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Friday, August 21, 2020

मुंडेर पर पतझड़ ....अशोक लव


एकाकीपन के मध्य
स्मृतियों के खुले आकाश पर
विचरण कर रहे हैं
उदासियों के पक्षी

कहाँ-कहाँ से उड़ते चले आ रहे हैं
बैठते चले जा रहे हैं
मन मुंडेर पर!
भीग गया है अंतस का कोना-कोना

क्यों आ जाता है
वसंत के तुंरत बाद
पतझड़ ?
क्यों नहीं भाती उदासियों को
खुशियों की
नन्ही चमकीली बूँदें ?

-अशोक लव

Friday, June 12, 2020

धूप सा तन दीप सी मैं .... महादेवी वर्मा

धूप सा तन दीप सी मैं!

उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,
खो रहा निज को अथक आलोक-सांसों में पिघल मन
अश्रु से गीला सृजन-पल,
औ' विसर्जन पुलक-उज्ज्वल,
आ रही अविराम मिट मिट
स्वजन ओर समीप सी मैं!

सघन घन का चल तुरंगम चक्र झंझा के बनाये,
रश्मि विद्युत ले प्रलय-रथ पर भले तुम श्रान्त आये,
पंथ में मृदु स्वेद-कण चुन,
छांह से भर प्राण उन्मन,
तम-जलधि में नेह का मोती
रचूंगी सीप सी मैं!

धूप-सा तन दीप सी मैं!

-स्मृतिशेष महादेवी वर्मा


Tuesday, May 12, 2020

मौत ने कहा ... स्मृतिशेष कुंवर नारायण

फ़ोन की घण्टी बजी
मैंने कहा — मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया।

दरवाज़े की घण्टी बजी
मैंने कहा — मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया।

अलार्म की घण्टी बजी
मैंने कहा — मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया।

एक दिन
मौत की घण्टी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा —
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..

मौत ने कहा —
करवट बदल कर सो जाओ।
-कुंवर नारायण

Sunday, April 26, 2020

महाभारत का युद्ध और माँ

जब कभी फुर्सत मिलती है
तो माँ के बारे में सोचता हूँ
वह कभी घण्टी तो कभी हारमोनियम लगती है
थाली और कटोरी बजाती हुई माँ
कभी हँसुआ तो कभी दराँती लगती है
घास के गट्ठर में दबी हुई माँ
रविवार को बचाकर रखना चाहती है सिर्फ अपने लिए
वह देख सके इतमिनान से महाभारत का युद्ध
माँ को समझ नहीं आती बड़ी-बड़ी बातें
बहुत खुश नजर आती है माँ जब-
एक-एक के मरते हैं कौरव
पांचाली के चीर हरण पर-
बहुत जोर-जोर से रोती है माँ।
-कुमार कृष्ण

Wednesday, November 13, 2019

नर्म आहट खुशबुओं की ....कुमार रवीन्द्र

आज फिर
इन सीढियों पर
नर्म आहट खुशबुओं की

दबे पाँवों धूप लौटी
और कमरे में घुसी
उँगलियाँ पकड़े हवा की
चढ़ी छज्जे पर ख़ुशी

बात फिर
होने लगी है
फुसफुसाहट खुशबुओं की

एक नीली छाँव
दिन भर
खिड़कियाँ छूने लगी
आँख-मींचे देखती रितु
ढाई आखर की ठगी

तितलियाँ
दालान भर में
है बुलाहट खुशबुओं की
1940-2019

-कुमार रवीन्द्र



Monday, November 11, 2019

मुक्त रखने का वादा है मेरा ...निधि सक्सेना

एक समय वो भी रहा
जब हर चीज़ कस कर पकड़ने की आदत थी
चाहे अनुभूतियाँ हों
पल हों
रिश्ते हों
या कोई मर्तबान ही
मुट्ठियाँ भिंची रहती

जब स्थितियाँ बदलतीं
और चीज़े हाथ से फिसलती
तो नाखूनों में रह जाती किरचनें
स्मृतियों की
लांछनों की
छटपटाहटों की
कांच की

अजीब सा दंश था
कि मैं दिन भर नाखून साफ करती
और रात भर किरचनों की गर्त मझे खरोंचती
वक्त उन्ही किरचनों में भटकता रहता
मैं बेबसी और कुंठा से भरती जाती

परंतु अब सीख लिया है
चीज़ों को हल्के हाथ से पकड़ना
वक्त को मुक्त रखना
जाती हुई चीज़ो को विसर्जित कर देना

नाखूनों में कोई किरचन गर रह गई हो
तो बगैर गौर किये
भूलते जाना भुलाते जाना

कि ऐ जिन्दगी
उम्मीद का सेहरा बाँध कर आना
तुझे बीते वक्त की हर किरचन से 
मुक्त रखने का वादा है मेरा.
-निधि सक्सेना

Tuesday, November 5, 2019

यादें जाती नहीं ...कुँवर रवीन्द्र

पूरी रात जागता रहा
सपने सजाता,
तुम आती थीं, जाती थीं
फिर आतीं फिर जातीं ,
परन्तु
यादें करवट लिए सो रही थीं

सुबह,
यादों ने ही मुझे झझकोरा
और जगाया,
जब मै जागा
यादें दूर खड़ी हो
घूर-घूर कर मुझे देखती
और मुस्कुरा रहीं थीं

मैंने कहा
चलो हटो ,
आज नई सुबह है
मै नई यादों के साथ रहूँगा

वे नज़दीक आईं
और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगीं

लाख जतन किए
वे गईं नहीं

यादें जाती नहीं
पूरे घर पर
कब्ज़ा कर बैठी हैं

यादें जो एक बार जुड़ जाती है
वे जाती नहीं
बस करवट लेकर
सो जाती हैं
- कुँवर रवीन्द्र
मूल रचना
कविताकोश

Monday, November 4, 2019

बस एक लम्हे का झगड़ा था ....गुलज़ार

बस एक लम्हे का झगड़ा था
दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे काँच गिरता है
हर एक शय में गई
उड़ती हुई, चलती हुई, किरचें
नज़र में, बात में, लहजे में,
सोच और साँस के अन्दर
लहू होना था इक रिश्ते का
सो वो हो गया उस दिन
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से उस शब
किसी ने काट ली नब्जें
न की आवाज़ तक कुछ भी
कि कोई जाग न जाए
बस एक लम्हे का झगड़ा था
-गुलज़ार
मूल रचना
कविताकोश

Sunday, November 3, 2019

खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो? ....गुलज़ार

खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।

डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
"कोई वादा नहीं... लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"

या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?"

सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो...
"धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!"

सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं

"इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!"

उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो... या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!
-गुलज़ार
मूल रचना
कविताकोश से

Saturday, November 2, 2019

भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में ...कुंवर नारायण

प्लास्टिक के पेड़
नाइलॉन के फूल
रबर की चिड़ियाँ
टेप पर भूले बिसरे
लोकगीतों की
उदास लड़ियाँ.....

एक पेड़ जब सूखता
सब से पहले सूखते
उसके सब से कोमल हिस्से-
उसके फूल
उसकी पत्तियाँ ।

एक भाषा जब सूखती
शब्द खोने लगते अपना कवित्व
भावों की ताज़गी
विचारों की सत्यता –

बढ़ने लगते लोगों के बीच
अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ ......

सोच में हूँ कि सोच के प्रकरण में
किस तरह कुछ कहा जाय
कि सब का ध्यान उनकी ओर हो
जिनका ध्यान सब की ओर है –

कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में
आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी
जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी
अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ ।
-कुंवर नारायण

Sunday, May 26, 2019

मर्म-व्यथा ...... अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कहाँ गया तू मेरा लाल।
आह! काढ़ ले गया कलेजा आकर के क्यों काल।

पुलकित उर में रहा बसेरा।
था ललकित लोचन में देरा।
खिले फूल सा मुखड़ा तेरा।
प्यारे था जीवन-धान मेरा।
रोम रोम में प्रेम प्रवाहित होता था सब काल।1।

तू था सब घर का उँजियाला।
मीठे बचन बोलने वाला।
हित-कुसुमित-तरु सुन्दर थाला।
भरा लबालब रस का प्याला।
अनुपम रूप देखकर तेरा होती विपुल निहाल।2।

अभी आँख तो तू था खोले।
बचन बड़े सुन्दर थे बोले।
तेरे भाव बड़े ही भोले।
गये मोतियों से थे तोले।
बतला दे तू हुआ काल कवलित कैसे तत्काल।3।

देखा दीपक को बुझ पाते।
कोमल किसलय को कुँभलाते।
मंजुल सुमनों को मुरझाते।
बुल्ले को बिलोप हो जाते।
किन्तु कहीं देखी न काल की गति इतनी बिकराल।4।

चपला चमक दमक सा चंचल।
तरल यथा सरसिज-दल गत जल।
बालू-रचित भीत सा असफल।
नश्वर घन-छाया सा प्रतिपल।
या इन से भी क्षणभंगुर है जन-जीवन का हाल।5।

आकुल देख रहा अकुलाता।
मुझ से रहा प्यार जतलाता।
देख बारि नयनों में आता।
तू था बहुत दुखी दिखलाता।
अब तो नहीं बोलता भी तू देख मुझे बेहाल।6।

तेरा मुख बिलोक कुँभलाया।
कब न कलेजा मुँह को आया।
देख मलिन कंचन सी काया।
विमल विधाु-वदन पर तम छाया।
कैसे निज अचेत होते चित को मैं सकूँ सँभाल।7।

ममता मयी बनी यदि माता।
क्यों है ममता-फल छिन जाता।
विधि है उर किस लिए बनाता।
यदि वह यों है बिधा विधा पाता।
भरी कुटिलता से हूँ पाती परम कुटिल की चाल।8।

किस मरु-महि में जीवन-धारा।
किस नीरवता में रव प्यारा।
किस अभाव में स्वभाव सारा।
किस तम में आलोक हमारा।
लोप हो गया, मुझ दुखिया को दुख-जल-निधि में डाल।9।

आज हुआ पवि-पात हृदय पर।
सूखा सकल सुखों का सरवर।
गिरा कल्प-पादप लोकोत्तर।
छिना रत्न-रमणीय मनोहर।
कौन लोक में गया हमारा लोक-अलौकिक बाल।10।
-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

Thursday, April 11, 2019

मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है......गोपालदास "नीरज"

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,
उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।

जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे,
उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का,
लाजिम लहर के साथ है तब खेलना,
जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान का
जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो
उस वायु में दीपक जलाना धर्म है।

हो नहीं मंजिल कहीं जिस राह की
उस राह चलना चाहिए इंसान को
जिस दर्द से सारी उम्र रोते कटे
वह दर्द पाना है जरूरी प्यार को
जिस चाह का हस्ती मिटाना नाम है
उस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है।

आदत पड़ी हो भूल जाने की जिसे
हर दम उसी का नाम हो हर सांस पर
उसकी खबर में ही सफ़र सारा कटे
जो हर नजर से हर तरह हो बेखबर
जिस आँख का आखें चुराना काम हो
उस आँख से आखें मिलाना धर्म है।

जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तब मांग लो ताकत स्वयम जंजीर से
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी
उस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर से
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।
-गोपालदास "नीरज"

Sunday, April 7, 2019

कृत–कृत नहीं जो हो पाए......नागार्जुन

जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
उनको प्रणाम !

जो छोटी–सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि–पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार !
उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह–रह नव–नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम–समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू–परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति–पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
उनको प्रणाम !

कृत–कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल !
उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ;
या जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ !
उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति–मंत ?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत !
उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर !
उनको प्रणाम !

- बाबा नागार्जुन

Friday, April 5, 2019

चितवन .....सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

क्या दिया था तुम्हारी एक चितवन ने उस एक रात
जो फिर इतनी रातों ने मुझे सही-सही समझाया नहीं?

क्या कह गयी थी बहकी अलक की ओट, 
तुम्हारी मुस्कान एक बात
जिस का अर्थ फिर किसी प्रात की 
किसी भी खुली हँसी ने बताया नहीं?

इधर मैं निःस्व हुआ, पर अभी चुभन यह सालती है
कि मैं ने तुम्हें कुछ दिया नहीं,
बार-बार हम मिले, हँसे, हम ने बातें कीं,
फिर भी यह सच है कि हम ने कुछ किया नहीं।

उधर तुम से अजस्र जो मिला, सब बटोरता रहा,
पर इसी लुब्ध भाव से कि मैं ने कुछ पाया नहीं!

दुहरा दो, दुहरा दो, तुम्हीं बता दो
उस चितवन ने क्या कहा था
जिस में तुम ही तुम थे, संसार भी डूब गया था
और मैं भी नहीं रहा था...
-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

Sunday, March 17, 2019

कुछ नहीं....भावना मिश्रा

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‘कुछ नहीं’
ये दो शब्द नहीं
किसी गहरी नदी के दो पाट हैं
जिनके बीच बाँध रखा है हर औरत ने
अनगिन पीड़ाओं, आँसुओं और त्रास को

इन दो पाटों के बीच वो समेट
लेती है सारे सुख दुःख

बहुत गहरे जब मुस्काती है
या जब असह्य होती है
मन की व्यथा
तब हर सवाल के जवाब में
इतना भर ही
तो कह पाती है
औरत
‘कुछ नहीं’

Bhavna Mishra.jpg
-भावना मिश्र

Monday, December 31, 2018

साल की आख़िरी रात ..... वेणु गोपाल

एक छलांग
लगाई है
उजाले ने
अंधेरे के पार

पाँव
हवा में--
और
मैं
अपनी डायरी पर
झुका हुआ
उसके
धरती छूने का
इन्तज़ार
करता
००
रात के बारह बजने में
अभी
काफ़ी देर है।
-वेणु गोपाल

Thursday, December 13, 2018

शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!.....सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

वंचना है चाँदनी सित,
झूठ वह आकाश का निरवधि, गहन विस्तार-
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!
दूर वह सब शान्ति, वह सित भव्यता,

वह शून्यता के अवलेप का प्रस्तार-
इधर-केवल झलमलाते चेतहर,
दुर्धर कुहासे का हलाहल-स्निग्ध मुट्ठी में
सिहरते-से, पंगु, टुंडे, नग्न, बुच्चे, दईमारे पेड़!

पास फिर, दो भग्न गुम्बद, निविडता को भेदती चीत्कार-सी मीनार,
बाँस की टूटी हुई टट्टी, लटकती
एक खम्भे से फटी-सी ओढऩी की चिन्दियाँ दो-चार!
निकटतर-धँसती हुई छत, आड़ में निर्वेद,

मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में
तीन टाँगों पर खड़ा, नतग्रीव, धैर्य-धन गदहा।
निकटतम-रीढ़ बंकिम किये, निश्चल किन्तु लोलुप खड़ा
वन्य बिलार- पीछे, गोयठों के गन्धमय अम्बार!

गा गया सब राजकवि, फिर राजपथ पर खो गया।
गा गया चारण, शरण फिर शूर की आ कर, निरापद सो गया।
गा गया फिर भक्त ढुलमुल चाटुता से वासना को झलमला कर,
गा गया अन्तिम प्रहर में वेदना-प्रिय, अलस, तन्द्रिल,

कल्पना का लाड़ला कवि, निपट भावावेश से निर्वेद!
किन्तु अब-नि:स्तब्ध-संस्कृत लोचनों का
भाव-संकुल, व्यंजना का भीरु, फटा-सा, अश्लील-सा विस्फार।
झूठ वह आकाश का निरवधि गहन विस्तार-

वंचना है चाँदनी सित,
शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार!

-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"