Wednesday, November 21, 2018

तेरे नेह में....श्वेता सिन्हा

तुमसे मिलकर कौन सी बातें करनी थी मैं भूल गयी
शब्द चाँदनी बनके झर गये हृदय मालिनी फूल गयी

मोहनी फेरी कौन सी तुमने डोर न जाने कैसा बाँधा
तेरे सम्मोहन के मोह में सुध-बुध जग भी भूल गयी

मन उलझे मन सागर में लहरों ने लाँघें तटबंधों को
सारी उमर का जप-तप नियम पल-दो-पल में भूल गयी

बूँदे बरसी अमृत घुलकर संगीत शिला से फूट पड़े
कल-कल बहती रसधारा में रिसते घावों को भूल गयी

तुम साथ रहो तेरा साथ रहे बस इतना ही चाहूँ तुमसे
मन मंदिर के तुम ईश मेरे तेरे नेह में ईश को भूल गयी

-श्वेता सिन्हा

Tuesday, November 20, 2018

लिबास....गौरव धूत

लिबास जो पहना था साल भर,
उम्र ने अब उतार कर रख दिया,
और साथ में उतार दिए,
वो गिनती के दिन, जो मुझे दिए थे,
कह कर के ये तेरा हिस्सा है,
इनको जिस मर्ज़ी खर्च कर।
बचा तो ना पाया मैं एक दिन भी,
पर जाने कहाँ उनको दे आया हूँ।
खुशियाँ तो नहीं खरीदी मैंने उनसे,
ना ही किसी के दुख बाँटे मैंने,
हाँ, कभी निकाले थे कुछ दिन,
किसी आरज़ू के लिए,
शायद बाक़ी किश्तें भरता रहा हूँ,
उसके पूरी होने के इंतज़ार में।
-गौरव धूत

Monday, November 19, 2018

नन्ही ख़्वाहिश....श्वेता सिन्हा

एक नन्ही ख़्वाहिश 
चाँदनी को अंजुरी में भरने की,
पिघलकर उंगलियों से टपकती
अंधेरे में ग़ुम होती 
चाँदनी देखकर
उदास रात के दामन में
पसरा है मातमी सन्नाटा 
ठंड़ी छत को छूकर सर्द किरणें
जगाती है बर्फीला एहसास
कुहासे जैसे घने बादलों का
काफिला आकर 
ठहरा है गलियों में
पीली रोशनी में
नम नीरवता पाँव पसारती
पल-पल गहराती
पत्तियों की ओट में मद्धिम
फीका सा चाँद
अपने अस्तित्व के लिए लड़ता
तन्हा रातभर भटकेगा 
कंपकपाती नरम रेशमी दुशाला 
 तन पर लिपटाये
मौसम की बेरूखी से सहमे
शबनमी सितारे उतरे हैं
फूलों के गालों पर
भींगी रात की भरी पलकें
सोचती है 
क्यूँ न बंद कर पायी
आँखों के पिटारे में
कतरनें चाँदनी की, 
अधूरी ख़्वाहिशें 
अक्सर बिखरकर 
रात के दामन में 
यही सवाल पूछती हैं।
-श्वेता सिन्हा

Sunday, November 18, 2018

क्षणिकाएँ..... पुरूषोत्तम व्यास

-१-
बैठा रहता

बहती धारा...
जिसको कविता कहता
दूर न पास
अंदर न बाहर
अपने आप में पूर्ण..

चलना कितना
दूर उसको ले आता
दरवाज़े के उस पार
आसमान नीलम-सा
मौन..
कविता गाता...।


-२-
प्रेम-कहानी

पढ़ने में
मुझें डर लगता...

क्योंकि
चमकते हुये तारों
और-
टूट के गिरते तारों में
फरक समझता हूँ...।


-३-
प्रेम...

कहते है ...
हर एक को होता और..
वह उड़ता रहता उसी
डगर में..

एक झलक ..देख
खिल उठता ..
इंद्रधनुष!

-पुरुषोत्तम व्यास

Saturday, November 17, 2018

अनायास ही गुम हो जाते हैंं...श्वेता सिन्हा

साँझ को नभ के दालान से
पहाड़ी के कोहान पर फिसलकर
क्षितिज की बाहों में समाता सिंदुरिया सूरज,
किरणों के गुलाबी गुच्छे
टकटकी बाँधें खड़े पेड़ों के पीछे उलझकर
बिखरकर पत्तों पर
अनायास ही गुम हो जाते हैंं,
गगन के स्लेटी कोने से उतरकर
मन में धीरे-धीरे समाता विराट मौन
अपनी धड़कन की पदचाप सुनकर चिंहुकती
अपनी पलकों के झपकने के लय में गुम
महसूस करती हूँ एकांत का संगीत
चुपके से नयनों को ढापती
स्मृतियों की उंगली थामे
मैं स्वयं स्मृति हो जाती हूँ
एक पल स्वच्छंद हो 
निर्भीक उड़कर 
सारा सुख पा लेती हूँ,
नभमंडल पर विचरती चंचल पंख फैलाये
भूलकर सीमाएँ
कल्पवृक्ष पर लगे मधुर पल चखती
सितारों के वन में भटकती
अमृत-घट की एक बूँद की लालसा में
तपती मरुभूमि में अनवरत,
दिव्य-गान हृदय के भावों का सुनती
विभोर सुधि बिसराये
घुलकर चाँदनी की रजत रश्मियों में
एकाकार हो जाती हूँ
तन-मन के बंधनों से मुक्त निमग्न 
सोमरस के मधुमय घूँट पी
कड़वे क्षणों को विस्मृत कर
चाहती हूँ अपने
एकांत के इस उत्सव में
तुम्हारी स्मृतियों का
चिर स्पंदन।

-श्वेता सिन्हा

Friday, November 16, 2018

नई आस्तीन - शकील आज़मी


न मेरे ज़हर में तल्ख़ी रही वो पहली सी 
बदन में उस के भी पहला सा ज़ाइक़ा/ज़ायका न रहा 

हमारे बीच जो रिश्ते थे सब तमाम हुए 
बस एक रस्म बची है शिकस्ता पुल की तरह

कभी-कभार जवाब भी हमें मिलाती है 
मगर ये रस्म भी इक रोज़ टूट जाएगी 

अब उस का जिस्म नए साँप की तलाश में है 
मिरी हवस भी नई आस्तीन ढूँढती है 
- शकील आज़मी




Thursday, November 15, 2018

नदिया, ताल, समंदर आए....सिब्बन बैजी

कुछ फिकरे, कुछ पत्थर आए
सच कहकर हम जब घर आए

हमसे लोटा डोर मांगने
नदिया, ताल, समंदर आए

मलबों की मातमपुर्शी को
कितने ही बुलडोजर आए

शिकरों की दावत में अक्सर
तीतर, बया, कबूतर आए

'सिब्बन' की रातों से मिलने
सूफी शाह कलंदर आए.
-सिब्बन बैजी

Wednesday, November 14, 2018

लफ़्ज़ मेरे तौलने लगे......श्वेता सिन्हा

अच्छा हुआ कि लोग गिरह खोलने लगे।
दिल के ज़हर शिगाफ़े-लब से घोलने लगे।।

पलकों से बूंद-बूंद गिरी ख़्वाहिशें तमाम।
उम्रे-रवाँ के  ख़्वाब  सारे  डोलने  लगे।।

ख़ुश देखकर मुझे वो परेश़ान हो  गये।
फिर यूँ हुआ हर लफ़्ज़ मेरे तौलने लगे।।

मैंने ज़रा-सी खोल दी  मुट्ठी भरी  हुई।
तश्ते-फ़लक पर  तारे रंग घोलने लगे।।

सिसकियाँ सुनता नहीं सूना हुआ शहर।
हँस के जो बात की तो लोग बोलने लगे।।

          #श्वेता सिन्हा


शिग़ाफ़े-लब=होंठ की दरार, उम्रे-रवाँ=बहती उम्र
तश्ते-फ़लक=आसमां की तश्तरी

Tuesday, November 13, 2018

सामने कारनामे जो आने लगे - अर्पित शर्मा "अर्पित"

सामने कारनामे जो आने लगे,
आईना लोग मुझको दिखाने लगे |

जो समय पर ये बच्चे ना आने लगे, 
अपने माँ बाप का दिल दुखाने लगे |

फ़ैसला लौट जाने का तुम छोड़ दो, 
फूल आँगन के आँसू बहाने लगे |

फिर शबे हिज़्र आँसूं मेरी आँख के, 
मुझको मेरी कहानी सुनाने लगे |

आईने से भी रहते है वो दूर अब,
जाने क्यू खुदको इतना छुपाने लगे |

कोई शिकवा नही बेरुखी तो नही,
हम अभी आये है आप जाने लगे |

तेरी चाहत लिए घर से अर्पित चला, 
सारे मंज़र नज़र को सुहाने लगे 
- अर्पित शर्मा "अर्पित"

परिचय
अर्पित शर्मा जी अर्पित उपनाम से रचनाये लिखते है आपके पिता का नाम कृष्णकांत शर्मा है | 
आपका जन्म मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में 
28 अप्रैल, 1992 को हुआ | फिलहाल आप 
शाजापुर में रहते है | आपसे इस मेल sharmaarpit28@gmail.com 
पर संपर्क किया जा सकता है |

Monday, November 12, 2018

है दीवाली-मिलन में ज़रूरी 'नज़ीर' .....नजीर बनारसी

जखीरा, साहित्य संग्रह | Jakhira, literature Collection | urdu hindi shayari collection
घर की किस्मत जगी घर में आए सजन
ऐसे महके बदन जैसे चंदन का बन 

आज धरती पे है स्वर्ग का बाँकपन 
अप्सराएँ न क्यूँ गाएँ मंगलाचरण 

ज़िंदगी से है हैरान यमराज भी 
आज हर दीप अँधेरे पे है ख़ंदा-ज़न 

उन के क़दमों से फूल और फुल-वारियाँ 
आगमन उन का मधुमास का आगमन 

उस को सब कुछ मिला जिस को वो मिल गए 
वो हैं बे-आस की आस निर्धन के धन 

है दीवाली का त्यौहार जितना शरीफ़ 
शहर की बिजलियाँ उतनी ही बद-चलन 

उन से अच्छे तो माटी के कोरे दिए 
जिन से दहलीज़ रौशन है आँगन चमन 

कौड़ियाँ दाँव की चित पड़ें चाहे पट 
जीत तो उस की है जिस की पड़ जाए बन 

है दीवाली-मिलन में ज़रूरी 'नज़ीर' 
हाथ मिलने से पहले दिलों का मिलन 
- नजीर बनारसी

Sunday, November 11, 2018

अँधेरे अँधेरों मे खो गए !!...मंजू मिश्रा

मुट्ठी भर दिए
मील भर अँधेरों को
चुनौती देते हैं
शान से हँसते हैं
और अँधेरे
मन मसोस कर रह जाते हैं
-:-
यही तो है
असली ताकत
उजाले की
जब नन्ही सी रेख
चीर देती है सीना अँधेरे का
और अँधेरे देखते रह जाते हैं
-:-
अँधेरों का हठ
तोड़ने की ठान ली जब
उस नन्हे से माटी के दिए ने
हवाएँ अाँधियाँ बन कर खूब चलीं
मगर वो जाँबाज डरा नहीं डटा रहा
और फिर उजाले के जशन में
अँधेरे अँधेरों मे खो गए !!
-मंजू मिश्रा

Saturday, November 10, 2018

छठ पर्व का उत्तर भारत में उल्लास

कार्तिक शुक्ल की षष्ठी के पावन उत्सव, 
छठ पर्व का उत्तर भारत में उल्लास!  

पटना के घाट पर हमहू अर्जिया देबइ, हे छठी मैया 
हम ना जाईब दूसर घाट देखब ये छठी मैया!! 
ऐसे ही अन्य भक्ति गीतों के साथ आरम्भ हो चुका है उत्तर और पूर्व भारत के कई हिस्सों में छठ पूजा का खुमार। हर साल दिवाली का पवित्र त्यौहार ख़त्म होते ही एक हफ्ते बाद शुरू होता है छठ पूजा का पवित्र त्यौहार जिसे पूरे रीति रिवाजों के साथ भारत के कई हिस्सों में मनाया जाता है, खासकर कि बिहार, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में। छठ पर्व को नेपाल के भी कई हिस्सों में पूरी भक्ति भावना के साथ मनाया जाता है। 
 छठ पूजा या छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना 
के इस अनुपम लोकपर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी द्वारा भी मनाते हुए देखा गया है। 
आज की तारीख में धीरे-धीरे यह पर्व भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर मे प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है। बिहार, उत्तरप्रदेश और झारखण्ड में इस पर्व की एक अलग ही महत्ता है।अन्य त्यौहारों के साथ-साथ छठ पूजा की भी तैयारियां साल के शुरुआत से ही होने लगती है। दिवाली का पावन अवसर ख़त्म होते ही लोग छठ पूजा की तैयारी में लग जाते हैं। नदी के घाटों को कई संस्थानों व सरकारी कर्मचारियों द्वारा साफ़ कर पूजा के लिए तैयार किया जाता है। छठ पूजा का यह रंगीन त्यौहार 4 दिनों तक चलता है। चलिए आज हम इस पावन पर्व की कुछ खूबसूरत तस्वीरों के साथ जानते हैं इसकी धार्मिक महत्ता को! 
छठ पूजा का नाम कैसे पड़ा?
छठ पूजा का नाम कैसे पड़ा? 
छठ पर्व, छठ या षष्ठी नाम से बना है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नाम छठ व्रत हो गया। 
लोक आस्था का पवित्र त्यौहार  
लोक आस्था का पवित्र त्यौहार 
छठ पर्व सूर्योपासना का प्रसिद्द पर्व है। 
इस पर्व को दो बार मनाया जाता है, पहले 
चैत के महीने में और दूसरी बार कार्तिक के महीने में। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्तिके 
लिए यह पर्व मनाया जाता है। स्त्री और
पुरुष दोनों ही सामान रूप से इस पर्व को मानते हैं। 
इस दिन सूर्य देवता के साथ-साथ षष्ठी देवी, 
यानि छठी मैया की भी पूजा की जाती है। 
ये लोक के समस्त बालकों की रक्षिका देवी है। 
प्रकृति का छठा अंश होने के कारण 
इनका एक नाम "षष्ठी" है।  

छठ पूजा की कथा छठ पूजा से सम्बंधित कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथानुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में 
हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी 
हुईं तथा पांडवोंको राजपाट वापस मिल गया। छठ पर्वकी परंपरा 
में बहुत ही गहरा विज्ञान भी छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) 
एक विशेष खगोलीय अवसर है। 
छठ पूजा की कथा


छठ पूजा की कथा 
दूसरी कथानुसार, प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत के कोई संतान न थी। एक बार महाराज ने महर्षि कश्यप से दुख व्यक्त कर पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने पुत्रेष्टि यज्ञ का परामर्श दिया। यज्ञ के फलस्वरूप महारानी को पुत्र जन्म हुआ, किंतु वह शिशु मृत था। पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया। महाराज शिशु के मृत शरीर को अपने वक्ष से लगाये प्रलाप कर रहे थे, तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सभी ने देखा आकाश से एक विमान पृथ्वी पर आ रहा है। विमान में एक ज्योर्तिमय दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजा द्वारा स्तुति करने पर देवी ने कहा- मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी हूँ। मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूँ और अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ। देवी ने शिशु के मृत शरीर को स्पर्श किया जिससे वह बालक जीवित हो उठा। महाराज की प्रसन्नता की सीमा न रही। वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे। राज्य में प्रति मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी को षष्ठी-महोत्सव के रूप में मनाया जाए-राजा ने ऐसी घोषणा करवा दी। 
छठ पूजा की विधी

छठ पूजा की विधी नहाय खाय: 
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन घर की सफाई कर, नहा धोकर शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। भोजन में मुख्य रूप से कद्दू,चने की दाल और चावल बनाये जाते हैं।

छठ पूजा की विधी

छठ पूजा की विधी खरना: दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं, इसे खरना कहा जाता है। गुड़ की या गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर 
और रोटी प्रसाद स्वरुप बनाया जाता है और आस पास के लोगों को निमंत्रित कर उन्हें परोसा जाता है। इन सारी विधियों के दौरान साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है।
छठ पूजा की विधी

छठ पूजा की विधी संध्या अर्घ्य: तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सुबह से छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है, जिसमें ठेकुआ, चावल के
 लड्डू ज़रूर ही होते हैं। दिन के 2 या 3 बजे से शाम के अर्घ्य के लिए घाट जाने की तयारी शुरू हो जाती है।


Friday, November 9, 2018

भाई-बहन....गोपाल सिंह नेपाली

भाई-बहन....गोपाल सिंह नेपाली
तू चिनगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूँ,
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,
आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,
तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,
यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,
तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।

बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू ममता की गोद बनी,
मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,
मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,
भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनी
यह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।
जननी की जंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना ।

भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गंगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,
पागल घड़ी, बहन-भाई है, वह आजाद तराना है ।
मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है ।

-गोपाल सिंह नेपाली

Wednesday, November 7, 2018

सुलग सुलग री जोत...माखन लाल चतुर्वेदी



सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें।

लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में
लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में
लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में
लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में
लक्ष्मी सर्जन हुआ
कमल के फूलों में
लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।

गिरि, वन, नद-सागर, भू-नर्तन तेरा नित्य विहार
सतत मानवी की अँगुलियों तेरा हो शृंगार
मानव की गति, मानव की धृति, मानव की कृति ढाल
सदा स्वेद-कण के मोती से चमके मेरा भाल
शकट चले जलयान चले
गतिमान गगन के गान
तू मिहनत से झर-झर पड़ती, गढ़ती नित्य विहान।।

उषा महावर तुझे लगाती, संध्या शोभा वारे
रानी रजनी पल-पल दीपक से आरती उतारे,
सिर बोकर, सिर ऊँचा कर-कर, सिर हथेलियों लेकर
गान और बलिदान किए मानव-अर्चना सँजोकर
भवन-भवन तेरा मंदिर है
स्वर है श्रम की वाणी
राज रही है कालरात्रि को उज्ज्वल कर कल्याणी।।

वह नवांत आ गए खेत से सूख गया है पानी
खेतों की बरसन कि गगन की बरसन किए पुरानी
सजा रहे हैं फुलझड़ियों से जादू करके खेल
आज हुआ श्रम-सीकर के घर हमसे उनसे मेल।
तू ही जगत की जय है,
तू है बुद्धिमयी वरदात्री
तू धात्री, तू भू-नव गात्री, सूझ-बूझ निर्मात्री।।

युग के दीप नए मानव, मानवी ढलें
सुलग-सुलग री जोत! दीप से दीप जलें।

-माखन लाल चतुर्वेदी

Tuesday, November 6, 2018

इतिहास...जो सच है......

ये सत्य इतिहास है जो मुगलों और नकली परिवार की वजह से नही जानते लोग!!
हिंदू धर्म ग्रंथ नहींं कहते कि देवी को शराब चढ़ाई जाये..,ग्रंथ नहींं कहते की शराब पीना ही क्षत्रिय धर्म है.. ये सिर्फ़ एक मुग़लों की साजिश थी हिंदुओं को कमजोर करने की ! जानिये एक अनकही ऐतिहासिक घटना...
"एक षड्यंत्र और शराब की घातकता....
" कैसे हिंदुओं की सुरक्षा प्राचीर को ध्वस्त किया मुग़लों ने ?? जानिये और फिर सुधार कीजिये !!
मुगल बादशाह का दिल्ली में दरबार लगा था और हिंदुस्तान के दूर दूर के राजा महाराजा दरबार में हाजिर थे , उसी दौरान मुगल बादशाह ने एक दम्भोक्ति की "है कोई हमसे बहादुर इस दुनिया में ?" सभा में सन्नाटा सा पसर गया ,एक बार फिर वही दोहराया गया ! तीसरी बार फिर उसने ख़ुशी से चिल्ला कर कहा "है कोई हमसे बहादुर जो हिंदुस्तान पर सल्तनत कायम कर सके ??
सभा की खामोशी तोड़ती एक बुलन्द शेर सी दहाड़ गूंजी तो सबका ध्यान उस शख्स की और गया ! वो जोधपुर के महाराजा राव रिड़मल थे !
रिड़मल जी ने कहा, "मुग़लों में बहादुरी नहींं कुटिलता है..., सबसे बहादुर तो राजपूत है दुनियाँ में,मुगलो ने राजपूतो को आपस में लड़वा कर हिंदुस्तान पर राज किया ! कभी सिसोदिया राणा वंश को कछावा जयपुर से तो कभी राठोड़ो को दूसरे राजपूतो से...।
बादशाह का मुँह देखने लायक था , ऐसा लगा जैसे किसी ने चोरी करते रंगे हाथो पकड़ लिया हो । "बाते मत करो राव...उदाहरण दो वीरता का ।" रिड़मल ने कहा "क्या किसी कौम में देखा है किसी को सिर कटने के बाद भी लड़ते हुए ??"
बादशाह बोला ये तो सुनी हुई बात है देखा तो नही ,रिड़मल बोले " इतिहास उठाकर देख लो कितने वीरोंं की कहानियांं है सिर कटने के बाद भी लड़ने की ... "
बादशाह हंसा और दरबार में बैठे कवियों की और देखकर बोला "इतिहास लिखने वाले तो मंगते होते है में भी 100 मुगलोंं के नाम लिखवा दूँ इसमें क्या ? मुझे तो जिन्दा ऐसा राजपूत बताओ जो कहे की मेरा सिर काट दो में फिर भी लड़ूंगा ।" राव रिड़मल निरुत्तर हो गए और गहरे सोच में डूब गए । रात को सोचते सोचते अचानक उनको रोहणी ठिकाने के जागीरदार का ख्याल आया । रात को 11 बजे रोहणी ठिकाना (जो की जेतारण कस्बे जोधपुर रियासत) में दो घुड़सवार बुजुर्ग जागीरदार के पोल पर पहुंचे और मिलने की इजाजत मांगी । ठाकुर साहब काफी वृद्ध अवस्था में थे फिर भी उठ कर मेहमान की आवभगत के लिए बाहर पोल पर आये ,, घुड़सवारों ने प्रणाम किया और वृद्ध ठाकुर की आँखों में चमक सी उभरी और मुस्कराते हुए बोले " जोधपुर महाराज... आपको मैंने गोद में खिलाया है और अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दी है.. इस तरह भेष बदलने पर भी में आपको आवाज से पहचान गया हूँ । हुकम आप अंदर पधारो ... मैं आपकी रियासत का छोटा सा जागीरदार, आपने मुझे ही बुलवा लिया होता । राव रिड़मल ने उनको झुककर प्रणाम किया और बोले एक समस्या है , और बादशाह के दरबार की पूरी कहानी सुना दी, अब आप ही बताये की जीवित योद्धा का कैसे पता चले की ये लड़ाई में सिर कटने के बाद भी लड़ेगा ? रोहणी जागीदार बोले ," बस इतनी सी बात..मेरे दोनों बच्चे सिर कटने के बाद भी लड़ेंगे और आप दोनों को ले जाओ दिल्ली दरबार में ये आपकी और रजपूती की लाज जरूर रखेंगे " राव रिड़मल को घोर आश्चर्य हुआ कि एक पिता को कितना विश्वास है अपने बच्चो पर.. , मान गए राजपूती धर्म को । सुबह जल्दी दोनों बच्चे अपने अपने घोड़ो के साथ तैयार थे! उसी समय ठाकुर साहब ने कहा ," महाराज थोडा रुकिए में एक बार इनकी माँ से भी कुछ चर्चा कर लूँ इस बारे में ।" राव रिड़मल ने सोचा आखिर पिता का ह्रदय है कैसे मानेगा अपने दोनों जवान बच्चो के सिर कटवाने को , एक बार रिड़मल जी ने सोचा की मुझे दोनों बच्चो को यही छोड़कर चले जाना चाहिए । ठाकुर साहब ने ठकुरानी जी को कहा " आपके दोनों बच्चो को दिल्ली मुगल बादशाह के दरबार में भेज रहा हूँ सिर कटवाने को , दोनों में से कौनसा सिर कटने के बाद भी लड़ सकता है ? आप माँ हो आपको ज्यादा पता होगा ! ठकुरानी जी ने कहा बड़ा लड़का तो क़िले और क़िले के बाहर तक भी लड़ लेगा पर छोटा केवल परकोटे में ही लड़ सकता है क्योंकि पैदा होते ही इसको मेरा दूध नही मिला था।। लड़ दोनों ही सकते है ,आप निश्चित् होकर भेज दो । दिल्ली के दरबार में आज कुछ विशेष भीड़ थी और हजारो लोग इस द्रश्य को देखने जमा थे । बड़े लड़के को मैदान में लाया गया और मुगल बादशाह ने जल्लादो को आदेश दिया की इसकी गर्दन उड़ा दो..… तभी बीकानेर महाराजा बोले "ये क्या तमाशा है ? राजपूती इतनी भी सस्ती नही हुई है , लड़ाई का मोका दो और फिर देखो कौन बहादुर है ? बादशाह ने खुद के सबसे मजबूत और कुशल योद्धा बुलाये और कहा ये जो घुड़सवार मैदान में खड़ा है उसका सिर् काट दो... 20 घुड़सवारों को दल रोहणी ठाकुर के बड़े लड़के का सिर उतारने को लपका और देखते ही देखते उन 20 घुड़सवारों की लाशें मैदान में बिछ गयी । दूसरा दस्ता आगे बढ़ा और उसका भी वही हाल हुआ , मुगलो मे घबराहट और झुरझरि फेल गयी ,इसी तरह बादशाह के 500 सबसे ख़ास योद्धाओ की लाशें मैदान में पड़ी थी और उस वीर राजपूत योद्धा के तलवार की खरोंच भी नही आई ।
ये देख कर मुगल सेनापति ने कहा " 500 मुगल बीबियाँ विधवा कर दी आपकी इस परीक्षा ने अब और मत कीजिये हजुर , इस काफ़िर को गोली मरवाईए हजुर... तलवार से ये नही मरेगा ... कुटिलता और मक्कारी से भरे मुगलो ने उस वीर के सिर में गोलिया मार दी । सिर के परखचे उड़ चुके थे पर धड़ ने तलवार की मजबूती कम नही करी और मुगलो का कत्लेआम खतरनाक रूप से चलते रहा । बादशाह ने छोटे भाई को अपने पास निहथे बेठा रखा था ये सोच कर की यदि ये बड़ा यदि बहादुर निकला तो इस छोटे को कोई जागीर दे कर अपनी सेना में भर्ती कर लूंगा लेकिन जब छोटे ने ये अंन्याय देखा तो उसने झपटकर बादशाह की तलवार निकाल ली । उसी समय बादशाह के अंगरक्षकों ने उनकी गर्दन काट दी फिर भी धड़ तलवार चलाता गया और अंगरक्षकों समेत मुगलो का काल बन गए । बादशाह भाग कर कमरे में छुप गया और बाहर मैदान में बड़े भाई और अंदर परकोटे में छोटे भाई का पराक्रम देखते ही बनता था । हजारो की संख्या में मुगल हताहत हो चुके थे और आगे का कुछ पता नही था ।
बादशाह ने चिल्ला कर कहा अरे कोई रोको इनको..। एक मौलवी आगे आया और बोला इन पर शराब छिड़क दो ।। राजपूत का इष्ट कमजोर करना हो तो शराब का उपयोग करो। दोनों भाइयो पर शराब छिड़की गयी ऐसा करते ही दोनों के शरीर ठन्डे पड़ गए । मौलवी ने बादशाह को कहा " हजुर ये लड़ने वाला इनका शरीर नही बल्कि इनका इष्ट देवी है और ये राजपूत शराब से दूर रहते है और अपने धर्म और इष्ट को  मजबूत रखते है ।
यदि मुगलो को हिन्दुस्तान पर शासन करना है तो इनका इष्ट और धर्म भृष्ट करो और इनमे दारु शराब की लत लगाओ ।। यदि मुगलो में ये कमियां हटा दे तो मुगल भी मजबूत बन जाएंगे । उसके बाद से ही राजपूतो में मुगलो ने शराब का प्रचलन चलाया और धीरे धीरे राजपूत शराब में डूबते गए और अपनी इष्ट देवी को नाराज करते गए । और मुगलो ने मुसलमानो को कसम खिलवाई की शराब पीने के बाद नमाज नही पढ़ी जा सकती, इस्लाम में शराब हराम है । इसलिए इससे दूर रहिये ।
मांसाहार जैसी राक्षसी प्रवृत्ति पर गर्व करने वाले राजपूतों को यदि ज्ञात हो तो बताएं और आत्म मंथन करें कि महाराणा प्रताप की बेटी की मृत्यु जंगल में भूख से हुई थी क्यों ...? यदि वो मांसाहारी होते तो जंगल में उन्हें जानवरों की कमी थी क्या मार कर खाने के लिए...? इसका मतलब कि राजपूत हमेशा शाकाहारी थे केवल कुछ स्वार्थी राजपूतों ने जिन्होंने मुगलों की आधिनता स्वीकार कर ली थी वे मुगलों को खुश करने के लिए उनके साथ मांसाहार करने लगे और अपने आप को मुगलों का विश्वासपात्र साबित करने की होड़ में गिरते चले गये । हिन्दू भाइयो ये सच्ची घटना है और हमे हिन्दू समाज को इस कुरीति से दूर करना होगा ।
 तब ही हम पुनः खोया वैभव पा सकेंगे और हिन्दू धर्म की रक्षा कर सकेंगे, जब हम धर्म की रक्षा करेंगे तब धर्म हमारी रक्षा करेगा......
।। वन्दे मातरम् ।।

Monday, November 5, 2018

जीने के इरादे करे...

हम क्यों रचें
अपने प्यार के इर्दगिर्द
एक स्वप्न-संसार?
क्यों हम नामुमकिन वादें करें?

क्यों ताजमहल को ही सबूत मानें
बेपनाह मोहब्बतों का?
करें क्यों हम भी वही
जो शाहजहां या शहज़ादे करें?

प्यार अनुभूति है नाजुक-सी
कोई बोझ तो नहीं
जो हम हर कहीं
हर घड़ी लादें फिरें।

आसमानों के सपनें तो फरेबी हैं
आओ कि...
हम इसी ज़मीं पर
जीने के इरादे करें।

मन की उपज


Sunday, November 4, 2018

तितली-सा फुदका मन....श्वेता सिन्हा

धूप की उंगलियों ने 
छू लिया अलसाया तन 
सर्द हवाओं की शरारतों से
तितली-सा फुदका मन

तन्वंगी कनक के बाणों से
कट गये कुहरीले पाश
बिखरी गंध शिराओं में
मधुवन में फैला मधुमास

मन मालिन्य धुल गया
झर-झर झरती निर्झरी 
कस्तूरी-सा मन भरमाये
कंटीली बबूल छवि रसभरी

वनपंखी चीं-चीं बतियाये
लहरों पर गिरी चाँदी हार
अंबर के गुलाबी देह से फूट
अंकुराई धरा, जागा है संसार

-श्वेता

Saturday, November 3, 2018

माँ है अनुपम....डॉ. कनिका वर्मा

माँ है अनुपम
माँ है अद्भुत


माँ ने नीर बन
मेरी जड़ों को सींचा
और उसी पानी से
मेरे कुकर्म धोए


माँ ने वायु बन
मेरे सपनों को उड़ान दी
और उसी हवा से
मेरे दोषों को उड़ा दिया


माँ ने अग्नि बन
मेरी अभिलाषाओं को ज्वलित किया
और उसी अनल में
मेरी वासनाओं को दहन किया


माँ ने वसुधा बन
मेरी आकांक्षाओं का पालन किया
और उसी भूमि में
मेरे अपराधों को दबा दिया


माँ ने व्योम बन
मेरी आत्मा को ऊर्जित किया
और उसी अनन्त में 
मुझे बोझमुक्त किया


माँ है अनुपम
माँ है अद्भुत

-डॉ. कनिका वर्मा

Friday, November 2, 2018

दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही ....निदा फ़ाज़ली


दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही 
दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही 

चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें 
ज़िन्दगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही 

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी 
रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही 

फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को 
दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही 

शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की फ़ुरसत 
अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने-हँसाने से रही
-निदा फ़ाज़ली

Thursday, November 1, 2018

ऊपर फैला है आकाश....अज्ञेय

ऊपर फैला है आकाश, भरा तारों से- अज्ञेय
ऊपर फैला है आकाश,भरा तारों से
भार-मुक्त से तिर जाते हैं 
पंछी डैने बिना फैलाये । 
जी होता है मैं सहसा गा उठूँ 
उमगते स्वर
जो कभी नहीं भीतर से फूटे
कभी नहीं जो मैं ने -
कहीं किसी ने - गाये ।

किन्तु अधूरा है आकाश 
हवा के स्वर बन्दी हैं
मैं धरती से बँधा हुआ हूँ - 
हूँ ही नहीं, प्रतिध्वनि भर हूँ
जब तक नहीं उमगते तुम स्वर में मेरे प्राण-स्वर 
तारों मे स्थिर मेरे तारे, 
जब तक नही तुम्हारी लम्बायित परछाहीं 
कर जाती आकाश अधूरा पूरा । 
भार-मुक्त
ओ मेरी संज्ञा में तिर जाने वाले पंछी 
देख रहा हूँ तुम्हें मुग्ध मैं । 

यह लो : 
लाली से में उभर चम्पई 
उठा दूज का चाँद कँटीला ।

-अज्ञेय