Thursday, May 24, 2018

जेठ की तपिश.....श्वेता सिन्हा

चित्र:-मनस्वी प्रांजल


त्रिलोकी के नेत्र खुले जब
अवनि अग्निकुंड बन जाती 
वृक्ष सिकुड़कर छाँह को तरसे
नभ कंटक किरणें बरसाती
बदरी बरखा को ललचाती  
जब जेठ की तपिश तपाती 

उमस से प्राण उबलता पल-पल
लू की लक-लक दिल लहकाती
मन के ठूँठ डालों पर झूमकर 
स्मृतियाँ विहृ्वल कर जाती 
पीड़ा दुपहरी कहराती 
जब जेठ की तपिश तपाती 

प्यासी  नदियां,निर्जन गुमसुम
घूँट-घूँँट जल आस लगाए
चिचियाए खग व्याकुल चीं-चीं
पवन झकोरे  आग लगाए
कलियाँ दिनभर में मुरझाती 
जब जेठ की तपिश तपाती 
  
   #श्वेता सिन्हा

Wednesday, May 23, 2018

मुझे बचपन की कुछ यादें.....रईस अमरोहवीं



तिरा ख़याल कि ख़वाबों में जिन से है ख़ुशबू 
वो ख़्वाब जिन में मिरा पैकर-ए-ख़याल है तू। 

सता रही हैं मुझे बचपन की कुछ यादें
वो गर्मियों के शब़-ओ-रोज़ दोपहर की वो लू। 

पचास साल की यादों के नक़्श और नक़्शे 
वो कोई निस्फ़ सदी क़ब्ल का ज़माना-ए-हू। 

वो गर्म-ओ-ख़ुश्क महीने वो जेठ वो बैसाख.
कि हाफ़िज़ में कभी आह कैं कभी आँसूं।
-रईस अमरोहवीं
मोहतरिम श़ायर रईस साहब की पूरी ग़ज़ल
पढ़वाना चाहते थे हम..
पर टाईप करने में असफल रहे
पूरी ग़ज़ल यहाँ पढ़ें
रोमन हिन्दी में है..


Tuesday, May 22, 2018

रेगिस्तानी प्यास......गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश'

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आज भुनने लगी अधर है , 
रेगिस्तानी प्यास।

रोम रोम में लगता जैसे , 
सुलगे कई अलाव ।
मन को , टूक टूक करते,
ठंडक के सुखद छलाव ।

पंख कटा धीरज का पंछी ,
लगता बहुत उदास।

महासमर का दृश्य ला रही है,
शैतान लपट ।
धूप, चील जैसी छाया पर ,
प्रति पल रही झपट ।

कर वसंत को याद बगीचा,
...देखे महाविनाश।

सबको आत्मसमर्पित पा कर ,
सूरज शेर हुआ ।
आतप , भीतर छिपे सभी ,
कैसा अंधेर हुआ ।

परिवर्तन की आशा जब तक,
होना नहीं निराश।

बाढ़ थमेगी तभी ग्रीष्म की , 
पावस जब आये ।
लू -लपटों की भारी गर्मी , 
तब मुँह की खाए ।

अनुपम धैर्य प्रकृति का लख ,
मौसम कहता शाबाश ।

  सर्वाधिकार - गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश '

Monday, May 21, 2018

छांह भी मांगती है पनाह....अश्वनी शर्मा

रेगिस्तान में जेठ की दोपहर 
किसी अमावस की रात से भी अधिक
भयावह, सुनसान और सम्मोहक होती है

आंतकवादी सूरज के समक्ष मौन है
आदमी, पेड़, चिड़िया, पशु
कोई प्रतिकार नहीं बस
 ढूंढते हैं मुट्ठीभर छांह
आवाज के नाम पर 
जीभ निकाले लगातार
हांफ रहे कुत्तों की आवाजें सुनाई देती हैं
सन्नाटा गूंजता है चारों ओर

गलती से बाहर निकले आदमी को
लू थप्पड़ मारकर बरज देती है
प्याज और राबड़ी खाकर भी
झेल नहीं पाता आदमी

छलकते पूर्ण यौवन के अल्हड़ उन्माद में स्वछंद दुपहरी
किसी भी राह चलते से खिलवाड़ करती है

धूप सूरज और लू की त्रिवेणी
करवाती है अग्नि स्नान 
रेत और उसके जायों को
इस नग्न आंतक से त्रस्त
छांह भी मांगती है पनाह।
-अश्वनी शर्मा

Sunday, May 20, 2018

आदत बुरी है ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


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उनकी नजरों मैं हमने देखा 
बला की चाहत छुपी हुई है 
छलक के आँसू निकल के बोला 
यही तो आदत बड़ी बुरी है ! 

चलते चलते मुंडे अचानक 
तिरछी नजर से जो हमको देखा 
भीगे से लब मुस्कुरा के बोले 
कहके ना जाना आदत बुरी है ! 

आंखों मैं आँसू हँसी लबों पे 
दुआ ये किसके लिये हुई है 
किसकी किस्मत मैं हाजरीनो
ये कयामत की बानगी है ! 

रुके या जाये नजर ये बोले 
लफ्जों में क्या खूब तासीर सी है 
बिन कहे ही गजल सी कह गये 
यही तो उनकी मौसकी है ! 

डॉ. इन्दिरा ✍

Saturday, May 19, 2018

ना कर नाटक

ना कर 
नाटक 
कहा ना, 
ना कर 
नाटक 
बिना  टिप्पणी....


सादर

Friday, May 18, 2018

ठंडी बयार का झोंका....कुसुम कोठारी

मां को काट दोगे
माना जन्म दाता नहीं है
पर पाला तुम्हें प्यार से
ठंडी छांव दी प्राण वायु दी
फल दिये
पंछिओं को बसेरा दिया
कलरव उनका सुन खुश होते सदा

ठंडी बयार का झोंका
जो लिपटकर उस से आता
अंदर तक एक शीतलता भरता
तेरे पास के सभी प्रदुषण को 
निज मे शोषित करता

हां, काट दो बुड्ढा भी हो गया
रुको!! क्यों काट रहे बताओगे? 
लकडी चहिये हां, तुम्हें भी पेट भरना है
काटो पर एक शर्त है
एक काटने से पहले
कम से कम दस लगाओगे।
ऐसी जगह कि फिर किसी
 विकास की भेट ना चढूं मै
समझ गये तो रखो कुल्हाड़ी

पहले वृक्षारोपण करो
जब वो कोमल सा विकसित होने लगे
मुझे काटो मै अंत अपना भी
तुम पर बलिदान करुं
तुम्हारे और तुम्हारे नन्हों की
आजीविका बनूं

और तुम मेरे नन्हों को संभालना
कल वो तुम्हारे वंशजों को जीवन देगें
आज तुम गर नई पौध लगाओगे
कल तुम्हारे वंशज 
फल ही नही जीवन भी पायेंगे।
-कुसुम कोठारी

एक पेड काटने वालों 
पहले दस पेड़ लगाओ 
फिर हाथ में आरी उठाओ

Thursday, May 17, 2018

पेड़ बचाओ,जीवन बचाओ...श्वेता


हाँ,मैंने भी देखा है
चारकोल की सड़कें
फैल रही ही है
सुरम्य पेड़ों से आच्छादित
सर्पीली घाटियों में,
सभ्य हो रहे है हम
निर्वस्त्र,बेफ्रिक्र पठारों के
छातियों को फोड़कर समतल करते,
गाँवों की सँकरी
पगडंडियों को चौड़ा करने पर,
ट्रकों में भरकर
शहर उतरेगा ,
ढोकर ले जायेगा वापसी में
गाँव का मलबा,
हाँ ,मैंने महसूस किया है 
परिवर्तन की  
आने की ख़बर से
डरे-डरे और उदास 
खिलखिलाते पेड़
रात-रात भर रोते पठार और
बिलखते खेतों को,
जाने कौन सी सुबह
उनके क्षत-विक्षत अवशेष
बिखर कर मिल जायेे माटी में
हाँ,मैंने सुना है उन्हें कहते हुये
सभ्यता के विकास के लिए
उनकी मौन कुर्बानियाँ
मानव स्मृतियों में अंकित न रहे
पर प्रकृति कभी नहीं भूलेगी
उसका असमय काल कलवित होना
शहरीकरण के लिबास पहनती सड़कों पर
जब भर जायेगा
विकास को बनाने के बाद बचा हुआ 
ज़हरीला  धुआँ
तब याद में मेरी
कंकरीट खेत के मेड़ों पर
लगाये जायेगे वन
"पेड़ लगाओ,जीवन बचाओ"
के नारे के साथ।
-श्वेता सिन्हा





Wednesday, May 16, 2018

पेड़ लगाओ पानी बचाओ , कहता सब संसार !....नामालूम


धूप सिपाही बन गई  , सूरज थानेदार !
गरम हवाएं बन गईं  , जुल्मी  साहूकार !!
:
शीतलता शरमा  रही , कर घूँघट की ओट !
मुरझाई सी छांव है , पड़ रही लू की चोट  !!
:
चढ़ी दुपहरी हो गया , कर्फ़्यू जैसा हाल !
घर भीतर सब बंद हैं , सूनी है चौपाल !!
:
लगता है जैसे हुए ,   सूरज जी नाराज़ !
आग बबूला हो रहे , गिरा  रहे  हैं गाज !!
:
तापमान यूँ बढ़ रहा , ज्यों जंगल की आग !
सूर्यदेव  गाने  लगे , फिर  से   दीपक  राग !!
:
कूलर हीटर सा लगे , पंखा उगले आग  !
कोयलिया कू-कू करे , उत अमवा के बाग़ !!
:
लिए बीजना हाथ में  , दादी  करे  बयार   !
कूलर और पंखा हुए , बिन बिजली बेकार !!
:
कूए ग़ायब हो गये ,   सूखे  पोखर - ताल !
पशु - पक्षी और आदमी , सभी हुए बेहाल !!
:
धरती व्याकुल हो रही , बढ़ती जाती प्यास !
दूर  अभी  आषाढ़  है , रहने  लगी  उदास  !!
:
सूरज भी औकात में , आयेगा  उस  रोज !
बरखा रानी आयगी , धरती पर जिस रोज !!
:
पेड़ लगाओ पानी बचाओ , कहता सब संसार !
ये देख  चेते नहीं ,तो इक दिन होगा बंटाधार !!!!
-नामालूम

Tuesday, May 15, 2018

कुछ फुटकर श़ेर....आलोक यादव


अब भी सोफे में है गर्मी बाक़ी
 वो अभी उठ के गया हो जैसे
 ***
वाइज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़
पर क्या करूँ कि राह में ये जिस्म आ पड़ा
 ***
न वो इस तरह बदलते न निगाह फेर लेते
 जो न बेबसी का मेरी उन्हें ऐतबार होता
 ***
तुम हुए हमसफ़र तो ये जाना
 रास्ते मुख़्तसर भी होते हैं
 ***
गोपियों ने सुनी राधिका ने पढ़ी
 बांसुरी से लिखी श्याम की चिठ्ठियां
 ***
कर लेंगे खुद तलाश कि मंज़िल है किस तरफ 
 उकता गए हैं यार तेरी रहबरी से हम 
 *** 
ख्वाइशों के बदन ढक न पायी कभी 
 कब मिली है मुझे नाप की ज़िन्दगी ?
-आलोक यादव 

Monday, May 14, 2018

पाब्लो पिकासो और उसकी पेंटिंग..संकलित

पाब्लो पिकासो स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो 
पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। 
वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत 
बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। 
क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी 
से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले 
अपने घर आ गयी..!!

उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और 
उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि 
वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ..!! तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

एक प्रोफेशनल या सलाहकर को 10 मिनट के काम  की जो फीस दी जाती है वो इस कहानी को बयां करती है।

एक प्रोफेशनल या सलाहकार के एक काम के पीछे उसकी सालों की रात दिन की मेहनत होती है ।

क्लाइंट सोचता है कि बस जरा सा काम ही तो होता है 
फिर इतनी फीस क्यूँ लेते हैं !!!

Dedicated to all Professionals and apt for profession

संकलित

Sunday, May 13, 2018

माँ है अनुपम....डॉ. कनिका वर्मा

माँ है अनुपम
माँ है अद्भुत

माँ ने नीर बन
मेरी जड़ों को सींचा
और उसी पानी से
मेरे कुकर्म धोए

माँ ने वायु बन
मेरे सपनों को उड़ान दी
और उसी हवा से
मेरे दोषों को उड़ा दिया

माँ ने अग्नि बन
मेरी अभिलाषाओं को ज्वलित किया
और उसी अनल में
मेरी वासनाओं को दहन किया

माँ ने वसुधा बन
मेरी आकांक्षाओं का पालन किया
और उसी भूमि में
मेरे अपराधों को दबा दिया

माँ ने व्योम बन
मेरी आत्मा को ऊर्जित किया
और उसी अनन्त में 
मुझे बोझमुक्त किया

माँ है अनुपम
माँ है अद्भुत
-डॉ. कनिका वर्मा

Saturday, May 12, 2018

किया "इजहारे" मुहब्बत....कुसुम कोठारी


शाहजहां ने बनवाकर ताजमहल
याद मे मुमताज के, 
डाल दिया आशिकों को परेशानी मे।

आशिक ने लम्बे "इंतजार" के बाद 
किया "इजहारे" मुहब्बत

"नशा" सा छाने लगा था दिलो दिमाग पर 
कह उठी महबूबा अपने माही से
कब बनेगा ताज हमारे सजदे में
डोल उठा! खौल उठा!! बोला
ये तो निशानियां है याद में 
बस जैसे ही होगी आपकी आंखें बंद
बंदा शुरू करवा देगा एक उम्दा महल

कम न थी जानेमन भी
बोली अदा से लो कर ली आंखें बंद
बस अब जल्दी से प्लाट देखो
शुरू करो बनवाना एक "ख्वाब" गाह
जानु की निकल गई जान
कहां फस गया बेचारा मासूम आशिक
पर कम न था बोला

एक मकबरे पे क्यों जान देती हो
चलो कहीं और घूम आते हैं
अच्छे से नजारों से जहाँ भरा है,
बला कब टलने वाली थी
बोली चलो ताज नही एक फ्लैट ही बनवादो
चांद तारों से नही" गुलाबों" से ही सजा दो 
"उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई सरेआम हुई" 
अब खुमारी उतरी सरकार की बोला
छोड़ो मैं पसंद ही बदल रहा हूं
आज से नई गर्लफ्रेंड ढूंढता हूं

मुझमे शाहजहां बनने की हैसियत नही
तुम मुमताज बनने की जिद पर अड़ी रहो
देखता हूं कितने और ताजमहल बनते हैं
हम गरीबों की "वफा" का माखौल उडाते है
जीते जी जिनके लिए सकून का
एक पल मय्यसर नही
मरने पर उन्हीं के लिये ताज बनवाते हैं।
 -कुसुम कोठारी 

Friday, May 11, 2018

औरत.....मनीषा गुप्ता

तमाम उम्र एक छत के नीचे
निकाल कर औरत ......
अपनों से एक सवाल करती है ...!

क्या वज़ूद है मेरा 
सात फेरो संग फ़र्ज़
के बोझ तले दब जाना...!

माँ बन कर 
ममता में पिघल जाना .....!

या मायके की दहलीज़ से निकल
ससुराल की ड्योढ़ी पर सर को झुकना ....!

क्या सोचा किसी ने कभी
दर्द मुझ को भी छूता है ......!

मेरे दिल को भी 
प्यार भरे शब्दो का एहसास होता है ...!

न मायके की छत ने दिया नाम 
मुझे अपना........!

न ससुराल ने कभी मुझे
मेरे वज़ूद में सँवारा ......!

क्यों दुखती है कोई रग 
बड़ी शोर मचा कर .......!

क्यों आज फिर एक मन
मायूस हुआ हारा ......!

-मनीषा गुप्ता

Thursday, May 10, 2018

जफ़ा-ए-उल्फ़त....श्वेता सिन्हा

पूछो न बिना तुम्हारे कैसे सुबह से शाम हुई
पी-पीकर जाम यादों के ज़िंदगी नीलाम हुई

दर्द से लबरेज़ हुआ ज़र्रा-ज़र्रा दिल का
लड़खड़ाती हर साँस ख़ुमारी में बदनाम हुई

इंतज़ार, इज़हार, गुलाब, ख़्वाब, वफ़ा, नशा
तमाम कोशिशें सबको पाने की सरेआम हुई

क्या कहूँ वो दस्तूर-ए-वादा निभा न सके 
वफ़ा के नाम पर रस्म-ए-मोहब्बत आम हुई

ना चाहा पर दिल ने तेरा दामन थाम लिया
तुझे भुला न सकी हर कोशिश नाकाम हुई

बुत-परस्ती की तोहमत ने बहुत दर्द दे दिया
जफ़ा-ए-उल्फ़त मेरी इबादत का इनाम हुई



न ग़ुबार में न गुलाब में ................अदा ज़ाफ़री


न ग़ुबार में न गुलाब में मुझे देखना
मेरे दर्द की आब-ओ-ताब में मुझे देखना

 किसी वक्त शाम मलाल में मुझे सोचना
कभी अपने दिल की किताब में मुझे देखना

किसी धुन में तुम भी जो बस्तियों को त्याग दो
इसी रह-ए-ख़ानाख़राब में मुझे देखना

किसी रात माह-ओ-नजूम से मुझे पूछना
कभी अपनी चश्म-पुर-आब में मुझे देखना

 इसी दिल से हो कर गुज़र गए कई कारवां
की हिज्रतों के ज़ाब में मुझे देखना

मैं न मिल सकूँ भी तो क्या हुआ कि फसाना हूँ
नई दास्तां नए बाब में मुझे देखना

मेरे ख़ार ख़ार सवाल में मुझे ढूँढना
मेरे गीत में मेरे ख़्वाब में मुझे देखना

मेरे आँसूओं ने बुझाई थी मेरी तश्नगी
इसी बर्गज़ीदा सहाब में मुझे देखना

वही इक लम्हा दीद था कि रुका रहा
मेरे रोज़-ओ-शब के हिसाब में मुझे देखना

जो तड़प तुझे किसी आईने में न मिल सके
तो फिर आईने के जवाब में मुझे देखना

-अदा ज़ाफ़री

Wednesday, May 9, 2018

खाली दोनों हाथ हैं.....कल्पना सक्सेना

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सांस गई पहचान गई है
अब कोई पहचान नहीं
टैग लगाकर मुझे लिटाया
जब  से मुझ में जान नहीं

बड़ा ऐंठता फिरता था मैं
भरकर सदा जुनून से
अब तो मेरा तन भी
खाली है मेरे ही खून से

साथ सभी थे जीवन भर जो
वो भी अब ना साथ हैं
अब ना कुछ भी पास में मेरे
खाली दोनों हाथ हैं

रंग बिरंगे कपड़े पहने
सदा रहा मैं क्यूँ इतराता
आखिर मैंने पाया कफन
जो सबको पहनाया जाता

बड़ी कमाई दौलत जो थी
वो भी अब ना पास है
दो गज मिले जमीं अब तो
या कुछ लकड़ी की आस है

-कल्पना सक्सेना

Tuesday, May 8, 2018

कहानी अधूरी,अनुभूति पूरी-प्रेम की......श्वेता सिन्हा


उम्र के बोझिल पड़ाव पर
जीवन की बैलगाड़ी पर सवार
मंथर गति से हिलती देह
बैलों के गलेे से बंधा टुन-टुन
की आवाज़ में लटपटाया हुआ मन
अनायास ही एक शाम
चाँदनी से भीगे 
गुलाबी कमल सरीखी
नाजुक पंखुड़ियों-सी चकई को देख
हिय की उठी हिलोर में डूब गया
कुंवारे हृदय के
प्रथम प्रेम की अनुभूति से बौराया
पीठ पर सनसनाता एहसास बाँधे
देर तक सिहरता रहा तन
मासूम हृदय की हर साँस में 
प्रेम रस के मदभरे प्याले की घूँट भरता रहा
मदमाती पलकें झुकाये 
भावों के समुंदर में बहती चकई
चकवा के पवित्र सुगंध से विह्वल  
विवश मर्यादा की बेड़ी पहने
अनकहे शब्दों की तरंगों से आलोड़ित 
मन के कोटर के कंपकंपाते बक्से के
भीतर ही भीतर
गूलर की कलियों-सी प्रस्फुटित प्रेम पुष्प
छुपाती रही 
तन के स्फुरण से अबोध
दो प्यासे मन का अलौकिक मिलन
आवारा बादलों की तरह
अठखेलियाँ करते निर्जन गगन में
संवेदनाओं के रथ पर आरुढ़
प्रेम की नयी ऋचाएँ गढ़ते रहे
स्वप्नों के तिलिस्म से भरा अनकहा प्रेम
यर्थाथ के खुरदरे धरातल को छूकर भी
विलग न हो सका
भावों को कचरकर देहरी के पाँव तले
लहुलुहान होकर भी
विरह की हूक दबाये
अविस्मरणीय क्षणों की 
टीसती अनुभूतियों को
अनसुलझे प्रश्नों के कैक्टस को अनदेखा कर
नियति मानकर श्रद्धा से
पूजा करेगे आजीवन
प्रेम की अधूरी कहानी की
पूर्ण अनुभूतियों को।

-श्वेता सिन्हा

Monday, May 7, 2018

हर उम्र को जीना चाहती हूँ.....निधि सिंघल

जब भी यह सवाल कोई पूछता है,
मैं सोच में पड़ जाती हूँ,

बात यह नहीं, कि मैं,
उम्र बताना नहीं चाहती हूँ,
बात तो यह है, की,
मैं हर उम्र के पड़ाव को,
फिर से जीना चाहती हूँ,
इसलिए जबाब नहीं दे पाती हूँ,

मेरे हिसाब से तो उम्र,
बस एक संख्या ही है,

जब मैं बच्चो के साथ बैठ,
कार्टून फिल्म देखती हूँ,
उन्ही की, हम उम्र हो जाती हूँ,
उन्ही की तरह खुश होती हूँ,
मैं भी तब सात-आठ साल की होती हूँ,

और जब गाने की धुन में पैर थिरकाती हूँ,
तब मैं किशोरी बन जाती हूँ,

जब बड़ो के पास बैठ गप्पे सुनती हूँ,
उनकी ही तरह, सोचने लगती हूँ,

दरअसल मैं एकसाथ,
हर उम्र को जीना चाहती हूँ,

इसमें गलत ही क्या है?
क्या कभी किसी ने,
सूरज की रौशनी, या,
चाँद की चांदनी, से उम्र पूछी?

या फिर खल खल करती,
बहती नदी की धारा से उम्र पूछी?

फिर मुझसे ही क्यों?

बदलते रहना प्रकृति का नियम है,
मैं भी अपने आप को,
समय के साथ बदल रही हूँ,

आज के हिसाब से,
ढलने की कोशिश कर रही हूँ,

कितने साल की हो गयी मैं,
यह सोच कर क्या करना?

कितनी उम्र और बची है,
उसको जी भर जीना चाहती हूँ,

एकदिन सब को यहाँ से विदा लेना है,
वह पल, किसी के भी जीवन में,
कभी भी आ सकता है,

फिर क्यों न हम,
हर पल को मुठ्ठी में, भर के जी ले,
हर उम्र को फिर से, एक बार जी ले..

-निधि सिंघल