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Saturday, July 14, 2018

अनलिखी नज़्में.....प्रियंका सिंह

जब नींद 
नहीं आती रातों को 
अक्सर न जाने कितनी ही 
अनलिखी नज़्में 
मेरे साथ 
करवट बदला करती हैं 

कई बारी आँखों के 
दरवाज़े खटखटाती 
आँसू बन 
गालों को चूमती हैं 

कभी तकिये पर 
सीलन सी महकती हैं 
नर्म पड़ जाता है जब 
यादों से 
ख़ामोशी का बिछोना 
नज़्में 
तन्हाई को सहलाती है 
धकेलती है, लफ्ज़ों को 
ज़बां तक बिछने को 
सफ़हे तलाशती है 

वरक फैले होते है ख़्यालों के 
उन्हें चुनती, चूमती 
गले लगाती हैं 
मेरे ऐसे 
कितने ही पुलिंदे 
ये बाँध रख जाती हैं 

रंजो ग़म से घबराती नहीं 
मेरा साथ निभाए जाती हैं 
यूँही रात भर 
अक्सर जब कभी 
मुझे नींद नहीं आती 
न जाने 
कितनी अनलिखी 
मेरे साथ करवट बदला करती हैं ……..
-प्रियंका सिंह

Monday, February 26, 2018

चुप................प्रियंका सिंह

मैं 
चुप से सुनती 
चुप से कहती और 
चुप सी ही रहती हूँ 

मेरे 
आप-पास भी 
चुप रहता है 
चुप ही कहता है और 
चुप सुनता भी है 

अपने 
अपनों में सभी 
चुप से हैं 
चुप लिए बैठे हैं और 
चुप से सोये भी रहते हैं 

मुझसे 
जो मिले वो भी 
चुप से मिले 
चुप सा साथ निभाया और 
चुप से चल दिए 

मेरी 
ज़िन्दगी लगता है 
चुप साथ बँधी 
चुप संग मिली और 
चुप के लिए ही गुज़री जाती है 

कितनी 
गहरी, लम्बी और 
ठहरी सी है ये 
मेरी 
चुप की दास्ताँ........

-प्रियंका सिंह

Saturday, November 25, 2017

चुप.....प्रियंका सिंह



मैं 
चुप से सुनती 
चुप से कहती और 
चुप सी ही रहती हूँ 

मेरे 
आप-पास भी 
चुप रहता है 
चुप ही कहता है और 
चुप सुनता भी है 

अपने 
अपनों में सभी 
चुप से हैं 
चुप लिए बैठे हैं और 
चुप से सोये भी रहते हैं 

मुझसे 
जो मिले वो भी 
चुप से मिले 
चुप सा साथ निभाया और 
चुप से चल दिए 

मेरी 
ज़िन्दगी लगता है 
चुप साथ बँधी 
चुप संग मिली और 
चुप के लिए ही गुज़री जाती है 

कितनी 
गहरी, लम्बी और 
ठहरी सी है ये 
मेरी 
चुप की दास्ताँ........

- प्रियंका सिंह
priyanka.2008singh@gmail.com