
छूते हो मुझे तो
महसूस कर पाते हो क्या
तरकीब़ मेरी रूह की
बनावट मेरे मन की
सहला पाते हो क्या
थकन मेरे हौसलों की
सलवटें मेरे ख्वाबों की
छूते हो मुझे तो
टटोल पाते हो क्या
हंसी मेरे बचपन की
शोखी मेरे यौवन की
खदेड़ पाते हो क्या
डर मेरे भीतर के
पशेमानी मेरे जीवन की
छूते हो मुझे तो
उभार पाते हो क्या
मायूस उम्मीदें मेरी
दबी ख्वाहिशे मेरी
समेट पाते हो क्या
अधूरी बातें मेरी
अनकही शिकायतें मेरी
छूते हो मुझे तो
खोल पाते हो क्या
गिरह मेरी कुंठा की
उलझे से सवालों की
सुलझा पाते हो क्या
पहेली मेरे भावों की
पशोपेश मेरे ख्यालों की
छूते हो मुझे तो
सच में छू पाते हो क्या
मुझे जो मुझमें ही कहीं
छुपी सी रहा करती है
या बहल जाते हो यूं ही
इस ख्याल से कि जानते हो मुझे
कि मुझसे मुहब्बत करते हो तुम
- मेजर (डॉ) शालिनी सिंह