Thursday, December 13, 2018

शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!.....सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

वंचना है चाँदनी सित,
झूठ वह आकाश का निरवधि, गहन विस्तार-
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!
दूर वह सब शान्ति, वह सित भव्यता,

वह शून्यता के अवलेप का प्रस्तार-
इधर-केवल झलमलाते चेतहर,
दुर्धर कुहासे का हलाहल-स्निग्ध मुट्ठी में
सिहरते-से, पंगु, टुंडे, नग्न, बुच्चे, दईमारे पेड़!

पास फिर, दो भग्न गुम्बद, निविडता को भेदती चीत्कार-सी मीनार,
बाँस की टूटी हुई टट्टी, लटकती
एक खम्भे से फटी-सी ओढऩी की चिन्दियाँ दो-चार!
निकटतर-धँसती हुई छत, आड़ में निर्वेद,

मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में
तीन टाँगों पर खड़ा, नतग्रीव, धैर्य-धन गदहा।
निकटतम-रीढ़ बंकिम किये, निश्चल किन्तु लोलुप खड़ा
वन्य बिलार- पीछे, गोयठों के गन्धमय अम्बार!

गा गया सब राजकवि, फिर राजपथ पर खो गया।
गा गया चारण, शरण फिर शूर की आ कर, निरापद सो गया।
गा गया फिर भक्त ढुलमुल चाटुता से वासना को झलमला कर,
गा गया अन्तिम प्रहर में वेदना-प्रिय, अलस, तन्द्रिल,

कल्पना का लाड़ला कवि, निपट भावावेश से निर्वेद!
किन्तु अब-नि:स्तब्ध-संस्कृत लोचनों का
भाव-संकुल, व्यंजना का भीरु, फटा-सा, अश्लील-सा विस्फार।
झूठ वह आकाश का निरवधि गहन विस्तार-

वंचना है चाँदनी सित,
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!

-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

Wednesday, December 12, 2018

सुबह की पलकों पे शबनमी क़तरे ...........श्वेता सिन्हा

दो दिन का इश्क़
मेरी तन्हाइयों में 
 तुम्हारा एहसास 
कसमसाता है, 
तुम धड़कनों में 
लिपटे हो 
मेरी साँसें बनकर। 
बेचैन वीरान 
साहिल पे बिखरा 
कोई ख़्वाब,
लहर समुन्दर की 
पलकों को 
नमकीन करे। 
सोचा न सोचूँ तुम्हें 
ज़ोर  ख़्यालों  पर 
 कैसे हो,
तुम फूल की ख़ुशबू 
 भँवर मन 
मेरा बहकता है। 
दो दिन का 
तेरा इश्क़ सनम 
दर्द ज़िंदगीभर का,
फ़लसफ़ा  
मोहब्बत का 
समझ न आया हमको। 
शिशिर की
रात के आग़ोश  में  
संग चाँदनी के  
ख़ूब रोया दिल,
सुबह की पलकों पे 
शबनमी क़तरे 
 गवाही देते
शिशिर की। 

-श्वेता सिन्हा

Tuesday, December 11, 2018

सिकुड़ गए दिन ....कुमार रवींद्र

ठंडक से
सिकुड़ गए दिन
हवा हुई शरारती - 
चुभो रही पिन

रंग सभी धूप के
हो गए धुआँ
मन के फैलाव सभी
हो गये कुआँ

कितनी हैं यात्राएँ
साँस रही गिन

सूनी पगडंडी पर
भाग रहे पाँव
क्षितिजों के पार बसे
सूरज के गाँव

आँखों में
सन्नाटों के हैं पल-छिन

बाँह में जमाव-बिंदु
पलकों में बर्फ
उँगलियाँ हैं बाँच रहीं
काँटों के हर्फ

धुंधों के खेत खड़ीं
किरणें कमसिन
-कुमार रवीन्द्र

Monday, December 10, 2018

चलते-चलते ....सीमा 'सदा' सिघल

मुसाफि़र सी इस जिंदगी में
जो किसी के साथ चलना जानता है
जो साथ चलते-चलते 
किसी का हो जाना चाहता है 
जो किसी का होकर 
उसे अपना बना लेता है 
ऐसी पगड‍ंडियां सिर्फ औ सिर्फ 
प्रेम ही दौड़कर पार कर सकता है 
समेट लेता है अहसासों को 
भावनाओं की अंजुरी में 
प्रेम के ढाई आखर पढ़कर ही नहीं 
जीकर जिंदगी को 
कितने पायदान चढ़ता है 
बिन डगमगाये !!

-सीमा 'सदा' सिघल

Sunday, December 9, 2018

है प्यार उसको तो सारे जहान से........प्रीती श्रीवास्तव

तुम्हारी नजर में जो चांद दागदार है।
रौशन सारा जहां उससे ही यार है।।

है प्यार उसको तो सारे जहान से।
सब पर बरसती चांद की बहार है।।

उसी की इनायत से चमके सितारें।
उसकी जरूरत सबको मेरे यार है।।

हसरत है मुझे उसके पास जाने की।
वही इबादत मेरी और मेरा प्यार है।।

तमन्ना है मेरी वो चमकता रहे यूं ही।
खुदा से मेरी बस इतनी दरकार है।।

मौत आने से पहले उठे मेरा जनाजा।
रूके धड़कने हो बारिस की फुहार है।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Saturday, December 8, 2018

सार्थक....सरोज दहिया


कष्टों से मुक्ति मिल जाये
ऐसा कुछ प्रयास करो,
सावधान रहकर कांटों से
फूल फूल चुन लिया करो;
तो भी कंटक चुभ ही जायें
तो भी क्या परेशानी है,
उसका तो स्वभाव चुभन है
तो भी क्या बेमानी है;
कंटक भी कोमल हो जायें,
कोमलता को पूछे कौन
सब कुछ कोमल-कोमल होगा,
ज्ञान चुभन का देगा कौन ?
जिसको जितना ज्ञान चुभन का
उतना कोमल खुद बन जाता,
खुद कितने भी कंटक झेले,
औरों का दीपक बन जाता;
अपने हाथ-पैर छलनी कर
जो औरों को मार्ग बताता,
जीवन की सार्थकता मिलती
जग के मग में फूल बिछाता ।

-सरोज दहिया

Friday, December 7, 2018

बजी कहीं शहनाई सारी रात.....रमानाथ अवस्थी

सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई
ज़हर भरी जादूगरनी सी मुझको लगी जुन्हाई
मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई

दूर कहीं दो आंखें भर भर आईं सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

गगन बीच रुक तनिक चंद्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा जाना है खेल नहीं दीवाने
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने

देख जिसे मेरी तबियत घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना
यहां तुम्हारा क्या‚ काई भी नहीं किसी का अपना

समझ अकेला मौत मुझे ललचाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाजी जीत गया मैं वे सबके सब हारे
जाते जाते चांद कह गया मुझको बड़े सकारे

एक कली मुरझाने को मुस्काई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

~ रमानाथ अवस्थी

Thursday, December 6, 2018

शहनाई गूँज रही...जयकृष्ण राय तुषार

जाने क्या होता
इन प्यार भरी बातों में?
रिश्ते बन जाते हैं
चन्द मुलाकातों में ।

मौसम कोई हो
हम अनायास गाते हैं,
बंजारे होठ मधुर
बाँसुरी बजाते हैं,
मेंहदी के रंग उभर आते हैं
हाथों में ।

खुली-खुली आँखों में
स्वप्न सगुन होते हैं,
हम मन के क्षितिजों पर
इन्द्रधनुष बोते हैं,
चन्द्रमा उगाते हम
अँधियारी रातों में ।

सुधियों में हम तेरी
भूख प्यास भूले हैं
पतझर में भी जाने
क्यो पलाश फूले हैं
शहनाई गूँज रही
मंडपों कनातों में।
-जयकृष्ण राय तुषार

Wednesday, December 5, 2018

हाथ मिलने से पहले दिलों का मिलन...नज़ीर बनारसी

घर की किस्मत जगी घर में आए सजन
ऐसे महके बदन जैसे चंदन का बन 

आज धरती पे है स्वर्ग का बाँकपन 
अप्सराएँ न क्यूँ गाएँ मंगलाचरण 

ज़िंदगी से है हैरान यमराज भी 
आज हर दीप अँधेरे पे है ख़ंदा-ज़न 

उन के क़दमों से फूल और फुल-वारियाँ 
आगमन उन का मधुमास का आगमन 

उस को सब कुछ मिला जिस को वो मिल गए 
वो हैं बे-आस की आस निर्धन के धन 

है दीवाली का त्यौहार जितना शरीफ़ 
शहर की बिजलियाँ उतनी ही बद-चलन 

उन से अच्छे तो माटी के कोरे दिए 
जिन से दहलीज़ रौशन है आँगन चमन 

कौड़ियाँ दाँव की चित पड़ें चाहे पट 
जीत तो उस की है जिस की पड़ जाए बन 

है दीवाली-मिलन में ज़रूरी 'नज़ीर' 
हाथ मिलने से पहले दिलों का मिलन 
- नजीर बनारसी

Tuesday, December 4, 2018

ख़ामोशी की साँस....श्वेता सिन्हा

ख्याल
साँझ की
गुलाबी आँखों में,
डूबती,फीकी रेशमी
डोरियों के
सिंदूरी गुच्छे,
क्षितिज के कोने के
स्याह कजरौटे में
समाने लगे,
दूर तक पसरी
ख़ामोशी की साँस,
जेहन में ध्वनित हो,
एक ही तस्वीर
उकेरती है,
जितना  झटकूँ
उलझती है
फिसलती है आकर
पलकों की राहदारी में
ख्याल बनकर।
-श्वेता सिन्हा
मूल रचना

Monday, December 3, 2018

गृह लक्ष्मी....पूजा प्रियंवदा

Housewife
उद्यम से स्वादविहीन 
आखिरी रोटी खाती है 
उसकी रसोई के विश्लेषण 
में कहे सब कड़वे शब्द 
चिपके हैं तालू से

सुन्दर, महंगी साड़ी 
उसने बचा रखी है 
किसी विशेष अवसर के लिए 
जब कि मर चुके हैं 
उसके देह के सारे त्यौहार 
तुम्हारे बिस्तर में

बच्चों की ख्वाहिशों 
का हिसाब लगाती 
मुल्तवी कर चुकी है 
वो अपने सारे अल्हड़पन 
तुम्हारे असम्वेदन को 
रोज़ सींचती गूंगे आंसुओं से

तुम्हारी देवी, प्रिया 
गृहलक्ष्मी



Sunday, December 2, 2018

पत्थर के शहर में....श्वेता सिन्हा

पत्थर के शहर में शीशे का मकान ढूँढ़ते हैं।
मोल ले जो तन्हाइयाँ ऐसी एक दुकान ढूँढ़ते हैं।।

हर बार खींच लाते हो ज़मीन पर ख़्वाबों से,
उड़ सकें कुछ पल सुकूं के वो आसमां ढूँढ़ते हैं।

बार-बार हक़ीक़त का आईना क्या दिखाते हो,
ज़माने के सारे ग़म भुला दे जो वो परिस्तां ढूँढ़ते हैं।।

जीना तो होगा ही जिस हाल में भी जी लो,
चंद ख़ुशियों की चाह लिए पत्थर में जान ढूँढ़ते हैं।।

ठोकरों में रखते हैं हरेक ख़्वाहिश इस दिल की,
उनकी चौखट पे अपने मरहम का सामान ढूँढ़ते हैं।।

    -श्वेता सिन्हा


Saturday, December 1, 2018

अक्षर.....डॉ. जगदीश व्योम


अक्षर कभी क्षर नहीं होता
इसीलिए तो वह ’अक्षर’ है
क्षर होता है तन
क्षर होता है मन
क्षर होता है धन
क्षर होता है अज्ञन
क्षर होता है मान और सम्मान
परंतु नहीं होता है कभी क्षर
’अक्षर’ 
इसलिए अक्षरों को जानो
अक्षरों को पहचानो
अक्षरों को स्पर्श करो
अक्षरों को पढ़ो
अक्षरों को लिखो
अक्षरों की आरसी में अपना चेहरा देखो
इन्हीं में छिपा है 
तुम्हारा नाम
तुम्हारा ग्राम
और तुम्हारा काम
सृष्टि जब समाप्त हो जोगी
तब भी रह जाएगा ’अक्षर’
क्यों कि ’अक्षर’ तो ब्रह्म है
और भला-
ब्रह्म भी कहीं मरता है?
आओ! बाँचें 
ब्रह्म के स्वरूप को 
सीखकर अक्षर 
-डॉ. जगदीश व्योम

Friday, November 30, 2018

आवाज़.....पाराशर गौड़

सुनो..
मेरी आवाज़ को गौर से सुनो
अगर पौधा मर गया तो उसके साथ
बीज भी मर जायेगा
धरती बंजर हो जायेगी
किसान भी मर जायेगा-

अगर वो मरा तो...
उसके साथ समुचा देश भी मर जायेगा
फिर...
ना तो कोई सुननेवाला होगा
ना सुनाने वाला।
-पाराशर गौड़

Thursday, November 29, 2018

आवाज़.....दीप्ति शर्मा


आवाज़ जो
धरती से आकाश तक
सुनी नहीं जाती
वो अंतहीन मौन आवाज़
हवा के साथ पत्तियों
की सरसराहट में
बस महसूस होती है
पर्वतों को लाँघकर
सीमाएँ पार कर जाती हैं
उस पर चर्चायें की जाती हैं
पर रात के सन्नाटे में
वो आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है
सुबह होने पर
घायल परिंदे की
अंतिम साँस की तरह
अंततः दफ़न हो जाती है
वो अंतहीन मौन आवाज़

-दीप्ति शर्मा

Wednesday, November 28, 2018

25 त्रिपदियाँ......गुलजार

त्रिपदियाँ
१.
मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे

२.
सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा(भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें

सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।

३.
सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

४.
शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को

तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?

'५.
ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी

खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!

६.
लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर

यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है कोई?

७.
आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!

चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा

८.
पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हुआ है,पाँच बजे हैं

सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!

९.
बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख्‍़वाहिशें ऐसे दिल में
‘मेक्सीकन’ फ़िल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे।

थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्‍़वाहिशें मुझ से।

१०.
तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ गई घर में!

कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!

११.
कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे

ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

१२.
वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था

फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।

१३.
वह जिस साँस का रिश्ता बंधा हुआ था मेरा
दबा के दाँत तले साँस काट दी उसने

कटी पतंग का मांझा मुहल्ले भर में लुटा!

१४.
कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई साथ आया था,उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे

शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!

१५.
इतनी लम्बी अंगड़ाई ली लड़की ने
शोले जैसे सूरज पर जा हाथ लगा

छाले जैसा चांद पडा़ है उंगली पर!

१६.
बुड़ बुड़ करते लफ्‍़ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की ऐड़ी से ।

अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है।

१७.
चूड़ी के टुकड़े थे,पैर में चुभते ही खूँ बह निकला
नंगे पाँव खेल रहा था,लड़का अपने आँगन में

बाप ने कल दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी!

१८.
चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था

बहुत कहा आवारा उल्काओं की संगत ठीक नहीं!

१९.
कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से 

टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को!

२०.
कोने वाली सीट पे अब दो और ही कोई बैठते हैं
पिछले चन्द महीनों से अब वो भी लड़ते रहते हैं

क्लर्क हैं दोनों,लगता है अब शादी करने वाले हैं

२१.
कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में

अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!

२२.
कांटे वाली तार पे किसने गीले कपड़े टांगे हैं
ख़ून टपकता रहता है और नाली में बह जाता है

क्यों इस फौ़जी की बेवा हर रोज़ ये वर्दी धोती है।

२३.
आओ ज़बानें बाँट लें अब अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात, ना हमको समझना है।

दो अनपढ़ों कि कितनी मोहब्बत है अदब से

२४.
नाप के वक्‍़त भरा जाता है ,रेत घड़ी में-
इक तरफ़ खा़ली हो जबफिर से उलट देते हैं उसको

उम्र जब ख़त्म हो ,क्या मुझ को वो उल्टा नहीं सकता?

२५.
तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे

ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?
-गुलजार

Tuesday, November 27, 2018

अक्स तुम्हारा (हाइकु)............डॉ. सरस्वती माथुर

अक्स तुम्हारा (हाइकु)

1
मोर है बोले
मेघ के पट जब
गगन खोले 
2
वक्त तकली
देर तक कातती
मन की सुई l
3
यादों के हार
कौन टाँक के गया
मन के द्वार 
4
अक्स तुम्हारा
याद आ गया जब
मन क्यों रोया ?
5
यादों से अब
मेरा बंधक मन
रिहाई माँगे 
6
यादों की बाती
मन की चौखट को
रोशनी देती l
7
साँझ होते ही
आकाश से उतरी
धूप चिरैया 
8
धरा अँगना
चंचल बालक सी
चलती धूप 
9
भोर की धूप
जल दर्पण देख
सजाती रूप 
10
मेघ की बूँदें
धरा से मिल कर
मयूरी हुई

-डॉ. सरस्वती माथुर