Thursday, January 18, 2018

सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं.....कुसुम कोठारी

जो फूलों सी जिंदगी जीते कांटे हजार लिये बैठे हैं
दिल मे फरेब और होटो पे झूठी मुस्कान लिये बैठे हैं। 

खुला आसमां ऊपर,ख्वाबों के महल लिये बैठें हैं
कुछ, टूटते अरमानो का ताजमहल लिये बैठें हैं। 

सफेद दामन वाले भी दिल दागदार लिये बैठे हैं
क्या लें दर्द किसी का कोई अपने हजार लिये बैठें हैं। 

हंसते हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी जवाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं। 

टूटी कश्ती वाले हौसलों की पतवार लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले साहिल पर नाव लिये बैठे हैं।
-कुसुम कोठारी


Wednesday, January 17, 2018

इन शब्दों ने हमें असहाय किया....निधि सक्सेना


कितना अच्छा होता अगर शब्द न होते
शब्दकोश न होते
उनके निहित अर्थ न होते!!

भावनाओं के पैरहन मात्र हैं शब्द
केवल ध्वनियाँ हैं
शोर हैं
जो दूसरे के ध्यान के आधीन है
उनकी समझ पर आश्रित हैं!!

हम जितना अपने भावों को शब्दों में लपेट पाते हैं
सामने वाला केवल उतना ही समझ पाता है!

इन शब्दों ने हमें असहाय किया
कि हम अबोला पढ़ सकें
मौन सुन सकें
मन के उद्गारों को महसूस कर सकें!

जैसे नेत्रहीन विकसित कर लेता है 
हाथों का स्पर्श और आहटें देखना
और देख पाता है बिना देखे!!
बधिर विकसित कर लेता है 
अधरों के कंपन
और आँखो के उद्बोधन सुनना
और सुन पाता है बग़ैर सुने
वैसे ही बगैर शब्द 
निसंदेह हम भी 
अधिक सक्षम होते!!
विकसित कर ही लेते
मन का पढ़ना
मौन समझना!!

~निधि सक्सेना

Tuesday, January 16, 2018

इस वक्त की ज़ंजीर में हैं......पावनी दीक्षित जानिब

इस वक्त की ज़ंजीर में हैं सब बंधे हुए 
खुदके बिछाए जाल में खुद ही फंसे हुए।

अपनी जुवां से आज हर कोई मुक़र गया
दिल की दिलों में खांईंयां है सब धंसे हुए ।

इश्क़ की गलियों से बेदाग निकल जाना
मुमकिन नहीँ दामन मिलें बिना रंगे हुए।

न होशियार बन इस शहर ए मोहब्बत में
फंसते है दिल की क़ैद शिकारी मंझे हुए।

दिल कह रहा है आज तमाशा बना मेंरा 
मुद्दत हुई है हमको खुलकर कर हंसे हुए।

कुछ कद्र कर हमारी जानिब ख़याल कर
हां हम हैं दुआ के जैसे यूं रब से मंगे हुए।
-पावनी दीक्षित जानिब

Monday, January 15, 2018

दर्द कागज़ पर मेरा बिकता रहा​...प्रस्तुतिः नीतू ठाकुर

दर्द कागज़ पर मेरा बिकता रहा​
​मैं बैचैन था रात भर लिखता रहा !!​

​छू रहे थे सब बुलंदियाँ आसमान की​
​मैं सितारों के बीच, चाँद की तरह छिपता रहा !!​

​दरख़्त होता तो, कब का टूट गया होता​
​मैं था नाज़ुक डाली, जो सबके आगे झुकता रहा !!​

​बदले यहाँ लोगों ने, रंग अपने-अपने ढंग से​
​रंग मेरा भी निखरा पर, मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा !!​

​जिनको जल्दी थी, वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,​
​मैं समन्दर से राज गहराई के सीखता रहा !​
प्रस्तुतिः नीतू ठाकुर

Sunday, January 14, 2018

शब्दों तुम बरसो....डॉ. प्रभा मुजुमदार

चुपचुप धीमे-से रुकते, 
झिझकते मत बुदबुदाओ।
डर और सन्नाटे में
संगीत बन मत गुनगुनाओ।
शब्दो! तुम बन जाओ
हथौड़ों की गूंज।
ठक-ठक कर हिलाते रहो;
जंग लगे बन्द दरवाज़ों की चूल।

बजो तो तुम नगाड़ों की तरह,
कि न कर पाये कोई बहरेपन का स्वांग।   
शब्दों तुम बरसो, 
बारिश की फुहार बन कर;
अरसे से बंजर पड़ी 
धरती पर, अरमान बन लहलहाओ।
ठस और ठोस
संकीर्ण और सतही,
मन की जड़ता को
तुम पंख दो शब्दो।

आकाश की तरलता में उड़ते रहें स्वप्न।
विस्तारती रहे सोच।
धूमकेतुओं की तरह
पड़ताल करती रहें नक्षत्रों की।

शब्दो! तुम काग़ज़ पर उकेरी गई
बेमतलब रेखाएं नहीं।
गढ़ो नई परिभाषाओं को।
-डॉ. प्रभा मुजुमदार

Saturday, January 13, 2018

पुरानी हुई कहानी...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

ज़िंदगी का फलसफा 
कुछ इस तरह समझा रही 
उम्र की क्या बिसात जो रोके 
जब हिम्मते जवानी छा गई !  

पोपली मुस्कान देखो 
हँस के यू फरमा रही 
जोश कब रोके रुका है 
हमको भी इबारत आ गई !  

जर्जर  बँधन खोल रही है 
अब ये वृद्ध जवानी 
घर से हमको बेघर करदे 
ये ....पुरानी हुई कहानी ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता

Friday, January 12, 2018

त्रिवेणी.....विभा रानी श्रीवास्तव

बड़ी दीदी की लिखी त्रिपदियाँ
चातक-चकोर को मदमस्त होते भी सुना है !
ज्वार-भाटे को उसे देख उफनते भी देखा है !

यूँ ही नहीं होता माशूकों को चाँद होने का गुमाँ !!
......
रब एक पलड़े पर ढेर सारे गम रख देता है !
दूसरे पलड़े पर छोटी सी ख़ुशी रख देता है !

महिमा तुलसी के पत्ते के समान हुई !!
......
टोकने वाले बहुत मिले राहों के गलियारों में !
जिन्हें गुमान था कि वही सयाने हैं टोली में !

कामयाबी पर होड़ में खड़े दे रहे बधाई मुझे !!
......
नफ़रत सुलगाती हैं ख़ौफ़ ए मंज़र
उल्फ़त मोड देती है नोक ए खंजर

क्यूँ बुनता है ताने बाने साज़िशों के हरदम

- विभारानी श्रीवास्तव

Thursday, January 11, 2018

अलाव....प्रतिमा भारती


हर तरह कर ली कोशिश
कि गुज़र जाए रात......
फिर भी ज़रूरत पड़ ही गयी
बुझती यादों के सायों की।
इन्हीं को जला के अलाव
की कोशिश
कुछ गरमाहट दें एहसासों को
कि नई किरण के साथ 
जग जाएँ रिश्ते ....
नई सुबह के लिए।।

-प्रतिमा भारती

Wednesday, January 10, 2018

जीवन और तुषार बूंद!! ....कुसुम कोठारी


निलंबन हुवा नीलाम्बर से 
भान हुवा अच्युताका कुछ क्षण
गिरी वृक्ष चोटी, इतराई 
फूलों पत्तों दूब पर देख 
अपनी शोभा मुस्काई, 
गर्व से अपना रूप मनोहर 
आत्म प्रशंसा भर लाया 
सूर्य की किरण पडी सुनहरी 
अहा शोभा द्विगुणीत हुई !
भाव अभिमान के थे अब उर्धमुखी 
हाँ, भूल गई "मैं "
अब निश्चय है अंतःपास मे 
मै तुषार बूंद नश्वर, भूली अपना रूप 
कभी आलंबन अंबर का 
कभी तृण सहारे सा अस्तित्व 
पर आश्रित नाशवान शरीर 
"मैं"आत्मा अविनाशी 
भूल गई क्यों शुद्ध स्वरूप। 
-कुसुम कोठारी


Tuesday, January 9, 2018

कुछ क्षणिकाएँ.....प्रतिमा भारती

सोंधी खुशबू
......................
शब्द गुमसुम हों तो क्या...।
हँसी की धूप दिखाओ ...
जितनी भी ...।
दर्द बरसेगा जब भी
मन के आँगन में...
हवा में होगी
उसकी सोंधी खुशबू...।।

नियति
.........................
जानती हूँ 
पहचानती भी हूँ
’नियति’
फिर भी ...

शब्दों का लबादा ओढ़े
वह...।
जल्लाद सी नज़र आती है ।।

दिल की बातें
..............................
आओ बैठें
कुछ अधलेटे कुछ उन्नीदे से
दिल की हरी नर्म ज़मीन पर....
सहलाएँ...नोचें...बिखराएँ ...फैलाएँ और उड़ाएँ
भावनाओं और संवेदनाओं की दूब...
बातें करें कुछ बिखरी बिखरी फैली बेतरतीब सी...
वैसी ही जैसी होती हैं बातें....
दिल से दिल के करीब की.....

बहाना
................................
मत कुरेदो ...
बहुत कुछ होगा अनावृत ...
बहुत कुछ ऐसा 
जो है
अनपेक्षित... , असहनीय..., अशोभनीय ...,
है मेरे भी भीतर
क्योंकि 
मेरे पास भी 
है बहाना 
इंसान होने का ।।
-प्रतिमा भारती


Monday, January 8, 2018

छह हाइकु.....विभा रानी श्रीवास्तव

1
ठूँठ का मैत्री
वल्लरी का सहारा
मर के जीया।
2
शीत में सरि
स्नेह छलकाती स्त्री
फिरोजा लगे।
3
गरीब खुशियाँ
बारम्बार जलाओ
बुझे दीप को।
4
क्षुधा साधन
ढूंढें गौ संग श्वान
मिलते शिशु।
5
आस बुनती
संस्कार सहेजती
सर्वानन्दी स्त्री।
सर्वानन्दी = जिसको सभी विषयों में आनंद हो 
6
स्त्री की त्रासदी
स्नेह की आलिंजर
प्रीत की प्यासी।
-विभा रानी श्रीवास्तव

Sunday, January 7, 2018

कठपुतली.....ज्योति साह


बना के कठपुतली नचाते रहो
रखो दोनों शिराओं को तलवे के नीचे
हमारा क्या है.....

तुम कहो तो हम उठें
तुम कहो तो बैठे

चाहो तो सांस लेने के भी
समय तय कर दो
और जब भी तुम बोलो
हम बजा दें ताली,

हाँ एक रस्सी भी 
बाँध दो टाँगों में
ताकि कहीं और का रूख 
ना कर सकें

बिठा दो पहरे आँखों पर
तुम्हारे दिखाये के सिवा 
कुछ देख ना सके,

सिल दो होंठ
कि तुम्हारे चाहे बिना
उसे हिला भी ना सकूं,

जकड़ दो पंखों को
कि लाख कोशिशों के बाद भी
स्वच्छन्द उड़ान भर ना सकूँ,

सुनो...
भले डाल दो काल-कोठारी में
बस एक झरोख़ा खुला रखना
ताकि जब निकले तुम्हारी झाँकी
झंडा फहराने को
तो जी भर उसे निहार सकूँ,

तुम्हारी जीत
और अपनी हार पे
सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ आँसू बहा सकूँ।


-ज्योति साह

Saturday, January 6, 2018

धूप के कुछ टुकड़े.....शिवराम के


पेड़ों की टहनियों से
धूप के टुकड़ों सा, तुम्हारी यादें
छनकर मेरे स्मृति पटल पर
सिमट जाती है.
आती हो अक्सर कुछ इसी तरह, फिर
हल्की हवा के चलने पर
टहनियों के इधर से उधर होने पर
दो पत्तियों के बीच
किसी  तीसरी पत्ती के आने से
रोशनी का कारवां
कुछ पल मानो कहीं खो सी जाती है/
धूप के कुछ टुकड़े
माना कि आंखों पर लगते हैं
त्वचा पर चुभते हैं
मस्तिष्क को भी बेचैन रखते हैं.
लेकिन... धूप के यही कुछ टुकड़े
सुकून देते हैं
जब जब कभी झुरमुट से  छनकर
स्मृति पटल पर सिमट जाते हैं.
सब कुछ ठीक वैसे ही लगता है
जैसे तुम किसी अंधेरी गली से निकल कर
इस मन से लिपट जाते हो
न जाने क्या कुछ इस मन को दे जाते हो.
धूप के ये कुछ टुकड़े न जाने क्यों
अंधेरी रात में नहीं आते
नहीं आते तुम भी
जब कभी जीवन के आकाश में
बादल बिखरे होते हैं.

- शिवराम के

Friday, January 5, 2018

मैं उसकी माँ हूँ....रश्मि भटनागर


पहली बार जब उसे छुआ,
लगा..ओस में भींगे गुलाब को छुआ..! 
उसकी चमकती आँखों ने हर बार 
मेरी आँखों में पालते सपनों को छुआ। 

दुःख की तेज़ हवाओं में उसने 
हर बार हौले से मेरे कंधे को छुआ,
उसकी हर छुअन ने हर बार 
मेरी उड़ान और हौसले को छुआ। 

उलझी-उलझी उलझनों में सदा 
उसकी सही सोच ने मेरी समझ को छुआ। 
उसके दिल ने हर बार 
मेरे दिल की धड़कनों को छुआ। 

इसीलिए मैं अब तक ज़िंदा हूँ 
क्योंकि...वो मेरी बेटी है...और 
मैं उसकी माँ हूँ।  

-रश्मि भटनागर

Thursday, January 4, 2018

फ़स्ल काँटों की पहले आती है....सचिन अग्रवाल

ज़ुल्म पर जब शबाब आएगा
देखना इंक़लाब आएगा

उसकी ज़िद है तो टूट जाने दे
कल कोई और ख़्वाब आएगा

मौत! डर इसलिए भी लगता है
उम्र भर का हिसाब आएगा

इन अंधेरे को कौन समझाए
सुबह फिर आफ़ताब आएगा

फ़स्ल काँटों की पहले आती है
तब कहीं इक गुलाब आएगा
-सचिन अग्रवाल
नए मरासिम से

Wednesday, January 3, 2018

मैं जा रहा हूँ मेरा इन्तेज़ार मत करना....अनवर जलालपुरी

मशहूर शायर ज़नाब अनवर जलालपुरी का कल दिन को 10 दस बजे लखनऊ में इन्तेकाल हो गया
आज उनके शहर जलालपुर में सुपुर्देख़ाक किया जाएगा
06 जुलाई 1947 - 02 जनवरी 2018
मैं जा रहा हूँ मेरा इन्तेज़ार मत करना
मेरे लिये कभी भी दिल सोगवार मत करना

मेरी जुदाई तेरे दिल की आज़माइश है
इस आइने को कभी शर्मसार मत करना

फ़क़ीर बन के मिले इस अहद के रावण
मेरे ख़याल की रेखा को पार मत करना

ज़माने वाले बज़ाहिर तो सबके हैं हमदर्द
ज़माने वालों का तुम ऐतबार मत करना

ख़रीद देना खिलौने तमाम बच्चों को
तुम उन पे मेरा आश्कार मत करना

मैं एक रोज़ बहरहाल लौट आऊँगा
तुम उँगुलियों पे मगर दिन शुमार मत करना
-अनवर जलालपुरी

Tuesday, January 2, 2018

एक सौदा था जिसने सर छोड़ा....शीन काफ़ निज़ाम

अक्स ने आईने का घर छोड़ा
एक सौदा था जिसने सर छोड़ा

भागते मंज़रों ने आंखों में
ज़िस्म को सिर्फ़ आंख भर छोड़ा

हर तरफ़ रोशनी फैल गई
सांप ने जब खंडहर छोड़ा

धूल उड़ती है धूप बैठी है
ओस ने आंसुओं का घर छोड़ा

खिड़कियाँ पीटती है सर शब भर
आखिरी फ़र्द ने भी घर छोड़ा

क्या करोगा निज़ाम रातों में
ज़ख़्म की याद ने अगर छोड़ा
-शीन काफ़ निज़ाम

Monday, January 1, 2018

कौन है हमसे बढ़के....केशव शरण

क्यों नसीबों की बात करते हैं
जब ग़रीबों की बात करते हैं 

फिर कहेंगे हमें उठाने को
वो सलीबों की बात करते हैं 

किनके अल्फ़ाज़ सबसे झूठे हैं
क्या अदीबों की बात करते हैं

जाइये मत अभी रक़ीबों पर
हम हबीबों की बात करते हैं 

कौन है हमसे बढ़के, आप अगर
बदनसीबों की बात करते हैं
-केशव शरण