इक अजब सा कर्ब (वेदना ) 
लहज़े में मुझी से पूछते हैं 
ये अगर हर ख़्वाब की किस्मत में 
मर जाना ही लिखा है 
तो आँखें देखती क्यों हैं 
-हुमैरा राहत

Monday, October 9, 2017

रिहा होने से डरता है............राजेश रेड्डी

यहां हर शख़्स हर पल हादिसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है

मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

न बस में ज़िन्दगी इसके न क़ाबू मौत पर इसका
मगर इन्सान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है

अज़ब ये ज़िन्दगी की क़ैद है, दुनिया का हर इन्सां
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है
- राजेश रेड्डी

Sunday, October 8, 2017

वही है दोस्ती हमारी.....विकास शर्मा "दक्ष"

ये नहीं कि दिल की ख़लिश पिघल गई।
रोने से तबियत ज़रूर थोड़ी संभल गई।। 

वही मैं, वही तुम, वही है दोस्ती हमारी,
फ़ासले से कैफ़ियत ज़रूर थोड़ी बदल गई।

पहले से जानते थे कि ना आओगे मगर,
बहाने से तबियत ज़रूर थोड़ी बहल गई।

उन्हें झूठ कहने का कोई इरादा तो ना था,
जुबां से हक़ीक़त ज़रूर थोड़ी फिसल गई।

दीदार-ए-यार की आरज़ू में बेख़ुद ना थे ,
उम्मीद से हसरत ज़रूर थोड़ी मचल गई।

खुशमिजाज़ रहे दौर-ए-आज़माइश में भी,
मुस्कराने से मुसीबत ज़रूर थोड़ी टल गई।

'दक्ष' को अब भी है अपने दोस्तों पे ऐतबार,
ज़माने से शराफ़त ज़रूर थोड़ी निकल गई।
-विकास शर्मा "दक्ष"

Saturday, October 7, 2017

प्यार का मतलब .....चंचलिका शर्मा



तुम कहते हो 
मैं जिद्दी हूँ 
और थोड़ी सी 
हूँ मनचली ... 
हाँ , मैं हूँ 
स्वीकार है मुझे 
मैं जिद्दी हूँ 
थोड़ी सी मनचली भी ........ 
जब भी माँगा , 
जो कुछ भी माँगा 
सब कुछ प्यार से 
दिया तुमने ...... 
चांद , सितारे गर 
माँग भी लेती 
शायद लेकर आते 
जी जान लगाकर भी ......... 
इतना प्यार 
क्यों लुटाते हो 
प्यार का मतलब 
क्या जानते भी हो ?.. 
प्यार आवारगी नहीं 
न सिर्फ़ है दीवानगी 
प्यार बंदगी भी है 
और है इबादत भी ......... 
चलो न , आज 
अभी , इसी वक्त 
हम , तुम कर लेते 
हैं एक वादा .... 
गर कभी साथ छूटे तो 
बनकर रहना कृष्ण मेरे 
राधा बन सताऊंगी नहीं 
बन सकती हूँ जोगन मीरा भी ....
-चंचलिका शर्मा

Friday, October 6, 2017

आतुरता......अमित जैन 'मौलिक'


आतुरता का
व्याकुलता की ओर
यह प्रवाह
आह!!
गुमान ही ना था
कोई अनुमान ही ना था।
लज़्ज़त के गगन से
टप्प टप्प बूँद गिरती रही
हृदय के रजत कटोरे में
चुपके से, लबालब 
चांदनी भरती रही।
जब तंद्रा टूटी 
तो देखा
विदीर्ण हो गई
किन्तु-परंतु की रेखा
जब होश आया तो देखा
पीयूष से भर गया घट
लहक उठा आलम
ख़यालों में था मन
अधखुले नयनों के
बंद ही न होते पट।
क्या छुआ
जो यूँ हुआ
ये वज़ूद तो
तने की तरह तना था
बेपरवाह लापरवाह
स्वयं में मुग्ध।
घट का पीयूष पिया
तो समझा 
अब तक क्या जिया।
खुरदुरेपन में फूटे 
नवीन अंकुर
निकल आईं शाखायें
अब मैं हरा भरा हूँ
हाँ एक जगह ही खड़ा हूँ,
लेकिन तुम थोड़ा और 
उतंग करो अपना उफान
मैं छू लूंगा तुम्हारे तरंगित
अस्तित्व को, 
झुक कर-झुकाकर 
अपनी शाखायें,
हो जाऊँगा तरबतर।
उम्मीदें बढ गईं हैं
कि अब जी लूंगा
देर सवेर ही सही
मैं अमृत पी लूंगा।
- अमित जैन 'मौलिक'

Thursday, October 5, 2017

अपने रूदन और क्रदन से....रश्मि वर्मा

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सामर्थ्य नहीं अब शब्दों में
कहना कुछ भी है व्यर्थ तुम्हें।
अधरों के स्वर हो गए कंपित, 
अब रुँध चले हैं कंठ मेरे।

नयनों के अश्रु भी तुमसे
विनती कर के अब हार गए
मेरे संतापों के ताप से भी
ना रूद्ध ह्रदय के द्वार खुले

जो प्रश्न मेरे थे गए तुम तक
ना लौट के आया प्रत्युत्तर
दस्तक देते कईं शब्द मेरे
बैरंग चले आए मुझ तक

अब छोड़ दिया है आस सभी
भूला तेरा अपमान सभी
पशुता सा जो आघात किया
बेधा मन छल प्रतिघात किया

लो मुक्त किया हर बंधन से
अपने रूदन और क्रदन से
जी लो तुम मुक्त-मगन होकर
रच लो संसार नव-सृजन कर
@ रश्मि वर्मा

Wednesday, October 4, 2017

आदमी काम का नहीं होता.................जिगर मुरादाबादी

1890-1960
अब तो ये भी नहीं रहा एहसास 
दर्द होता है या नहीं होता 

इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा 
आदमी काम का नहीं होता 

टूट पड़ता है दफ़अ'तन जो इश्क़ 
बेश-तर देर-पा नहीं होता 

वो भी होता है एक वक़्त कि जब 
मा-सिवा मा-सिवा नहीं होता 

हाए क्या हो गया तबीअ'त को 
ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता 

दिल हमारा है या तुम्हारा है 
हम से ये फ़ैसला नहीं होता 

जिस पे तेरी नज़र नहीं होती 
उस की जानिब ख़ुदा नहीं होता 

मैं कि बे-ज़ार उम्र भर के लिए 
दिल कि दम-भर जुदा नहीं होता 

वो हमारे क़रीब होते हैं 
जब हमारा पता नहीं होता 

दिल को क्या क्या सुकून होता है 
जब कोई आसरा नहीं होता 

हो के इक बार सामना उन से 
फिर कभी सामना नहीं होता 
-जिगर मुरादाबादी