Showing posts with label 'यासिर'. Show all posts
Showing posts with label 'यासिर'. Show all posts

Saturday, January 14, 2017

ये तेरी आँखें है बोलती..... 'यासिर'


हर बयानी खलिशे-खार की तरह बयां होती 
खल्वत मे सफे-मिज़गा के मोअजे -शरोदगी है खोलती 

हनोज़ न मिल सका जवाब उन आँखों को 
मेरी रुकाशी मे न जाने कैसे -कैसे मुज़मर के साथ है डोलती 

मुश्ताक है सारी बातों को जानने के लिए 
हर नाश-औ-नुमा बात के शर-हे को जिबस है तोलती 

महवे रहती है दवाम मोअजे-ज़ार की कुल्फत मे 
ऐ-'यासिर' खामोश होकर भी ये तेरी आँखें है बोलती 

-श़ायर ज़नाब 'यासिर'
प्रस्तुतिः सिकंदर ख़ान


खार -- कांटे,  खल्वत-- तन्हाई, मिज़गा -- जूनून
शर-हे -- मतलब,  जिबस -- बहुत ज्यादा,   दवाम -- लीन