Thursday, April 27, 2017

वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से.....नूर मुहम्मद 'नूर'

हवा से, रोशनी से, ज़िन्दगी से
मैं आजिज आ न जाऊं शायरी से

भरोसा तोड़ता फिरता हूं सबका
मैं क्या बोलूं अपने आदमी से

मैं सहरा से ज्यादा कुछ कहां था
वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से

यही काम आएगी ऐ नूर भाई
भरोसा हो चला है तिरगी से

ये दुनियां और उसकी दुनियादारी
फकत देखा करूं बस बेबसी से

- नूर मुहम्मद 'नूर' 

Wednesday, April 26, 2017

क्या हादसा ये अजब हो गया.....महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’


क्या हादसा ये अजब हो गया 
बूढ़े हुए, इश्क़ रब हो गया

चाहत का पैग़ाम तब है मिला 
पूरा सभी शौक जब हो गया 

हम आ गए ज़ुल्फ़ की क़ैद में
मिलना ही उनसे गजब हो गया 

रहते थे हमसे बहुत दूर वो 
मिलने का ये शौक कब हो गया 

हमको मिला ना ख़ुदा, ना सनम 
पूरा ख़लिश वक़्त अब हो गया.

-महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

Tuesday, April 25, 2017

बहुत दिन हो गए!....एमएल मोदी (नाना)










जब करते थे यारों के बीच ठिठौली
वो वक्त गुजरे बहुत दिन हो गए!

किसी अपने को तलाश करते हुए,
एक अनजान शहर में आए-
बहुत दिन हो गए!  

न मंजिल का पता है और न ही रास्ते की खबर,
फिर भी अनजानी राह पर चलते हुए-
बहुत दिन हो गए!

भीड़ तो बहुत देखी हमने इस जमाने में,
मगर इस भीड़ में कोई अपना देखे-
बहुत दिन हो गए!  

जब मिलेगा कहीं वो हमें तो,
पूछेंगे यार कहां थे तुमसे मिले-
बहुत दिन हो गए!  

और जो करते थे साथ निभाने की बातें,
उनसे बिछड़े 'नाना' को बहुत दिन हो गए!! 
-एमएल मोदी (नाना)  

Monday, April 24, 2017

दिल के लहू में......डॉ. विजय कुमार सुखवानी


दिल के लहू में आँखों के पानी में रहते थे
जब हम माँ बाप की निग़हबानी में रहते थे

नये मकानों ने हम सब को तन्हा कर दिया
सब मिल जुल के हवेली पुरानी में रहते थे

माँ बाबा दादा दादी चाचा चाची बुआ
कितने सारे किरदार एक कहानी में रहते थे

कैसी चिंता कैसी बीमारी कहाँ का बुढ़ापा
तमाम उम्र हम लोग सिर्फ़ जवानी में रहते थे

ये कभी तो तन्हा मिले तो इस पर वार करें
सारे दुश्मन हमारे इसी परेशानी में रहते थे

जब तक बड़े बूढ़े सयाने हमारे घरों में रहे
हम लोग बड़े मज़े से नादानी में रहते थे

बड़े होकर किस किस के आगे झुकना पड़ा
जब छोटे थे सब हमारी हुक्मरानी में रहते थे

-डॉ. विजय कुमार सुखवानी

Sunday, April 23, 2017

कबाड़ उठाती लड़कियाँ...........मनोज चौहान











पाचं – छः जन के
समूह में
जा रही हैं वे लड़कियाँ
राष्ट्रीय राजमार्ग के एक ओर
रंग बिरंगे, पुराने से
कपड़े पहने
जो कि धुले होंगे
महीनों पहले
उनके किसी त्यौहार पर

पावों में अलग – अलग
चप्पल पहने
दिख जाती हैं पैरों की
बिबाइयां सहज ही
उन के हाथों में हैं
राशन वाली किसी दुकान से खाली हुई
सफेद बोरियां

राजमार्ग पर चलते हुए
जब दिख जाती है उन्हें
किसी गोलगप्पे
या चाट वाले की रेहड़ी पर
उमड़ी भीड़
तो चल पड़ते हैं उनके कदम
स्वतः ही उस ओर
अपनी जिव्हा का स्वाद
मिटाने नहीं
बल्कि खाली पड़ी किसी
पानी या कोल्ड ड्रिंक की बोतल
या इसी तरह के किसी
दुसरे सामान की
आस में

ये लडकियां किशोरियां हैं
सत्रह – अठरह बर्ष के करीब की
सड़क के एक ओर चलते
मिल ही जाती हैं सुनने को
किसी ट्रक ड्राइवर की फब्तियां
या मोटर साइकिल पर जाते
मनचलों के बोल
जिन्हें कर देती हैं वे अनसुना
याद कर
पारिवारिक जरूरतों की
प्राथमिकताओं को ।

चहक उठती हैं वे
शैक्षणिक भ्रमण पर निकली
उस बस को देखकर
जिसमें बैठीं हैं
उनकी ही उम्र की छात्राएं
जो हिला देती हैं हाथ
उन्हें देखकर
अभिवादन स्वरुप
क्या उन्हें नहीं होगा शौक
बन – संवरकर
अच्छा दिखने का
या किसी महंगे मोबाइल से
सेल्फी खींचने का ?

वे कबाड़ उठातीं लडकियां
चिढ़ाती हैं
आज भी
इकीसवीं सदी के विकास को
और साथ ही
प्रति व्यक्ति आय में हुए
इजाफा दर्शाने वाले
अर्थशास्त्रियों के आंकड़ों को
और संविधान के उन
अनुच्छेदों को भी
जिनमें दर्ज हैं
उनको न मिल सके
कई मौलिक अधिकार

वे मेहनतकश बेटियाँ हैं
अपने माँ – बाप के आँगन में खिले
सुंदर फूल हैं
जिम्मेदारियां उठाकर
परिवार का भरण - पोषण करते हुए
जो बन गई हैं माताओं की तरह
इस उम्र में ही
और जूझ रही हैं
मूलभूत आवश्यकताओं की
उहापोह में
-मनोज चौहान,

Saturday, April 22, 2017

हँसते ही............गिरिजा अरोड़ा











मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही 

फूल खिल जाते हैं
दिल मिल जाते हैं
ग़म के स्तंभ हिल जाते हैं

रंग छा जाते हैं
ढंग भा जाते हैं
दंभ के व्यंग्य सकुचाते हैं

राग बज जाते हैं
भाग जग जाते हैं
हर्ष के पल मिल जाते हैं

पर्दे उठ जाते हैं
अंतर घट जाते हैं
छल के बल घट जाते हैं

बंधन खुल जाते हैं
रस्ते मिल जाते हैं
दर्द के दंश घुल जाते हैं

मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही 
तत्व अमरत्व के पास आते हैं
और
अम्ल आसुरी मुड़ जाते हैं

-गिरिजा अरोड़ा

Friday, April 21, 2017

लेखनपुर की प्रेम कथा......अख़तर अली

बहुत समय पहले की बात है, लेखनपुर नामक गाँव में एक युवक और युवती रहा करते थे । युवती का नाम कविता और युवक का नाम कहानी था । कविता और कहानी के प्रेम के चर्चे सिर्फ लेखनपुर मे ही नहीं बल्कि आस पास के गाँव में हुआ करते थे । लोग इनकी तुलना लैला-मजनू और शीरी-फरहाद से किया करते थे । बड़े बुजुर्ग तो यहाँ तक कहा करते थे कि कविता और कहानी से ही लेखनपुर आबाद है, कोई कहता कविता और कहानी के रहने से ही लेखनपुर की पहचान बनी है। कविता और कहानी की मौजूदगी से लेखनपुर भी आनंदित था ।
अचानक एक दिन लेखनपुर में एक अजनबी आदमी आया। उसकी बुरी नज़र कविता और कहानी की जोड़ी पर पड़ी और उसी दिन से कविता और कहानी के बुरे दिन शुरू हो गये। वह अजनबी आदमी धीरे-धीरे संदिग्ध होने लगा, उसने कविता और कहानी को सब्ज़-बाग दिखाने शुरू कर दिये, उसने इनके दिमाग में यह बात बैठा दी कि यहाँ लेखनपुर मे तुम्हारी कोई पहचान नहीं बन पा रही है तुम मेरे साथ चलो फिर देखो मैं तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा देता हूँ । कविता और कहानी उस धोखेबाज के चक्कर में आ गये और अपने आप को पूरी तरह से उसके हवाले कर दिया। उस दिन के बाद से आज तक लेखनपुर में कविता और कहानी को नहीं देखा गया। किसी को पता ही नहीं चला कि आखिर ये दोनों का क्या हुआ? बहुत समय बाद केवल इतना ही पता चला कि उस संदिग्ध आदमी का नाम प्रकाशक था ।

-अख़तर अली

Thursday, April 20, 2017

500 रुपए रोज....डॉ. संगीता गाँधी


सरकारी हस्पताल के एक कोने में आमिर  बुत बना बैठा था ।अनजाना अँधेरा उसके चारों ओर छाया था ।
ये क्या हो गया ? उसने अपने ही हाथों से अपने दिल के टुकड़े को कैसे मार दिया !
अंदर डॉ उसके 12 साल के बेटे का इलाज कर रहे थे ।सर पर पत्थर लगने से  आमिर के बेटे का बहुत खून बह चुका था ।डॉ. पूरी कोशिश कर रहे थे ।
आमिर  एक ग़रीब ,लाचार शाल बनाने वाला बुनकर था । सर्दियों में वो कश्मीर से बाहर जा कर शाल बेचकर पैसे कमा लेता था पर गर्मियां एक मुसीबत बन कर आती थीं । 2 दिन से घर का चूल्हा नहीं जला था । आमिर किसी काम की तलाश में था , तब उसे रफ़ीक मिला ।
रफ़ीक -काम करोगे ,बहुत आसान है ।
आमिर -  हाँ ,साहब करूँगा ,घर  वाले भूखे हैं ।
रफ़ीक -चौक पर खड़ा हो कर पत्थर मारने हैं , 500 मिलेंगे एक दिन के !
आमिर एक अनपढ़ ,गरीब था । उसे न राजनीती की समझ थी न अलगाववादियों के षड्यंत्रों का पता था । उसके लिए  बहुत बड़ी बात थी की एक दिन के 500 मिल रहे हैं ।
आमिर ने एक दिन एक बड़ी भीड़ का हिस्सा बन सेना पर पत्थर  मारे ।
शाम को 500 मिले.......घर वालों को खाना मिला ।
अगले दिन फिर आमिर गया । भीड़ पत्थर फेंक रही थी ।आमिर भी फेंक रहा था........तभी आमिर ने देखा उसका पत्थर एक बच्चे को लगा ।शक्ल उसे कुछ पहचानी सी लगी ।दौड़ कर पास गया तो सुन्न हो गया ! ये तो उसका ही "खून " था । उसका 12 साल का बेटा  बेहोश पड़ा था ।
आमिर  उसे उठा कर दौड़ा । शहर के खराब हालात में जैसे तैसे कई घंटों में अस्पताल  पहुंचा ।
डॉ. ने उसके कंधे पर हाथ रखा .....हम बच्चे को बचा नहीं पाए ,खून काफी निकल चुका था ।
आमिर  बेसुध सा खड़ा था , उसकी  लुटी हुई दुनिया  की तस्वीर की मानिंद बच्चे की लाश पड़ी थी । तभी  उसका दोस्त  अस्पताल पहुंचा.....ये लो आमिर , रफ़ीक ने तुम्हारे 500 दिए हैं !!
आमिर का एक हाथ बच्चे की लाश पर था , दूसरे में 500 थे !!  अज्ञात अँधेरा उसकी दुनिया  को निगल चुका  था।

-डॉ. संगीता गांधी

Wednesday, April 19, 2017

क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती....डॉ. मोहम्मद युनूस बट







पहले बुढ़ापा कलात्मक होता था आज कल भयानात्मक होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप बुढ़ापे की दुनियां मैं जवानी के कौन से रास्ते से दाख़िल हुए हैं। विशेषज्ञों ने दावा किया है कि 2035 तक देश में बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी। अब ये तो दुनियां का नियम है कि यहाँ अगर कोई चीज़ बहुत ज़्यादा मात्रा में है तो उसकी क़ीमत बहुत कम हो जाती है। कालेज के प्रोफ़ेसर ने पाँच लड़कों को कक्षा में खड़ा किया और कहा - तुम चार लड़कों के दिमाग़ की क़ीमत पाँच सौ रुपये प्रति ग्राम और मेरे से कहा - तुम्हारे दिमाग़ की क़ीमत ड़बल यानी हज़ार रुपये प्रति ग्राम है। अपने दिमाग़ क़ीमत जान कर मैं पूरी तरह ख़ुश हो भी नही पाया था कि प्रोफ़ेसर साहब ने बताया कि जो वस्तु बहुत कम मात्रा में पाई जाती है उसकी क़ीमत हमेशा बहुत अधिक होती है। मुझे लगता है बूढ़ों की बढ़ती तादाद से उनकी मार्केट वैल्यू एकदम घट जायेगी । जनसंख्या रोकने के तरीक़े ढूँढ़ निकाले बुढ़ापा रोकने का कोई उपाय नहीं है। अब जब चारों तरफ़ बूढ़े ही बूढ़े हो जायेंगे तो उन्हें बूढ़ा समझ उनकी इज़्ज़त कौन करेगा?
बूढ़ों को हमारे समाज में वही स्थान प्राप्त है जिस स्थान पर वह बैठे रहते हैं। हम बूढ़ों के ख़िलाफ़ नहीं क्योंकि हमें भी एक दिन बूढ़ा होना है लेकिन बूढ़े हमारे ख़िलाफ़ रहते हैं क्योंकि उन्हें अब कौन सा जवान होना है?
हमारे यहाँ बूढ़े नसीहत देने के काम आते हैं। एक बूढ़े ने बच्चे को नसीहत देते हुए कहा - बेटे अपनी बाईक की रफ़्तार उतनी ही रखना जितनी मेरी दुआओं की रफ़्तार है यानी चालीस किलो मीटर प्रति घंटा, ये उनकी दुआओं की रफ़्तार है, नसीहतों की रफ़्तार बाईक की रफ़्तार जैसी है।
बूढ़े हमेशा ये सोच कर परेशान रहते हैं कि नई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी? वह भी यही सोच कर परेशान रहेगी कि ऩई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी?
एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पच्चीस प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि बूढ़े एकदम खाली रहते हैं जबकि तीन प्रतिशत बूढ़े भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं उन सब का कहना है कि हमारे पास पल भर की भी फ़ुरसत नही है। दरअसल जवान जिस काम को पाँच मिनट में कर के दिन भर खाली बैठे रहते हैं, बूढ़े उसी पाँच मिनट के काम को करने में पूरा दिन लगा देते हैं लिहाज़ा उनके पास पाँच मिनट का भी टाईम नहीं होता। बुढ़ापे की बस एक ही बीमारी है और वह है बुढ़ापा और बुढ़ापे के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
बुढ़ापे में अक्सर भूल जाने की आदत होती है। तीन बूढ़े आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा - जब मैं सीढ़ियों के बीच में पहुँचता हूँ तब भूल जाता हूँ कि मेरे को चढ़ना है या उतरना, दूसरे ने कहा - जब मैं फ्रिज खोलता हूँ तो भूल जाता हूँ कि मेरे को कुछ रखना है या निकालना है, तीसरे ने कहा - मैं कभी कभी यही भूल जाता हूँ कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। वैसे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि आप किसी भी बूढ़े को झाड़ेंगे तो उसमें से एक जवान आदमी निकलेगा।
कहते है स्वर्ग में कोई बूढ़ा नहीं होता और अगर यहाँ बूढ़ों की संख्या बढ़ती गई तो फिर इस देश के स्वर्ग बनने की कोई संभावना नहीं रहेगी।
अब जो लोग कहते हैं कि 2035 तक बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी उन्हें मैं ये भी बता दूँ उस वक़्त जो बूढ़े होंगे वो बुढ़ापे की सभी परिभाषायें बदल देंगे क्योंकि उस वक़्त हम बूढ़े होंगे।
एक बात और बुढ़ापे की सभी बातें बूढ़े पुरुषों के बारे में ही होती हैं बूढ़ी औरतों के बारे में नहीं, क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती।

लेखक - डॉ. मोहम्मद युनूस बट
अनुवाद - अख़तर अली


Tuesday, April 18, 2017

गुज़रे क़दम-क़दम पे किसी इम्तिहां से हम....हरदीप बिरदी


सीखे नहीं सबक भी किसी दास्तां से हम 
आगे कभी न बढ़ सके अपने निशां से हम 

तू एक बार हमको लगाता तो इक सदा 
आ जाते लौट कर भी किसी आसमां से हम 

दुनिया के साथ चलके वो आगे निकल गये
लिपटे हुए हैं आज भी अपने मकां से हम 

माँगा जो उसने हमने वो वादा तो कर दिया
सोचा नहीं निभायेंगे इसको कहाँ से हम 

ईमां भी बेच दूँ मैं मगर यह तो सोचिये 
जायेंगे खाली हाथ ही इक दिन जहाँ से हम 

अपना पता है हमको न अपनी कोई ख़बर 
गुज़रे ये राहे -इश्क़ में कैसे मकां से हम 

कहने को उनके साथ में "बिरदी" जी चल रहे 
गुज़रे क़दम-क़दम पे किसी इम्तिहां से हम
- हरदीप बिरदी
deepbirdi@yahoo.com

Monday, April 17, 2017

बंधन .........शबनम शर्मा











हम कब, कैसे बंध 
जाते हैं 
रिश्तों की डोर में 
पता ही नहीं चलता, 
रिश्ते नहीं टूटते,
हम हो जाते ज़ार-ज़ार, 
टुकड़े-टुकड़े,
बस दिखता है हमें 
सिर्फ़ वो लम्हा, जब 
पहली बार बंधे थे हम 
उस डोर से, 
डोर, कब कच्ची हुई, 
कब धागे अलग-अलग हो गये, 
खिसक गई हमारे 
पाँव के नीचे की ज़मीन, 
चूर-चूर हो गया हमारा 
अस्तित्व और मिल गये 
हम मिट्टी में। 
-शबनम शर्मा


Sunday, April 16, 2017

आँखों में हैं जंतर-मंतर......राहत इन्दोरी


उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं मुझ से रूठे-रूठे हैं
चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब

मुझसे बिछड़ कर वह भी कहाँ अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े-वपड़े, ज़ेवर-वेवर सब

आखिर मै किस दिन डूबूँगा फ़िक्रें करते है
कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया लंगर-वंगर सब
- राहत इन्दोरी

Saturday, April 15, 2017

जो मुझको तोड़ता है रातदिन......नूर मुहम्मद 'नूर'

हर घड़ी रिश्ता ग़मो से जोड़ता है रातदिन
कौन है मुझमें, जो मुझको तोड़ता है रातदिन

वह जो दिखलाता है सबको आईना या यूँ कहो
मैं वो शीशा हूँ जो पत्थर तोड़ता है रातदिन

ताकि कल गुल लहलहा उठ्ठें इसी उम्मीद पर
खून से लथपथ वो सहरा कोड़ता है रातदिन

आज भी तो जंगलों में मुफलिसी के चार सू
भूख का काला हिरण इक दौड़ता है रातदिन

एक सर हैं करोड़ो सर, सरों की सरगुज़श्त
नूर नाहक तो नही सर फोड़ता है रातदिन ||

सरगुज़श्त :: आत्मकथ्य

- नूर मुहम्मद 'नूर' 

Friday, April 14, 2017

पड़ी मझधार में क़श्ती है किनारा दे दो.............महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

पड़ी मझधार में क़श्ती है किनारा दे दो
मेरे टूटे हुए इस दिल को सहारा दे दो

मुझे दुनिया की नहीं, दिल की नज़र से देखो
मेरी नज़रों को मुहब्बत का इशारा दे दो

मेरी मज़बूर तमन्ना पे करम फ़रमाओ
मेरे ख़्वाबों को हसीं एक नज़ारा दे दो

नहीं मालूम मेरा दिल क्यों बुझा सा है ये
तुम निगाहों से इसे कोई शरारा दे दो

कभी की थी जो ख़ता माफ़ करो उसको तुम 
मुझे चाहत का ख़लिश हक़ वो दुबारा दे दो.

बहर --- १२२२  ११२२  ११२२  २२

- महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

Thursday, April 13, 2017

और खूब पढ़ती हूँ....मैं










पढ़ती हूँ
और खूब पढ़ती हूँ....
चार ई-पत्रिकाएँ आती है
अखबार भी पढ़ती हूँ..

ये सोचकर कि
लिखना आ जाएगा
किसी ने कहा है कि
एक अच्छा पाठक भी

लेखक बन सकता है
पर अफसोस....
आते हैं भाव मन में
बस..आते ही

दो पंक्तियों में ही 
सिमट जाते हैं...
चार डायरियों के
पृष्ठ दो-दो पंक्तियो से 

भर गई है..
उन सबको जोड़कर भी देखा...
पर कविता को न बनना था
सो नहीं बनी....

ऐसा लगता है कि
भाग्य में सिर्फ और सिर्फ
संग्रहण,संयोजन
और संम्पादन ही
लिखा है...

मन की उपज..
यशोदा

डायरी में लिखी दो पंक्तिया..
आज तक रखे हैं पछतावे की अलमारी में,
एक दो वादे जो दोनों से निभाये ना गए…





Wednesday, April 12, 2017

उसके सिवा कोई न था............श्रीमती आशा शैली


मुझको बस इक आसरा, उसके सिवा कोई न था
जिस घड़ी कश्ती का मेरी नाखुदा कोई न था।

हैं मेरी तन्हाइयाँ पुरनूर तेरी याद से
तू ही तू था पास मेरे, दूसरा कोई न था।

तुमने मेरा हाथ थामा, मेरे रहबर आनकर
सामने मेरे बचा जब रास्ता कोई न था।

मैं तेरे दर पर सदा देती रही शामो-सहर
ये भी सच है पास मेरे मसअला कोई न था।

बंद आँखों से तेरा दीदार 'शैली' ने किया
एक पल भी दिल में मेरे दूसरा कोई न था।
-श्रीमती आशा शैली 


Tuesday, April 11, 2017

किस्मत वाली.........सुमन जैन लूथरा



सुधा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी थी। उसने पति को फ़ोन किया तो जवाब मिला की अभी बॉस ने थोड़ा जरूरी काम दिया है वो ख़त्म किए बिना नहीं आ सकता। 
उसने सास की और कातर आँखों से देखा तो उसने कहा आज तो मेरी टांगों से खड़ा भी नहीं हुआ जाता, तेरे जेठ को कहती हूँ दुकान से आकार तुझे अस्पताल पहुंचा आए। 

अस्पताल में अकेले ही बिस्तर पर दर्द से तड़पती सुधा की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसे याद आ रहा था दो साल पहले इसी अस्पताल में उसने परी को जन्म दिया था। कितनी खुश थी वो अपने पहले बच्चे को ले कर पर बेटी की ख़बर से सब उसके ख़िलाफ़ हो गए थे। 

सास कमरे में आई थी और बड़बड़ाते हुए बाहर चली गयी बड़ी आई किस्मत वाली। माँ ने किस्मत वाली किस्मत वाली कह के हमारे माथे मड़ दी। पति ने भी जैसे बड़े बोझिल मन से परी को उठाया। नर्स ने जेठ जी से कहा लक्ष्मी हुई है – बधाई, भैया जी मिठाई खिलाओ। जेठ जी ने नर्स को बाहर बुला कर कहा – 'नी  कुड़ी दी की वदाई, कदे कुड़ी वी वदाई दा कारण हुंदी है।' 

तभी दर्द की तेज़ लहर उसे ख़यालों से वापिस ले आई। डॉक्टर नर्स से कह रही थी इनके घर से किसी को बुला लो अब टाइम नज़दीक आ गया है। सुधा दर्द से बेसुध हो गई थी जब होश आया तो गलियारे में से जेठ जी की आवाज़ आ रही थी–‘वदाई होवे, कुड़ी दे मुंडा होया।' 

भीगी आँखों से सुधा सोच रही थी लड़की बधाई की जननी हो सकती है पर उसका अपना जन्म? 
-सुमन जैन लूथरा 

Monday, April 10, 2017

काँटे हैं मेरे साथ बहुत........श्रीमती आशा शैली


नदी हूँ हर तरफ़ बहने की राह रखती हूँ
कोई हो रास्ता उस पर निगाह रखती हूँ

ये और बात है, काँटे हैं मेरे साथ बहुत
गुलाब हूँ मैं महक बेपनाह रखती हूँ

हरएक चीज़ से है प्यार का मेरा रिश्ता
हरएक फूल की मैं दिल में चाह रखती हूँ

तुम्हारी आँख में खटके न कहीं मेरी हँसी
दबा के होंठ मैं नीची निगाह रखती हूँ

हैं मेरे सीने में भी ग़म के कोहसार बहुत
मैं उन में नरगिसी फूलों की चाह रखती हूँ

बुलन्दियों की तरफ़ हर कदम ही चलना है
मैं आसमान पे शैली निगाह रखती हूँ
-श्रीमती आशा शैली 
मूल रचना

Sunday, April 9, 2017

जोड़-तोड़.....श्रीमती आशा शैली

बहुत गरीब थी वह, न घर न रोजग़ार। कभी दिहाड़ी-मज़दूरी मिल जाती और कभी-कभी उसमें भी नागा हो जाता। किराये के एक कमरे में ही नहाना-खाना और सोना सभी कुछ। पति का यह हाल था कि कभी कमाया, कभी घर बैठ कर दारु पी ली और माँ-बेटी को पीट दिया। माँ को मजूरी मिल गई तो जै-हरि वर्ना जो घर में हुआ उसी से काम चला लिया। पति चार दिन आ जाता और फिर गायब हो जाता। कभी-कभी माँ-बच्चों को दूसरों का दरवाज़ा भी देखना पड़ता। मायका दस घरों की दूरी पर होने के कारण उन्हें भूखा सोना नहीं पड़ता था वर्ना ऐसा होने में भी कोई कसर नहीं थी। 



ऐसे में उसका छोटा बच्चा बीमार हो गया। दर्द से छटपटाते बच्चे को लेकर वह डाक्टर के पास गई तो डाक्टर ने आप्रेशन करने को कह दिया। कुल ख़र्चा लगभग दस हज़ार बताया गया। जिस औरत के पास पैरों के लिए चप्पल ख़रीदने के पैसे न हों उसके लिए दस हज़ार आकाश-सुमन ही तो था, परंतु माँ थी वह, बच्चे को तड़पता कैसे देख सकती थी?

पूरे गाँव में इस घर से उस घर मदद माँगते उसे जब पन्द्रह दिन हो गए तो गाँव के मुखिया ने उसे सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी जहाँ बिना पैसे के बच्चे का आपरेशन हो सकता था।

बच्चे की माँ सोच रही थी कि इतना बड़ा गाँव है, यदि कुछ लोग उसे पाँच-पाँच सौ रुपये भी दे दें तो वह बच्चे के इलाज के बाद भी कुछ तो बचा ही लेगी और कुछ दिन का पेट का गुज़ारा हो जाएगा, परन्तु ऐसा नहीं होना था सो नहीं हुआ। 

पूरे गाँव में गिड़गिड़ाने के बाद भी उसे कहीं से एक पैसे की भी सहायता नहीं मिली। पंचायत प्रधान ने तरस खाकर बच्चे को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। 

रैडक्रास की सहायता से बच्चे का इलाज तो हो गया परन्तु उसका जोड़-तोड़ धरा का धरा रह गया। उसकी दिनचर्या घूम फिर कर उसी पुराने ढर्रे पर आ गई।

-श्रीमती आशा शैली 

Saturday, April 8, 2017

ऐसा कुछ गुमान था.............प्रतिभा चौहान


अपनी हकीकत पर मुझे इत्मिनान था
क्योंकि मेरी नजरों में  आसमान था

खुली फिजा में होंगी राहत की बस्तियां
भटकती राहों को ऐसा  कुछ गुमान था

मंजिल यूं ही नहीं मिली इन नुमाइंदों  को
कई रतजगे, कई मशवरे ,कड़ा इम्तिहान था

उगा डाली सूखी दरारों में नमी की पत्तियाँ
पत्थरों में कहाँ  ऐसा  हौसला - ईमान था....
-प्रतिभा चौहान 

Friday, April 7, 2017

सियासत........पंकज शर्मा


ज़र्रा ज़र्रा दहक उठता है,
जब बेबात अदावत होती है।

हर कोना कोना रिसता है..
जब कोई शहादत होती है।

कुछ बड़ी मीनारें झुक जावे
कुछ ठंडे छींटे दे जावे..
कुछ देर सलामी होती है।

दम घुट घुट के रह जाता है,
जब शहीदों पे सियासत होती है।
-पंकज शर्मा 

Thursday, April 6, 2017

पैरों में छाले पड़े.........अशोक कुमार रक्ताले


परछाई छिपने लगी , देखें सूरज घूर।
पैरों में छाले पड़े, मंजिल फिर भी दूर।।

गहराया है सांझ का, रंग पुनः वह लाल।   
सम्मुख काली रात है, और वक्त विकराल।।

मजबूरी अभिशाप बन, ले आती है साथ।
निर्लजता के पार्श्व में, फैले दोनों हाथ।।

धन-कुबेर कब पा सका, धन पाकर भी चैन।
तड़प-तड़प जीता रहा, मूँद लिए फिर नैन।।

उसके अपने अंत तक, साथ चले अरमान।
बचपन से सुनता रहा, जो केवल फरमान।।
-अशोक कुमार रक्ताले

Wednesday, April 5, 2017

जाने क्यों अब........कवि अनमोल तिवारी कान्हा

मैंने देखा हैं,
बैसाखियों  के सहारे।
वृद्धाश्रम की ओर  बढ़ते,
उस  अपाहिज विधुर बाप को।।
जो चेहरे पर अनगिन, 
झुर्रियों के निशान लिए।
वर्षों के अनुभवों को,
बयान कर रहा था भीड़ में।।

और सुना रहा था अपनी,
उस करूण गाथा को 
जो रची थी उसके अपनों ने।
जिन्हें सदा  चाहा था  उसने।
और  जागता रहा दिन रात ,
उनके सपनों को पूरा करने।।

मगर जाने क्यों अब?
वो ही सपनों के सौदागर
इस कदर ज़ालिम बन,
दे रहे थे  ठोकरें। 
और वो अपाहिज विधुर बाप ,
मज़बूत सहारे को तलाशता
दीवारों से टकराता
भटक रहा था इस कदर।।

और ढूँढ़ रहा था आश्रय कि , 
बच जाए उसका अस्तित्व  
और मिलें उसके, 
सपनों को आवाज़।
जहाँ कुछ  पल ही सही पर,
समर्पण का भाव हों।
और भूखे पेट को तृप्त करें,
वो अन्न रूपी प्रसाद हों।।

-कवि अनमोल तिवारी "कान्हा"

Tuesday, April 4, 2017

जिन्दग़ी वो सवाल देती है..........श्रीमती आशा शैली


ज़ीस्त तोहफ़े कमाल देती है
पेचो-ख़म सब निकाल देती है।

एक छोटी खुशी हमें अक्सर
ग़म के साँचे में ढाल देती है।

ता-कयामत न जिनका हल निकले
जिन्दग़ी वो सवाल देती है।

दिल की नादान-सी कोई लग़्ज़िश
जिन्दग़ी भर मलाल देती है।

इक तसव्वुर की झील सावन-सी
कश्तियों को उछाल देती है।

आँख उसकी हमारे अश्कों को
दामने दिल में डाल देती है।

तुम ज़ुबां से निकाल कर देखो
बात घर से निकाल देती है।
-श्रीमती आशा शैली 

Monday, April 3, 2017

जिन्दगी का गणित..........मंजू मिश्रा




बरस महीने दिन 
छोटे छोटे होते 
अदृश्य ही हो जाते हैं 
और मैं 
बैठी रहती हूँ 
अभी भी 
उनको उँगलियों पे 
गिनते हुए 
बार बार 
हिसाब लगाती हूँ 
मगर
जिन्दगी का गणित है कि
सही बैठता ही नहीं
-मंजू मिश्रा

Sunday, April 2, 2017

तुम मरते किरदार को जिन्दा रखो.....विशाल मौर्य विशु


दुश्मन के हर वार को जिन्दा रखो
जीतोगे, बस हार को जिन्दा रखो

हर झूठ को दफ्न हो ही जाना है
सच लिखते अखबार को जिन्दा रखो

पहचान तो मिल ही जायेंगी कभी
तुम मरते किरदार को जिन्दा रखो
-विशाल मौर्य विशु

Saturday, April 1, 2017

जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे....मनीष कुमार ‘मुसाफिर’


हरेक दर्द से अब तो गुजर जाना है
करके खुद से वादा मुकर जाना है ।

जानते है कि जख्म जीने नही देंगे
दर्दे जिगर में थोड़ा उतर जाना है ।

जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे
मौत आयेगी और हमें मर जाना है ।

क्या जानेगा बेदर्द जमाना कोई दर्द
अपने दर्द से थोड़ा संवर जाना है ।

अपनी मौत हम खुद मरना चाहेंगे
जीकर दो पल फिर ठहर जाना है ।

जिंदगी और मौत तो बस एक खेल
बनके खिलौना हमें बिखर जाना है ।