Thursday, July 18, 2013

सावन का महीना हो...............वज़ीर आग़ा



सावन का महीना हो
हर बूंद नगीना हो


क़ूफ़ा हो ज़बां उसकी
दिल मेरा मदीना हो

आवाज़ समंदर हो
और लफ़्ज़ सफ़ीना हो

मौजों के थपेड़े हों
पत्थर मिरा सीना हो

ख़्वाबों में फ़क़त आना
क्यूं उसका करीना हो

आते हो नज़र सब को
कहते हो, दफ़ीना हो

- वज़ीर आग़ा 

सौजन्य भाई अशोक खाचर

4 comments:

  1. आपकी यह रचना दिनांक 19.07.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  2. सावन का महिना हो हर बूंद नगीना हो... अति सुंदर !!

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  3. उर्दू के, सामान्य रूप से अप्रचलित, शब्दों के अर्थ भी साथ में होते तो आशय समझने में बहुत आसानी होती .

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  4. वज़ीर आग़ा जी की सुन्दर नज़्म प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

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