Monday, August 20, 2018

मैं नीर भरी दुख की बदली!,,,,,महादेवी वर्मा

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
-महादेवी वर्मा

Sunday, August 19, 2018

इसीलिए तो नगर -नगर..............गोपालदास नीरज


इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू 
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था|

जिनका दुःख लिखने की ख़ातिर 
मिली न इतिहासों को स्याही,
क़ानूनों को नाखुश करके 
मैंने उनकी भरी गवाही 

जले उमर-भर फिर भी जिनकी 
अर्थी उठी अँधेरे में ही,
खुशियों की नौकरी छोड़कर 
मैं उनका बन गया सिपाही 

पदलोभी आलोचक कैसे करता दर्द पुरस्कृत मेरा 
मैंने जो कुछ गाया उसमें करुणा थी श्रृंगार नहीं था|

मैंने चाहा नहीं कि कोई 
आकर मेरा दर्द बंटाये,
बस यह ख़्वाहिश रही कि-
मेरी उमर ज़माने को लग जाये,

चमचम चूनर-चोली पर तो 
लाखों ही थे लिखने वाले,
मेरी मगर ढिठाई मैंने 
फटी कमीज़ों के गुन गाये,

इसका ही यह फल है शायद कल जब मैं निकला दुनिया में 
तिल भर ठौर मुझे देने को मरघट तक तैयार नहीं था|

कोशिश भी कि किन्तु हो सका 
मुझसे यह न कभी जीवन में,
इसका साथी बनूँ जेठ में 
उससे प्यार करूँ सावन में,

जिसको भी अपनाया उसकी 
याद संजोई मन में ऐसे 
कोई साँझ सुहागिन दिया 
बाले ज्यों तुलसी पूजन में,

फिर भी मेरे स्वप्न मर गये अविवाहित केवल इस कारण 
मेरे पास सिर्फ़ कुंकुम था, कंगन पानीदार नहीं था|

दोषी है तो बस इतनी ही 
दोषी है मेरी तरुणाई,
अपनी उमर घटाकर मैंने 
हर आँसू की उमर बढ़ाई,

और गुनाह किया है कुछ तो 
इतना सिर्फ़ गुनाह किया है 
लोग चले जब राजभवन को 
मुझको याद कुटी की आई

आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा 
नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था|

-गोपालदास नीरज

Saturday, August 18, 2018

शेरो-सुख़न तक ले चलो...अदम गोंडवी


भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो 
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ़ हो गई 
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज़्मो-ज़ब्‍त की तालीम देना बाद में 
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है 
तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग 
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो
-अदम गोंडवी 

Friday, August 17, 2018

स्वतंत्रता दिवस की पुकार....अटल बिहारी वाजपेयी


पन्द्रह अगस्त का दिन कहता - आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

- अटल बिहारी वाजपेयी

Thursday, August 16, 2018

परिचय की वो गांठ....त्रिलोचन

1917-2007

यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!

था पथ पर मैं भूला भूला 
फूल उपेक्षित कोई फूला 
जाने कौन लहर ती उस दिन 
तुमने अपनी याद जगा दी। 


कभी कभी यूं हो जाता है 
गीत कहीं कोई गाता है 
गूंज किसी उर में उठती है 
तुमने वही धार उमगा दी। 


जड़ता है जीवन की पीड़ा 
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा 
छवि के शर से दूर भगा दी।
-त्रिलोचन

Wednesday, August 15, 2018

परिचय ?....मीना चोपड़ा


भूल से जा गिरी थी मिट्टी में
मद्धिम सी अरुणिमा तुम्हारी।
बचा के उसको उठा लिया मैंने।
उठा कर माथे पर सजा लिया मैंने।

सिंदूरी आँच को ओढ़े इसकी
बर्फ़ के टुकड़ों पर चल पड़ी हूँ मैं।
सर्द सन्नाटों में घूमती हुई
हाथों को अपने ढूँढती रह गई हूँ मैं।

वही हाथ
जिनकी मुट्ठी में बन्द लकीरें
तक़दीरों को अपनी खोजती हुई
आसमानों में उड़ गईं थी।

बादलों में बिजली की तरह
कौंधती हैं अब तक।

शून्य की कोख से जन्मी ये लकीरें
वक़्त की बारिश में घुलकर
मेरे सर से पाओं तक बह चुकी हैं।
पी चुकी हैं मुझे क़तरा क़तरा।

पैर ज़मीं पर कुछ ऐसे अटक गए हैं
वे उखड़ते ही नहीं।

ये सनसनाहटे हैं कि छोड़ती ही नहीं मुझको
सुर और सुर्खियों के बीच
अपरिचित सी रह गई हूँ मैं।

स्वयं से स्वयं का परिचय?
कभी मिलता ही नहीं।

-मीना चोपड़ा

Tuesday, August 14, 2018

लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों.....दुष्यन्त कुमार

वह चपल बालिका भोली थी
कर रही लाज का भार वहन
झीने घूँघट पट से चमके
दो लाज भरे सुरमई नयन
निर्माल्य अछूता अधरों पर
गंगा यमुना सा बहता था
सुंदर वन का कौमार्य
सुघर यौवन की घातें सहता था
परिचय विहीन हो कर भी हम
लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों।
-दुष्यन्त कुमार

Monday, August 13, 2018

कौन जो दूध का धुला होगा.....सजीवन मयंक

आज कोई तो फैसला होगा।
कौन जो दूध का धुला होगा।।

एक पगडंडी अलग से दिखती है।
कोई इस पर कभी चला होगा।।

होगी मशाल जिसके हाथों में।
पीछे उसके एक काफ़िला होगा।।

जो आदमी को गले लगाता था।
वो पागल आपको मिला होगा।।

झूठ बनकर गवाह आया है।
सांच की आंच में जला होगा।।

ठूँठ सा जो आज उपेक्षित है।
कभी इस पर भी घोंसला होगा।।

रोशनी का स्याह चेहरा है।
अंधेरे नें कहीं छला होगा।।

ये लावारिस पड़ा हुआ मुर्दा।
किसी की गोद में पला होगा।।
-सजीवन मयंक

Sunday, August 12, 2018

इश्क़...निर्मल सिद्धू


इश्क़ का शौक़ जिनको होता है
मौत का न ख़ौफ़ उनको होता है

घूमते फिरते हैं फ़क़त दर बदर
ये मर्ज़ न हर किसी को होता है

ली होती है मंज़ूरी तड़पने की
मिला ख़ुदा से यही उनको होता है

चुनता है वो भी ख़ास बन्दों को ही
इसलिये न जिसको तिसको होता है

सहरा की रेत हो या फ़ाँसी का फंदा
गिला कुछ भी न उनको होता है

अख़्तियार में कुछ रह नहीं जाता
ये इशारा जब दिल को होता है

ख़्याल निर्मल को ये सता रहा है
ख़ुदाया, क्यों नहीं सबको होता है
-निर्मल सिद्धू

Saturday, August 11, 2018

शून्य से शिखर हो गए........सजीवन मयंक

शून्य से शिखर हो गए।
और तीखा ज़हर हो गए।।

कल तलक जो मेरे साथ थे।
आज जाने किधर हो गए।।

बाप-बेटों की पटती नहीं।
अब अलग उनके घर हो गए।।

है ये कैसी जम्हूरी यहाँ।
हुक्मरां वंशधर हो गए।।

क्यो परिन्दे अमन चैन के।
ख़ून से तरबतर हो गए।।

भूल गए हम शहीदों को पर।
देश द्रोही अमर हो गए।।
-सजीवन मयंक

Friday, August 10, 2018

परेशां आईना है...........सजीवन मयंक

शब्द को कुछ इस तरह तुमने चुना है। 
स्तुति भी बन गयी आलोचना है।।

आजकल के आदमी को क्या हुआ है।
देखकर जिसको परेशां आईना है।।

दोस्तों इन रास्तों को छोड़ भी दो।
आम लोगों को यहाँ चलना मना है।।

जिसके भाषण आज सडकों पर बहुत हैं।
लोग कहते हैं कि वो थोथा चना है।।

जिस कुएँ में आज डूबे जा रहे हम।
वो हमारे ही पसीने से बना है।।

ठोकरों से सरक सकता है हिमालय।
जो अपाहिज हैं यह उनकी कल्पना है।।

खोल दो पिंजर मगर उड़ ना सकेगा।
कई वर्षों से ये पंछी अनमना है।।
-सजीवन मयंक

Thursday, August 9, 2018

कोई क़ीमत चुका नहीं सकता.....नज़ीर बनारसी

बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर

क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर

बुज़ुर्गवार ने इसके लिए तो कुछ न कहा,
गए हैं मुझको दुआ-ए-सलामती देकर

हमारी तल्ख़-नवाई को मौत आ न सकी,
किसी ने देख लिया हमको ज़हर भी देकर

न रस्मे दोस्ती उठ जाए सारी दुनिया से,
उठा न बज़्म से इल्ज़ामे दुश्मनी देकर

तिरे सिवा कोई क़ीमत चुका नहीं सकता,
लिया है ग़म तिरा दो नयन की ख़ुशी देकर 
- नज़ीर बनारसी

Wednesday, August 8, 2018

शहीद की विधवा.....अमित निश्छल

वीर रस, जन गण सुहाने गा रहे हैं
पंक्तियों में गुनगुनाते जा रहे हैं,
तारकों की नींद को विघ्नित करे जो
गीत, वे कोरे नयन दो गा रहे हैं।

ज़िंदगी की राह में रौशन रही वो
माँग में सिंदूर, सर चूनर बनी थी,
रात के अंधेर में बेबस हुई अब
जिंदगी की नींव है उजड़ी हुई सी।
जोग, ना परितज्य वो भी जानती है,
पर निरा मंगल हृदय से साजती है
रिस भरा है जीव में उसके तभी तो,
साँस में हरदम कसक सुलगा रही है।
साँस रुकनी थी, मगर तन था पराया
लाश देखी नाथ की, तब भी रही थी,
चीख भी सकती नहीं कमजोर बनकर
हार उसके प्राण की, नाज़ुक घड़ी थी।
अंत्य साँसें भी अभी कोसों खड़ी हैं,
जागती, जगकर निहारे, देखती है
कर, निहोरे जोड़कर, वंदन सहज कर,
अंत में अंतस तिरोहित ढूँढ़ती है।

दीन सी आँखें अभी सूखी नहीं हैं,
औ' उधर बदमाश चंदा झाँकता है
हाथ की लाली अभी धूमिल नहीं है,
ताक कर तिरछे, ठठाकर, खाँसता है।
दुर्दिनों पर डालकर मुस्कान कलुषित,
हेय नज़रों से ज़रा उपहास करता
क्या पता उस रात के राकेश को भी,
यातना से त्रस्त भी कुछ माँग करता।
सर उठाकर आँख को मींचे कठिन सी,
माँगती अंगार, उल्का पिंड से जो
गिर रहे गोले धरा पर अग्नि दह सम,
अंब के अंबार से बुझ जा रहे वो।
वह बहुत सहमी खड़ी है ठोस बनकर,
धूल की परछाइयों सी पोच बनकर
दूर है अर्धांग उसका जो सदा को,
देश पर कुरबान है दस्तूर बनकर।

गीत गाते जा रहे हैं जो सभी ये,
दो दिनों के बाद सब भूला हुआ कल
मर मिटेंगे देश पर गर कल सभी तो,
कब कहेगा, कौन यह दस्तूर प्रति पल।
-“निश्छल”

Tuesday, August 7, 2018

राह तकती, वो दो आंखे....निशा माथुर



दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो आंखे, 
मन में आंशकाओं के उठते हुये बवंडर,
दिल मायूसी में डूबा, जैसे कोई खंडहर।
किसी भी अनहोनी को
कर अस्वीकार, 
दिमाग जा पहुंचा संभावनाओं के द्वार।
वो हर एक पल का अब जीना मरना,
कब आयेगा
उसका वो अपना... ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो पुतलियां, 
जो भीगी हैं, अहसासों की बारिश से,
जो जाग रही हैं, ममता की ख्वाहिश से।
अकुलाहट में अपनी
पलक पावड़े बिछाए ,
प्रतीक्षा की हर आहट पर देवी-देवता मनाए।
असमंजस के क्षण-क्षण को
गिनता वक्त होगा,
जाने किस हाल में उसका लाड़ला होगा ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, 
वो दो मासूम नजरें, 
वो तुतलाती-सी बोली, भाव नयन में थमे-थमे से,
वो सीने से उठता ज्वार, खड़े पांव जमे-जमे से।
छाया देता कल्पवृक्ष,
गोदी का आश्वासित बचपन,
जीवट था उसका नायक,
सवाल पूछता भोला मन।
उसके कंधों पर चढ़कर, चांद को छूने जाना है,
बता दे मेरी मां, मेरे जीवनदाता को कब आना है ???

दरवाजे की चौखट पर
राह तकती, वो दो निगाहें, 
अपनी सिलवटों का दर्द बयां कर रही है,
हर लम्हा पदचाप की सुधियां तलाश रही हैं।

कलेजा हथेली पर, सांसे घूमी-फिरी सी,
तारीखें मौन पसराए,आशाओं में झुरझुरी सी।
सूखे आंसू और दिलहाहाकार कर रोता है,
जब तिरगें में लिपटा, 
किसी जवान का जनाजा होता है !!!

-निशा माथुर

Monday, August 6, 2018

समस्या....सुशान्त प्रिय


बिना किसी पूर्व-सूचना के 
एक दिन आ गया प्रलय, 
भौंचक्के रह गए सारे भविष्यवेत्ता,
सन्न रह गया समूचा मौसम-विभाग, 
हहराता समुद्र लील गया सारा आकाश,
सूर्य डूब गया उसमें, 
जिसकी फूली हुई लाश 
बहती मिली दूर कहीं 
कुछ समय बाद 
चाँद और सितारे, 
न जाने कहाँ बह गए 
नामो-निशान तक नहीं मिला उनका। 

वह तो मैं ही था कि 
बच गया किसी तरह 
तुम्हारे प्रेम-पत्रों की नाव बना कर; 
वह तो तुम ही थी कि 
बच गई किसी तरह 
मेरे प्रेम-पत्रों के चप्पू चला कर।

समस्या यह है कि अब हम 
अर्घ्य किसे देंगे 
प्रतिदिन?
-सुशान्त प्रिय

Sunday, August 5, 2018

गमों की आग...हरिहर झा


गीत धड़कन से निकल 
कर्कश हुये 
टकरा ग़मों से, 
आग की बरसात हुई। 

बदक़िस्मत! 
ख़ुदा तक पहुंच कर, 
लौटी अधूरी मांग
लो! दिल की हमारी;
स्वाद में ऐसा लगा,  
चाश्नी में किस तरह  
नीम कड़ुवे की शुमारी। 
ठोक माथा-मुँह छिपा रोये, 
किसी दीवार से लगती  
किस्मत जा कहीं सोई। 

पेट ख़ाली, 
तड़पते हों भूख से पर 
ख़्याल में 
पकवान ही साधा।
तारों पर नज़र ,
और गड्ढे सड़क पर भरपूर  
कैसे दूर हो बाधा? 
कंगाली, फटेहाली में, जीते 
महल सपनों के  
बनाये क्या करे कोई!!  
-हरिहर झा

Saturday, August 4, 2018

किरदार......श्यामल सुमन

बाँटी हो जिसने तीरगी उसकी है बन्दगी।
हर रोज नयी बात सिखाती है ज़िन्दगी।।

क्या फ़र्क रहनुमा और क़ातिल में है यारो।
हो सामने दोनों तो लजाती है ज़िन्दगी।।

लो छिन गए खिलौने बचपन भी लुट गया।
यों बोझ किताबों की दबाती है ज़िन्दगी।।

है वोट अपनी लाठी क्यों भैंस है उनकी।
क्या चाल सियासत की पढ़ाती है ज़िन्दगी।।

गिनती में सिमटी औरत पर होश है किसे।
महिला दिवस मना के बढ़ाती है ज़िन्दगी।।

किरदार चौथे खम्भे का हाथी के दाँत सा।
क्यों असलियत छुपा के दिखाती है ज़िन्दगी।।

देखो सुमन की ख़ुदकुशी टूटा जो डाल से।
रंगीनियाँ काग़ज़ की सजाती है ज़िन्दगी।।
-श्यामल सुमन

Friday, August 3, 2018

फन्दा............लक्ष्मीनारायण गुप्त


कुछ मुसीबतें, कुछ परेशानियाँ
ऐसी होती हैं जो फन्दे की तरह
गले पर पड़ जाती हैं
जितना प्रयत्न करो निकलने का
फन्दा उतना ही और कसता जाता है

ज़्यादा से ज़्यादा तुम यह कर सकते हो
कि फन्दे को स्वीकार कर लो
अंगीकार कर लो
शिव की तरह विष पान कर लो
फन्दा अब तुम्हारे जीवन की हक़ीकत है

जैसे तुम कारागार में सजा काट रहे हो
इस सजा की कोई अवधि नहीं है
या तो कोई चमत्कार होगा
जो तुम्हें मुक्त करेगा
या फिर यह काम यमराज करेंगे

दिक्कत यह है कि
फन्दा कभी स्वाभाविक नहीं हो पाता
बन्धन हमेशा बन्धन ही रहता है
इस लिए निकलने का व्यर्थ प्रयत्न
अविरल ज़ारी रहता है

फन्दा शाश्वत है
नियति है, प्रकृति है
तुम इससे पशु की तरह बँधे हो
मुक्त होने का प्रयास व्यर्थ है
बस आराम से चारा खाओ


-लक्ष्मीनारायण गुप्त
-१ अगस्त, २०१८

Thursday, August 2, 2018

दिन में तेरा नहीं काम............राहुल राही

शब ए फ़ुर्सत में तू आना, ऐ ख़्वाब,
दिन में तेरा नहीं काम, ज़माना नहीं।

हो ना जाएँ कहीं रंग ये, तेरे खराब,
रात के सिवा, तेरा कोई, ठिकाना नहीं।

तेरा फन, तेरा हुनर, लाजवाब,
पर किसी को, ये अज़ाब, बताना नहीं।

कोई खेलेगा तुझसे, कोई झेलेगा तुझको,
कर तू बात, यहाँ दिल, लगाना नहीं। 

कहूँ दिल से एक हिदायत है जनाब,
जागते रहना किसी को जगाना नहीं। 

कोई वीणा या बजाओ कोई रबाब,
अब अकेले खुद से यूँ शर्माना नहीं। 



Wednesday, August 1, 2018

ख़्वाब मेरी आँख में........डॉ. प्रेम लता चसवाल ''प्रेमपुष्प''

ख़्वाब मेरी आँख में पलते रहे हैं। 
अहर्निश हर-पल वही सजते रहे हैं।। 

मोतियों से जो सितारे आसमां में,
आँख से मेरी ही तो झरते रहे हैं। 

रेत के टीले पे जा के देखिये, वो  
कल्पना की मृगतृषा रचते रहे हैं। 

वो न इन अश्कों से भीगेंगे कभी भी,
जिनके मन पर-पीर से बचते रहे हैं।  

'प्रेम' के परवाज़ से मत पूछिए, क्यों 
हौंसले उनको हसीं लगते रहे हैं।। 
-डॉ. प्रेम लता चसवाल ''प्रेमपुष्प''

Tuesday, July 31, 2018

ख़्वाब आते रहे!.....डॉ. अनिल चड्ढा

ख़्वाब आते रहे, ख़्वाब जाते रहे,
तुमसे मिलने को थे तरसाते रहे!

बात हर ओर तेरी ही होती रही,
हम भी संग-संग तेरे गीत गाते रहे!

बीत जायेगा हर पल तुम्हारे बिना,
फिर भी हर पल तुम्हे क्यों बुलाते रहे!

एक जीवन मिला, एक तुम थे मिले,
सात जन्मों के रिश्ते निभाते रहे!

बात होती रही, बात बोले बिना,
उनसे जब-जब थे नज़रें मिलाते रहे!
-डॉ. अनिल चड्ढा

Monday, July 30, 2018

ख़्वाबो मेरे ख़्वाबो......विभा नरसिम्हन

ख़्वाबों मेरे ख़्वाबों कभी तो आराम करो 
कितना और उड़ोगे कहीं तो अब शाम करो 

थक कर बैठी हूँ मैं पीछे तुम्हारे भागते-भागते 
आँख-मिचोली के इस खेल में तुम हाथ कभी न आते
इतनी ऊँची पींगे तुम्हारी कभी तो ढलान करो 
ख़्वाबों मेरे ख़्वाबों कभी तो आराम करो 

आँखों में तुम जब सजते हो रोशन हो जाता है जग मेरा 
पर पल में ग़ायब होने की ज़िद में टूट ही जाता है मन मेरा 
अपने सतरंगी मौसम से जीवन मेरा गुलफ़ाम करो 

ख़्वाबों मेरे ख़्वाबों कभी तो आराम करो 
कितना और उड़ोगे कहीं तो अब शाम करो
-विभा नरसिम्हन

Sunday, July 29, 2018

आदत..........श्यामल सुमन

मेरी यही इबादत है।
सच कहने की आदत है।।

मुश्क़िल होता सच सहना तो।
कहते इसे बग़ावत है।।

बिना बुलाये घर आ जाते।
कितनी बड़ी इनायत है।

कभी ज़रूरत पर ना आते।
इसकी मुझे शि्क़ायत है।।

मीठी बातों में भरमाना।
इनकी यही शराफ़त है।।

दर्पण दिखलाया तो कहते।
देखो किया शरारत है।।

झूठ कभी दर्पण न बोले।
बहुत बड़ी ये आफत है।।

ऐसा सच स्वीकार किया तो।
मेरे दिल में राहत है।।

रोज विचारों से टकराकर।
झुका है जो भी आहत है।।

सत्य बने आभूषण जग का।
यही सुमन की चाहत है।।
-श्यामल सुमन