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Thursday, May 25, 2017

बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए.....सतविन्दर कुमार

किसी मरते को जीने का वहाँ अधिकार हो जाए
अगर सहरा में पानी का ज़रा दीदार हो जाए

ये गिरना भी सबक कोई सँभलने के लिए होगा
मिलेगी कामयाबी हौंसला हर बार हो जाए

वफ़ा करके नहीं मिलती वफ़ा सबको यहाँ यारो
किसी की जीत उल्फत में,किसी की हार जाए

कि खुलकर आज कह डालो दबी है बात जो दिल में
*बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए*

खमोशी को हमेशा ही समझते हो क्यों कमजोरी?
यही गर्दिश में इंसाँ का बड़ा औज़ार हो जाए

सितमगर सोच कर करना सितम तू और लोगों पर
यही तेरी ख़ता उनका कहीं हथियार हो जाए
-सतविन्दर कुमार
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Tuesday, May 23, 2017

रास्तों पर किर्चियाँ फैला रहा....मनन कुमार सिंह


वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा
और चुप हो आसमां सोया रहा ।1।

आँधियों में उड़ गये बिरवे बहुत
साँस लेने का कहीं टोटा रहा ।2।

डुबकियाँ कोई लगाता है बहक
और कोई खा यहाँ गोता रहा ।3।

पर्वतों से झाँकती हैं रश्मियाँ
भोर का फिर भी यहाँ रोना रहा ।4।

हो गयी होती भली अपनी गजल
मैं पराई ही कथा कहता रहा ।5

चाँदनी छितरा गयी अपनी सिफत
गिनतियों में आजकल बोसा रहा ।6।

पोंछ देता अश्क मुंसिफ,था सुना,
वज्म में करता वही सौदा रहा ।7।

मर्तबा जिसको मिला,सब भूलकर
रास्तों पर किर्चियाँ फैला रहा ।8।

दिन तुम्हारे भी फिरेंगे,यह सुना
आदमी को आदमी फुसला रहा ।9।
- मनन कुमार सिंह
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